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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (ANSA)

ईश्वर से सदैव प्रार्थना करें

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में “हे पिता हमारे” प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला का समापन करते हुए सदैव प्रार्थना करने का आहृवान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 22 मई 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों  को “हे पिता हमारे” प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला को समापन करने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज हम “हे पिता हमारे” प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला का समापन करेंगे। हम कह सकते हैं कि ख्रीस्तीय के लिए ईश्वर को "पिता" के नाम से पुकारना हमारी साहसिकता से उत्पन्न होती है। यह हमारे लिए कोई सूत्र नहीं है बल्कि यह हमारा परिचय कृपाओं की परिपूर्ण में ईश्वर से करता है, जहाँ येसु ख्रीस्त हमारे लिए अपने पिता को प्रकट करते हैं। वे हमारे लिए एक सूत्र प्रदान नहीं करते हैं जिसका दुहरावा हम अपने जीवन में करें। किसी भी उच्चरित प्रार्थना के रुप में, यह पवित्र आत्मा है जो ईश्वर की संतानों को अपने पिता के पास प्रार्थना करने की शिक्षा देता है। येसु ख्रीस्त ने स्वयं अपने पिता के पास प्रार्थना करने हेतु कई तरह के शब्दों का उयोग किया। यदि हम सुसमाचार पर गौर करें तो हम येसु ख्रीस्त के मुख से निकलने वाली उन सभी अभिव्यक्तियों को “हे पिता” में सम्माहित होता हुआ पाते हैं।

येसु पिता को “अब्बा” पुकारते

गेतसेमानी बारी में येसु ने अपने पिता से इस तरह की प्रार्थना की, “अब्बा, पिता, तेरे द्वारा सारी चीजें संभंव हैं, यदि हो सकें तो यह प्याला मुझ से टल जाये। लेकिन मेरी इच्छा नहीं तेरी इच्छा पूरी हो”।(मार.14.36) हमने संत मारकूस के सुसमाचार में इस पद की चर्चा पहले ही की है। “हे पिता हमारे” प्रार्थना के इस छोटे रुप को हम देखने में कैसे असफल हो सकते हैंॽ उस अँधेरी रात में येसु अपने ईश्वर को “आब्बा” के नाम से पुकारते हैं। वे पुत्रवत विश्वास के साथ अपने भय और दुःख की घड़ी में पिता के पास आते और उनकी इच्छा पूरी होने का निवेदन करते हैं।

प्रार्थना में निरंतरता

सुसमाचार के एक दूसरे पद में येसु अपने शिष्यों को प्रार्थना करने के मनोभाव को अपनाने हेतु जोर देते हैं। प्रार्थना में निरंतरता की जरुरत है और उससे भी बढ़कर हमें अपने उन भाइयों को याद करते की जरुरत है जिनसे हमारा संबंध ठीक नहीं है। येसु हमें कहते हैं, “जब तुम प्रार्थना के लिए खड़े होते हो औऱ तुम्हें किसी से कोई शिकायत हो, तो क्षमा कर दो, जिससे तुम्हारा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा कर दे।” (मरकूस 11.25) इस परिस्थिति में हम “हे पिता हमारे” प्रार्थना के प्ररुप को पहचानने में कैसे असफल हो सकते हैं। इसके और भी कई असंख्य उदहारण हैं।

संत पापा ने कहा कि संत पौलुस के पत्रों में हम “हे पिता हमारे” प्रार्थना के पदों को लिखित नहीं पाते लेकिन संक्षेप में इसकी उपस्थिति अपने में एक भव्य रुप में है जहाँ हम ख्रीस्तियों को अपनी निवेदन प्रार्थना में “आब्बा” शब्द को ठोस रुप में घोषित करते हुए पाते हैं। (रोमि.8.15, गला.4.6)

संत लुकस के सुसमाचार में येसु को प्रार्थना करते हुए देख शिष्य उन्हें प्रार्थना करने हेतु सिखलाने का आग्रह करते हैं,“प्रभु हमें भी प्रार्थना करना सिखलाईए जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखलाया”। येसु उनकी मांग को पूरा करते हुए उन्हें प्रार्थना करना सिखलाते हैं।

प्रार्थना की प्रेरणा पवित्र आत्मा से

नये विधान को देखते पर हमारे लिए यह बात स्पष्ट होती है कि हर ख्रीस्तीय प्रार्थना में हम पवित्र आत्मा को मुख्य रुप से देखते हैं जो शिष्यों के हृदय को अपनी सामर्थ्य से पूर्ण करता है। ईश्वर की संतान स्वरुप पवित्र आत्मा हमें प्रार्थना करने में मदद करते हैं क्योंकि बपतिस्मा संस्कार द्वारा हमारा जन्म उनमें हुआ है। वह हमें प्रार्थना करने हेतु प्रेरित करते हैं जिसे येसु ने हमारे हृदयों में “लीक” की भांति अंकित किया है। हम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेम में वार्ता करने हेतु आकर्षित होते हैं जो कि ख्रीस्तीय प्रार्थना का रहस्य है।

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि येसु ख्रीस्त ने ऐसी ही प्रार्थना की। कभी-कभी उन्होंने अपनी प्रार्थना में उन वचनों का उपयोग किया जो “हे पिता हमारे” की अभिव्यक्ति से कोसो दूर रही। हम स्तोत्र 22 के बारे में चिंतन कर सकते हैं जिसे येसु ख्रीस्त क्रूस से उच्चरित करते हैं, “हे मेरे ईश्वर, हे मेरे ईश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया है”ॽ (मत्ती. 27.46) क्या स्वर्गीय पिता अपने बेटे को भूल सकते हैंॽ नहीं, यह कभी नहीं हो सकता है। हमारे पापी रहने पर भी ईश्वर हमें प्रेम करते हैं। “हे मेरे ईश्वर, हे मेरे ईश्वर” अपने बेटे की इस पुकार में भी हम ईश्वर को उनके निकट पाते हैं। इस पुकार में हम पिता के साथ एक संबंध को देखते हैं जो विश्वास और प्रार्थना को अभिव्यक्त करता है।

सदैव प्रार्थना करें

संत पापा ने कहा कि एक ख्रीस्तीय अपने जीवन के किसी भी परिस्थिति में प्रार्थना कर सकता है। वह धर्मग्रंथ विशेषकर स्तोत्र के अनुसार प्रार्थना कर सकता है लेकिन वह मानव इतिहास में हृदय की गरहाइयों से निकली पुकारों को भी प्रार्थनाओं के रुप में उपयोग कर सकता है। हम पिता को अपने उन भाई-बहनों के बारे में जिक्र करने हेतु कभी नहीं थकते विशेषकर जो गरीब, सांत्वना के बिना और प्रेम के आभाव में हैं।

संत पापा ने कहा कि अपनी धर्मशिक्षा माला के अंत में हम येसु के वचनों को दुहरा सकते हैं, “स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु, मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है”।(लूका. 10.21)

22 May 2019, 16:23