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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (Vatican Media )

ख्रीस्त का साक्ष्य, व्यक्तिगत स्वार्थ के दमन की मांग

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में प्रेरित चरित पर धर्मशिक्षा माला देते हुए व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठने हेतु संदेश दिया जिसके फलस्वरुप हम येसु का साक्ष्य देते हैं।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 02 जनवरी 2019 (रेई) संतपापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विभन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को “प्रेरित चरित” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्ण संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

सुसमाचार की यात्रा

हमने प्रेरित चरित पर अपनी धर्मशिक्षा माला की शुरूआत की है जहाँ हम विशेष रुप से सुसमाचार प्रसार की “यात्रा” के बारे में सुनते हैं, कैसे इसका प्रचार-प्रसार एक स्थान से दूसरे स्थान में होता है...ये सारी बातें येसु ख्रीस्त के पुनरुत्थान से शुरू होती हैं। वास्तव में, यह कोई सामान्य घटना नहीं है वरन यह नये जीवन का स्रोत है। शिष्य इस तथ्य को समझते हैं और वे येसु की शिक्षा का अनुसारण करते हुए एक-दूसरे के साथ एकता में बने रहते हुए प्रार्थनामय जीवन व्यतीत करते हैं। वे माता मरियम से संयुक्त रहते और एकता में ईश्वर द्वारा भेजे जाने वाले पवित्र आत्मा को ग्रहण करने हेतु अपने को तैयार करते हैं।

प्रथम ख्रीस्तीय समुदाय में भाइयों और बहनों की संख्या करीबन 120 थी। यह संख्या अपने में इस्रराएल के 12 पीढ़ियों को सम्माहित करती है जिसे हम कलीसिया हेतु एक प्रतीक चिन्ह के रुप में देखते हैं क्योंकि येसु ने 12 शिष्यों को चुना। येसु के दुःखभोग और प्राणपीड़ा के उपरांत चेलों की संख्या अब 12 नहीं वरन केवल 11 रह गई थी। उनमें से एक यूदस उनके बीच नहीं रहा क्योंकि दुःख के कारण उसने अपने जीवन का अंत कर लिया था।

व्यक्तिगत स्वार्थ विभाजन का कारण

संत पापा ने कहा कि वह अपने को पहले ही येसु ख्रीस्त और शिष्यों के समुदाय से अलग कर लिया था क्योंकि उसका मन धन की ओर आसक्त हो गया। उसका मन उदारता और त्याग के मनोभावों की क्षीतिज से विरक्त को चुका था जिसके कारण वह मन और हृदय से घमंडी हो गया था। वह मित्र से शत्रु में बदल जाता और उन लोगों का अगुवा बनता जो येसु को गिरफ्तार करते हैं।(प्रेरित. 1.17) यूदस को येसु का शिष्य होने की बहुत बड़ी कृपा मिल थी और वह अपने स्वामी के प्रेरिताई कार्य का अभिन्न अंग रहा लेकिन एक निश्चित समय में अपने जीवन को “सुरक्षित” रखने की सोच के कारण वह उसे खो देता है।(लूका.9.24) वह अपने को येसु के हृदय से अलग कर लेता और शिष्यों के समुदाय से भी अलग अपने में रहता है। वह एक शिष्य के रुप में नहीं वरन अपने को स्वामी से भी बड़ा समझता है। वह अपने स्वामी का सौदा करता और उस “अपराधी रकम” से अपने लिए जमीन खरीदता है जो कोई फल उत्पन्न नहीं करता बल्कि वह स्वयं उसके खून से रक्तरंजित होता है। (प्रेरि.1. 18-19)

यदि यूदस अपने लिए जीवन के बदले मृत्यु का चुनाव करते हुए दुष्टों के मार्ग का अनुसारण करता है जो अंधकारममय जीवन की ओर ले जाता है तो वहीं ग्यारह शिष्यों ने अपने लिए जीवन और आशीष का चुनाव किया, वे अपने जीवन के लिए उत्तरदायी होते जिसका अनुपालन पीढ़ी दर पीढ़ी, इस्रराएल की प्रजा कलीसिया करती है।

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार लेखक संत लूकस हमें यह बतलाते हैं कि बारहों में से एक का खोया जाना समुदाय में उत्पन्न हुए एक घाव को दिखलाता है यह जरुर था कि उसका कार्य भार किसी दूसरे के हाथों में सौंपा जाये। कौन उसके साथ को ले सकता थाॽ पेत्रुस इस मांग की ओर ध्यान इंगित करते हैं, नये सदस्य को येसु के शिष्यों के बीच में से होना चाहिए जो शुरू से ही उनका अनुसरण कर रहा हो, यर्दन के बपतिस्मा से लेकर आखरी समय प्रभु के स्वर्गारोहण तक। (प्रेरित 1.21-22) बारह शिष्यों के दल को पुनः सुसंगठित करने की जरूर थी। इस संदर्भ में हम सामुदायिक मंथन की प्रकिया को देखते हैं जो ईश्वरीय नजरों के अनुरूप एकता और सामुदायिकता की बातों को प्रस्तुत करता है।

येसु हमें जानते और चुनते

इस चुनाव हेतु दो उम्मीदवार थे, योसेफ जो बरसब्बास कहलाता था और मथियस। इस तरह किसी एक का चुनाव करने के पूर्ण वे एक समुदाय की भांति प्रार्थना करते हैं, “प्रभु, तू सबका हृदय जानता है। यह प्रकट कर कि तूने इन दोनों में से किस को चुना है, ताकि वह धर्मसेवा तथा प्रेरितत्व में वह पद ग्रहण करे, जिस से पतित होकर यूदस अपने स्थान गया।” (प्रेरि.1.24-25) इस भांति हम चिट्टी को मथियस के नाम को पाते हैं जो ग्यारहों से संयुक्त था। इस भांति बारहों का समुदाय पुनः स्थापित किया गया, जिसे हम एक एकता में समुदाय के रुप में देखते जो अलगाव, विभाजन, अकेले रहने का मनोवृति पर विजयी होता है। यह सामुदायिक एकता प्रथम निशानी है जिसका साक्ष्य प्रेरितगण हमें प्रदान करते हैं। इसके बारे में येसु ने अपने शिष्यों से कहा था, “यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो।” (यो.13.35)

हमारे जीवन की कार्य शैली क्या हैॽ

संत पापा ने कहा कि बाराह प्रेरित येसु के कार्य की शैली प्रस्तुत करते हैं। वे अपने कार्यों को नहीं वरन येसु के मुक्तिदायी कार्य करने के तरीकों का साक्ष्य संसार को अपने जीवन द्वारा प्रस्तुत करते हैं। वे एकता में बने रहते जीवनदाता येसु ख्रीस्त को लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। शिष्य अपने जीवन को पुनर्जीवित प्रभु येसु ख्रीस्त के निर्देशानुसार जीते और भाइयों के बीच एकता का कारण बनते हैं जो अपने को सच्चे उपहार स्वरूप चेलों को देते हैं।

संत पापा ने कहा कि हमें भी येसु ख्रीस्त के पुनरूत्थान का सुन्दर साक्ष्य प्रस्तुत करने की जरुरत है जहाँ हम अपने स्वयं के मनोभावों, ईश्वरीय उपहारों को सिर्फ अपने तक ही सीमित रखने की सोच से ऊपर उठने और सदैव बेहतर करने हेतु बुलाये जाते हैं। प्रेरितों का एकीकरण ख्रीस्तीय समुदाय के डी एन ए को हमारे लिए प्रस्तुत करता है जहाँ हम एकता और स्वयं की स्वतंत्रता को पाते हैं। यह हमें विभिन्नताओं से निर्भय बनाता, हमें चीजों और उपहारों में आसक्त होने को नहीं अपितु हमसे शहादत की मांग करता है जो हमारे लिए इतिहास में जीवित ईश्वर और उनकी सक्रियता का जगमगाता साक्ष्य है। 

12 June 2019, 15:44