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पुरोहितों के साथ संत पापा फ्राँसिस पुरोहितों के साथ संत पापा फ्राँसिस 

पुरोहितों ने नाम संत पापा फ्रांसिस का पत्र

संत पापा फ्रांसिस ने विश्वभर के सभी, ईश्वर द्वारा चुने हुए पुरोहितों के प्रति अपनी कृतज्ञता के भाव प्रकट किये हैं जो ईश प्रज्ञा की देख-रेख करते हैं।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन रेडियो, सोमवार, 5 अगस्त 2019 (रेई) संत पापा द्वारा पुरोहितों के नाम प्रेषित प्रोत्साहनात्मक पत्र के संदर्भ में वाटिकन संचार विभाग के संपादकीय अधिकारी अन्द्रेया तोरनियेली ने एक संपादकीय लिखा।  

उन्होंने अपने संपादकीय में कहा कि संत पापा फ्रांसिस ने कुरे (पुरोहित) ऑफ आर्स, संत योहन मेरी विय्येनी की 160वीं सालगिराह पर, जिन्होंने एक आदर्श पुरोहित के रुप में ईश प्रजा की सेवा की, पुरोहितों की प्रेरिताई की प्रशंसा करते और उन्हें प्रोत्साहन देते हुए एक पत्र प्रेषित किया। संत पापा उन पुरोहितों को चुनौती देने में पीछे नहीं रहे जिन्होंने पुरोहितिक उत्तरदायित्वों के निर्वाहन में कमी की किन्तु साथ ही साथ अपने हृदय के कृतज्ञतापूर्ण भावों को उनके लिए अभिव्यक्त किया, जो चुपचाप बिना विश्वास और भरोसा तोड़े अपने पुरोहिताई के कार्यों का निष्पादन करते हैं। संत पापा ने पत्र में विश्व के सभी पुरोहितों के प्रति अपनी निकटता, प्रोत्साहन, सहायता और सांत्वना के भाव व्यक्त किये हैं जो अपने जीवन की कठिनाइयों, तकलीफों और निराशाओं के बावजूद गिरजाघरों को खुला रखते और संस्कारों का अनुष्ठान करते हैं। वे उन पुरोहितों को प्रोत्साहित करते हैं जो लोगों की कमजोरियों और उदासी के बावजूद उनका स्वागत करते हैं जो उनसे सांत्वना और सहचार्य के शब्दों को सुनने की चाह  में उनके पास आते हैं। वे उनकी प्रशंसा करते जो विश्वासियों के साथ रहते और बिना भेदभाव के ईश प्रजा के लिए अर्पित हैं, रोने वालों के संग आंसू बहते और  हँसने वालों के साथ हँसते हैं। वे उन पुरोहितों की हौसला अफजाई करते हैं जो अपनी रेवाड़ की रखवाली करने की जोखिम उठाते हुए कई दिनों तक सूदूर प्रांतों की यात्रा करते हैं।

तोरनेयिली ने लिखा कि यह महानता बहुधा कलीसिया के सामान्य जीवन में याद नहीं की जाती। यह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के योग्य है लेकिन उन्हें चमकती दुनिया में स्थान नहीं मिलता है। यह एक गुप्त सेवा है जो अघोषित नेता स्वरुप, केवल ईश्वर की कृपा से ओत-प्रोत, अपने को लोगों के लिए देते हैं। यह जीवन की महानता है जहाँ वे अपने को “क्षमाप्राप्त पापी” जैसे कि संत पापा अपने को परिभाषित करते हैं, अपने में निरंतर ईश्वरीय क्षमा का अनुभव करते हुए अपने को उनके हाथों में समर्पित करते और समुदायों की सेवा करते हैं।

तोरनेयिली लिखते हैं कि पुरोहितों को उनके कार्यों के लिए प्रोत्साहन, प्रशंसा और सानिध्य भरे एक शब्द की आवश्यकता थी। उन्हें उनके कार्यों के लिए धन्यवाद देने की जरुरत थी जिसे संत पापा ने अपनी ओर से पूरा किया है। ऐसा करने के द्वारा कलीसिया को जो दुःख और ठेस कुछेक चुने हुए लोगों के द्वारा पहुँची है, वहीं दूसरों की निष्ठा को न भूलाया जाये, जिसे वे अपनी कमजोरियों के बावजूद मेहनत में पूरा करते हैं।

वे लिखते हैं यही कारण है कि संत पापा फ्रांसिस ने उन पुरोहितों के प्रति अपनी कृतज्ञता के भाव अर्पित करना चाहा जो आज भी अपने जीवन को ईश्वर के लिए अर्पित करते हुए लोगों की सेवा में समर्पित हैं।

05 August 2019, 15:17