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मडागास्कर में मिस्सा बलिदान के दौरान संत पापा मडागास्कर में मिस्सा बलिदान के दौरान संत पापा   (Vatican Media)

येसु की तीन मांगेंः संत पापा फ्रांसिस

संत पापा फ्रांसिस ने मडागास्कर की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन अन्तनानारिवो के सोमानाद्राकीजे के मैदान में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

मडागास्कर, 08 सितम्बर 2018 (रेई) मिस्सा बलिदान के दौरान अपने प्रवचन में संत पापा ने कहा “एक विशाल जन समूह लोगों के पीछे चल रहा था।” (लूका.14.25) हम उसी बड़ी भीड़ के रुप में येसु के संदेश को सुनने हेतु जमा हुए हैं जिससे हम उनका अनुसरण कर सकें। लेकिन हम जानते हैं कि येसु के पीछे आना अपने में सहज नहीं है। आज के सुसमाचार में संत लूकस हमें इस चुनौती को पेश करते हैं।

संत लूकस येरुसलेम के मार्ग में येसु की चुनौतियों को हमारे सामने पेश करते हैं। वे इसकी शुरूआत विवाह भोज के दृष्टांत से करते जहाँ गलियों और चौराहों में पड़े लोग उसमें शमिल होते हैं। इसकी समाप्ति वे “करूणा के दृष्टांतों” से करते हैं जिसका अंत ऊड़ाव पुत्र के दृष्टांत से होता है। संत पापा ने कहा कि हम ख्रीस्तियों के लिए बलिदान का महत्व केवल आनंद की उस खुशी में है जहाँ हमारा मिलन येसु ख्रीस्त से होता है।

येसु ख्रीस्त की प्रथम मांग

संत पापा ने कहा कि येसु की पहली मांग परिवार के संबंध से संबंधित है। हम जिन चीजों को सही और अच्छा मानते और उनके संबंध में अपने “परिवार” को निर्णायक मानदंड बना लेते तो हम विशेषाधिकार और बहिष्कार की संस्कृति को अपना लेते हैं जो अपने में पक्षपात, संरक्षण को जन्म देता और इसके परिणाम रूप हम “भ्रष्टाचार” के शिकार होते हैं।

येसु हमें इससे बाहर निकले को कहते हैं, “जो अपने परिवार के दायरे से निकल कर दूसरी संस्कृति और सामाजिक परिवेश से आने वाले को अपने भाई-बहनों स्वरुप देखने में असमर्थ होता, “वह मेरा शिष्य नहीं हो सकता है”।(लूका. 14.26)

दूसरी मांग

येसु ख्रीस्त की दूसरी मांग का जिक्र करते हुए संत पापा ने कहा कि वे स्वर्गराज्य को हमारी व्यक्तिगत इच्छाओं या आदर्शों से अगल रखने को कहते हैं जिससे कारण ईश्वर के नाम या धर्म का दुरुपयोग किया जाता है। हम ईश्वर का नाम लेकर हिंसा, अलगाव, मौत, निर्वासन, आतंकवाद और बहिष्कार को न्यायसंगत घोषित नहीं कर सकते हैं।

यह हमसे इस बात की मांग करती है कि हम सुसमाचार के संदेश के साथ छेड़-छाड़ करते हुए इसे सीमित न करें वरन भ्रातृत्व और एकात्मकता को बढ़वा दें। “यह हमें वार्ता के मार्ग, आपसी सहयोग, एक-दूसरे को समझने और आपसी आदान-प्रदान को जीवन का मापदंड बनाने की मांग करता है।”  

तीसरी मांग

येसु की तीसरी मांग के संबंध में संत पापा ने कहा कि जब हम स्वयं को प्रमाणित करने की कोशिश करते यह सोचते हुए कि सारी चीजें मेरे मेहनत से पूरी होती हैं तो हम ईश्वर द्वारा मिलने वाले नये जीवन को प्रसारित करने में अपने को अयोग्य पाते हैं। येसु हमसे चाहते हैं कि हम अपने जीवन और अपनी क्षमताओं को उनसे मिले उपहार स्वरूप देखें और उनके लिए उन्हें कृततज्ञता की भेंट अर्पित करें। “हमारे गुण हमें ईश्वर की ओर से कई लोगों के द्वारा मिले हैं जिनके दर्शन हम स्वर्गराज्य में करेंगे।”  

व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मांग

अपने तीन मांगों के अलावे येसु ख्रीस्त हमें ईश्वरीय राज्य में प्रवेश करने हेतु, स्वयं को स्वतंत्र करने की मांग करते हैं अर्थ हम अपने लिए न जीयें। ऐसा करने के द्वारा हम दूसरों को अपने जीवन में स्थान नहीं देते हैं। हम गरीबों को अपने जीवन में स्थान नहीं देते, हम ईश्वर की वाणी को नहीं सुनते, हम खुशी में जीवनयापन नहीं करते और न ही दूसरों की भलाई करते हैं। अपने को दूसरे के लिए बंद करते हुए बहुत से लोग अपने में कटु हो जाते हैं और उनका जीवन मरणशील हो जाता है। यह सम्मानजनक जिन्दगी नहीं है और पुनर्जीवित येसु हमसे ऐसे जीवन की चाह नहीं करते हैं।

स्वार्थ ने बाहर निकले की मांग

इन मांगों के साथ येसु येरुसलेम की ओर बढ़ते और हमें अपने को जीवन का केन्द्र-बिन्दु बनाने की मांग करते हैं। संत पापा ने कहा कि आज कितने ही स्त्री और पुरूष, युवा और बच्चे हैं जो अपने जीवन में पीड़ित और जरुरत की स्थिति में हैं। उनकी स्थिति ईश्वर की योजना नहीं है। येसु हमें अपने स्वार्थ, व्यक्तिगतवाद और घमंड से ऊपर उठने को कहते हैं। हमारा ऐसा करना येसु के बेधित हृदय से हममें नवजीवन का संचार करता है और हम ईश परिवार के अंग बनते हैं जहाँ सबके लिए प्रेम, आदर और मानवीय सम्मान मिलता है। “मानवीय गरिमा के संबंध में, हम बहुधा अपने हाथों को बंद किये रहते या बुराई की गंभीर स्थिति में हताशा अपने हाथों को फैला देते हैं। ख्रीस्तियों के रुप में, यद्यपि हम उदासीनता में अपने हाथों को बंद किये खड़े या असहाय अवस्था में नहीं रह सकते हैं। विश्वासियों के रूप में, हमें अपने हाथों को फैलाने की जरूरत है, जैसा कि येसु ख्रीस्त ने हमारे लिए किया है।” (विश्व गरीबी दिवस प्रवचन, 18 नबम्बर 2018)

मानव जीवन ईश्वरीय महिमा हेतु

संत पापा ने कहा कि ईश्वर के वचन हमें साहसपूर्ण कदम लेने की चुनौती देते हैं जिससे हम सामाजिक न्याय को अपने व्यक्तिगत जीवन में अंगीकृत कर सकें। हम एक साथ मिलकर दुनिया की झूठी सुरक्षा पर विजय प्राप्त कर सकते हैं जो मानवीय महिमा को बढ़ावा देती है।

जब हम उनके द्वारा मिलने वाले नये जीवन की खुशी का रसास्वादन करना शुरू करते तब येसु की मांग हमारे लिए भारी नहीं लगती है। यह खुशी हमें अपने जीवन की राह में येसु को खोजने में मिलती है यद्यपि हम अपने में खोई हुई भेड़ या ऊड़ाव पुत्र ही क्यों न हों। सच्चाई की यह नम्र अनुभूति हमें एक चुनौती दे जिससे सुसमाचार हमारे जीवन का अंग बने, और हम अपने जीवन में ईश्वर की महिमा कर सकें।

08 September 2019, 16:02