खोज

Vatican News
संत पापा का चालीसा संदेश संत पापा का चालीसा संदेश 

उपवास, प्रार्थना करते हुए दान दें

संत पापा फ्रांसिस ने पूजन विधि वार्षिक काल चक्र 2019 के चालीसा काल हेतु अपने संदेश में उपवास, प्रार्थना और दान पर बल देता हेतु कहा कि सारी सृष्टि बड़ी उत्कण्ठा से ईश पुत्र की राह देखती है।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

श्रोताओ हर वर्ष माता कलीसिया के माध्यम ईश्वर हमें एक शुभावसर प्रदान करते हैं जहाँ हम अपने जीवनदायी येसु के उस घटना की याद करते हैं जिसके द्वारा हमने जीवन पाया है, इस भांति हम अपना हृदय नवीन बनाते हुए मुक्तिदाता येसु के पास्का रहस्य में सहभागी होने हेतु अपने को तैयार करते हैं। इस तरह हम येसु के पास्का से अपने पास्का की ओर यात्रा करते हैं क्योंकि आशा में हमें मुक्ति प्राप्त हुई है। मुक्ति का यह रहस्यमय प्रगतिशील आयाम इतिहास और सारी सृष्ट को अपने में सम्माहित करता है जो हमारे जीवन में क्रियाशील है। संत पौलुस इसके बारे में कहते हैं,“समस्त सृष्टि उत्कण्ठा से उस दिन की प्रतीक्षा कर रही है, जब ईश्वर के पुत्र प्रकट हो जायेंगे।” (रोमि.8.19) संत पापा फ्रांसिस इस परिवर्तन की यात्रा में चिंतन हेतु कुछ विन्दुओं की ओर कलीसिया का ध्यान आकृष्ट कराते हैं।

1. सृष्टि की मुक्तिः कलीसिया का वार्षिक कालचक्र जो येसु के तृदिवसीय दुःखभोग, मृत्यु और पुनरूत्थान द्वारा अपनी पराकाष्ठा में पहुँचता है हम सभों को इस बात के लिए निमंत्रण देता है कि हम अपने को तैयार करते हुए इस बात का एहसास करें कि हम मुक्तिदाता येसु ख्रीस्त में ईश्वर के मूल्यवान करूणामय प्रेम के अंग हैं।

जब हम ईश्वर के मुक्तिदायी संतान के रुप में पवित्र आत्मा के सानिध्य में ईश्वरीय आज्ञाओं के अनुरूप जीवनयापन करते, जो हमारे हृदय के अंतरतम में अंकित किया गया है, तो हम सारी सृष्टि की भलाई में सहयोग करते हुए उसकी मुक्ति में अपना हाथ बंटाते हैं। अतः संत पौलुस कहते हैं कि सृष्टि उत्कण्ठा से ईश्वरीय संतान के प्रकट होने की प्रतीक्षा करती है। दूसरे शब्दों में जो येसु ख्रीस्त के पास्का रहस्य की कृपा का आनंद प्राप्त करते हैं वे उसकी परिपूर्णता को अपने शारीरिक मुक्ति में भी अनुभव करें। जब ईश्वर का प्रेम संतों के शरीर और आत्मा को परिवर्तित करता है तो वे ईश्वर का स्तुति गान करते हैं। प्रार्थना, चिंतन के द्वारा वे दूसरे सृष्ट प्राणियों को भी अपने संग ईश महिमा में शामिल करते हैं जैसे कि हम सृष्टि के गीत, असीसी के फ्रांसिस को ईश्वर की महिमा करते हुए पाते हैं।(लौदातो सी 87) यद्यपि दुनिया में शांति जो येसु ख्रीस्त द्वारा स्थापित की गई है पाप और मृत्यु के कारण विखंडित हो जाती है।  

2. पाप की विनाशकारी शक्तिः संत पापा कलीसिया के नाम संबोधित अपने चालीसा काल के पत्र में कहते हैं कि वास्तव में जब हम ईश्वर की संतानों की भांति जीवनयापन करने में असमर्थ होते तो हम अपने पड़ोसियों और दूसरों सृष्ट प्राणियों के साथ अपने को विनाशाकारी ढ़ग से पेश करते हैं क्योंकि हम उन्हें अपने विचारानुरुप अधिक उपयोग करने की सोचते हैं। हमारे जीवन में असंयमिता आ जाती है और हम अपने जीवन को मानव और सृष्टि द्वारा निर्धारित नियमों से परे जीने लगते हैं। हम प्रज्ञा ग्रंथ के अध्ययाय 2. 1-11 में उल्लेखित अदम्य इच्छाओं के अनुरूप अपना जीवन जीते जो ईश्वर की इच्छा नहीं है। जब तक हम पास्का और पुनरूत्थान के अनुरूप निरंतर अपना जीवन व्यतीत करने की नहीं सोचते तो “मुझे सारी चीजें चाहिए और अभी चाहिए” और “किसी भी वस्तु का अत्यधिक उपयोग कभी प्रर्याप्त नहीं है” हमारे जीवन का मंत्र बन जाता है।

संत पापा कहते हैं कि सभी बुराइयों की जड़ पाप है, जो शुरू से ही ईश्वर, दूसरों से और सृष्टि से हमारे संबंध को बनाये रखने में बाधक रही है जोकि विशेष रुप से हमारे शरीर से संयुक्त है। ईश्वर से हमारा टूटा हुआ संबंध सृष्ट में हमारे शांतिमय जीवनयापन को प्रभावित करता है जहाँ हम ईश्वर की वाटिका को उजड़ा और बंजर पाते हैं।(उत्पति 3.17-18) पाप हमें अपने को सृष्टि में सभी वस्तुओं का सर्वोच्च मालिक रुप पेश करता है जहाँ हम चीजों को ईश्वरीय योजना के अनुसार नहीं वरन अपनी इच्छानुसार उपयोग करते हैं।

हमारे जीवन से जब एक बार ईश्वर का निय़म प्रेम भुला दिया जाता तो कमजोरों में शक्तिशालियों के नियम लागू किये जाते हैं। मानव के हृदय में पाप का घुमड़ता रुप लोभ, अनियंत्रित भोग की चाह, दूसरों के प्रति चिंताविहीन जीवन यहाँ तक की हम स्वयं भी बेफ्रिक जीवन व्यतीत करने लगते हैं। इस तरह अपने अतृप्त लोभ जिसके फलस्वरुप हम अपनी इच्छा को एक अधिकार समान देखते हैं सृष्टि, व्यक्तियों और प्रर्यावरण को नष्ट करने में हम कोई खेद का अनुभव नहीं करते हैं।

3. पश्चाताप और क्षमा की उपचार शक्तिः सृष्टि अपने में बड़ी उत्कष्ठा से ईश्वरीय सृष्ट प्राणी मानव के प्रकट होने की प्रतीक्षा करती है जो अपने में “एक नई सृष्टि” है। क्योंकि “यदि कोई मसीह के साथ एक बन गया है, तो वह नयी सृष्टि बन गया है। पुरानी बातें समाप्त हो गयी हैं और सब कुछ नया हो गया है।”  (2 कुरि.5.17) इस रहस्य के उद्भेदन द्वारा सृष्टि में हम नये पास्का रहस्य को पाते हैं जो हमारे लिए नये आकाश और नई पृथ्वी को खोलता है।”(प्रका.21.1) पास्का का रहस्य हमसे इस बात की मांग करती है कि ख्रीस्तियों के रुप में हम अपना मुखमंडल और हृदय को पश्चताप, मन परिवर्तन और क्षमादान द्वारा नवीन बनायें जिससे हम पास्का रहस्य के कृपादानों को बहुतायत में जीने के योग्य बन सकें।

सारी सृष्टि की यह “उत्कण्ठापूर्ण प्रतीक्षा”, ईश्वरीय संतानों के प्रकट होने में पूरी होगी अर्थात जब सारी सृष्टि के लोग और ख्रीस्तीय निर्णायक रुप में “दुःख सहते” हुए अपने को रुपान्तरित करेंगे। चालीसे का काल अपने में संस्कारीय रुपांतरण की निशानी है। यह हम प्रत्येक ख्रीस्तीय को पास्का रहस्य में सम्मिलित होने का निमंत्रण देती जहाँ हम व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक रुप से उपवास परहेज, प्रार्थना में सम्मिलित करते हुए दान देने को प्रेरित करते हैं।

उपवास के बारे में अतः संत पापा कहते हैं कि इसका अर्थ सृष्टि और दूसरों के प्रति हमारे मनोभावों में परिवर्तन लाना है। अपने में सभी चीजों को “निगलने” की प्रवृति से निकलते हुए हमें प्रेम में कष्ट सहना है जिससे हमारे हृदयों के खालीपन भरे जा सकें। प्रार्थना हमें अपने मूर्तिपूजा और व्यक्तिगत पूर्णता के अहम का परित्याग करते हुए येसु की चाह और उनकी करूणा को पाने की इच्छा जगाये। दान देने के द्वारा हम अपने भविष्य हेतु संग्रह करने के मनोभावों से ऊपर उठते और ईश्वर में उस खुशी के भागीदार बनते हैं जिसे उन्होंने सारी सृष्टि और मानव जाति हेतु तैयार किया है। इसके द्वारा हम अपने भाई-बहनों और सारी दुनिया के लिए ईश्वर में अपने प्रेम को व्यक्त करते और उनके सच्चे प्रेम के भागीदार बनते हैं।  

चालीसा का काल, जहाँ येसु ख्रीस्त चालीस दिनों तक मरूभूमि में रहे, हमें येसु के साथ एक संबंध स्थापित करने का आहृवान देता है। चालीसे की यह अवधि हमें येसु में आशावान बने रहने में मदद करें जिससे हम “अपनी पुरानी दासता से मुक्त होकर ईश्वरीय महिमा में प्रवेश करते हुए उनकी स्वतंत्र संतान बन सकें।” हम इस समय को यूं ही जाने न दें। हम येसु के निवेदन करें कि वे हमें सच्चे रुपान्तर के मार्ग में ले चलें। हम अपने स्वार्थ और व्यक्तिगत आसक्ति का परित्याग कर येसु के पास्का की ओर मुड़ें। हम अपने जरुरतमंद भाई-बहनों को आध्यात्मिक और भौतिक रुप में सहायता कर सकें। इस भांति हम ठोस रुप में येसु के पास्का के भागीदार बनते हुए सारी सृष्टि में उनके परिवर्तन की शक्ति को प्रसारित कर सकेंगे।

08 March 2019, 15:03