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संत पापा फ्रांसिस, बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस, बुधवारीय आमदर्शन समारोह में  (ANSA)

ईश्वर माताओं के समान हैं, संत पापा

बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि ईश्वर उन माताओं की भांति हैं जो एक नजर में ही यह जान जाती हैं कि उनके बच्चों को किन चीजों की जरुरत है...।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 27 फरवरी 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को “हे पिता हमारे प्रार्थना” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयों एवं बहनों सुप्रभात।

ऐसा लगता है कि सर्दी खत्म हो रही है क्योंकि हम पुनः संत पेत्रुस के प्रांगण में जमा होते हैं। मैं आप सभों के इस प्रांगण में स्वागत करता हूँ। “हे पिता हमारे” प्रार्थना में सात पुकारों की गहराई में जाने के क्रम में आज हम प्रथम “तेरा नाम पवित्र किया जावे” पर चिंतन करेंगे।

पिता हमारे में साथ भाग

इस प्रार्थना में हम सात बातों को पाते हैं जिन्हें सहज ही दो भागों में बांटा जा सकता है। पहले भाग में हम पिता ईश्वर को केन्द्र बिन्दु के रुप में पाते हैं जिसे “तेरा” के रुप में संबोधित किया गया है और दूसरे “चार” में हम “हमारे” को देखते हैं जो मानव की आवश्यकताओं पर केन्द्रित है। पहले भाग में येसु हमें पिता को पुकारते हुए अपनी इच्छाओं में प्रवेश करने का निमंत्रण देते हैं। “तेरा नाम पवित्र किया जावे, तेरा राज्य आवे, तेरी इच्छा पूरी होवे”। दूसरे भाग में स्वयं ईश्वर हमारे जीवन में प्रवेश करते और हमारे जीवन की आश्वयकतों की पूर्ति करते हैं, हमारे रोज दिन की रोटी, हमारे अपराध क्षमा कर, परीक्षा में न डाल और हमें बुराई से बचा।  

हमारी प्रार्थना का ताना-बाना

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि ख्रीस्तीय प्रार्थना या कोई भी मानवीय प्रार्थना का ताना-बाना जिसे हम सदैव अपने में करते हैं ईश्वर के रहस्य, उनकी सुन्दरता और अच्छाई पर चिंतन करना है जिसके फलस्वरुप हम उनसे निष्ठा और साहसपूर्ण ढ़ग से अपने जीवन की जरुरतों की मांग करते हैं जिससे हम अपने जीवन को अच्छी तरह से जी सकें। इस भांति अपनी सरलता औऱ आवश्यकता में “हे पिता हमारे” की प्रार्थना जो हम कहते हैं वह शब्दों का व्यर्थ उच्चारण नहीं क्योंकि येसु स्वयं हमें कहते हैं, “हमारे मांगने से पहले ही ईश्वर यह जानते हैं कि हमें किन-किन चीजों की जरुरत है।” (मत्ती. 6.8)

जब हम ईश्वर से प्रार्थना में बातें करते हैं तो हम अपने हृदय की बातों को उन्हें व्यक्त नहीं करते क्योंकि वे उन्हें भांलि-भांति जानते हैं। यदि ईश्वर हमारे लिए एक रहस्य हैं तो हम उनके लिए एक रहस्य नहीं हैं। (स्तो. 139.1-4) ईश्वर उन माताओं की भांति हैं जो एक नजर में ही यह जान जाती हैं कि उनके बच्चों को किन चीजों की जरुरत हैः क्या वे अपने जीवन में खुश या उदास हैं, वे अपने में ईमानदार हैं या कुछ छुपा रहे हैं...।  

प्रार्थना का प्रथम चरण

ख्रीस्तीय प्रार्थना का प्रथम चरण इस तरह अपने को ईश्वर के हाथों में, उनकी इच्छा ने अनुरूप समर्पित करना है। यह ऐसे कहने के समान है, “हे ईश्वर तू सभी चीजों को जानता है, मेरे दुःखों को व्यक्त करने के पहले ही तू उन्हें जानता है, मैं तुझसे सिर्फ यही विनय करता हूँ तू मेरे निकट रहने की कृपा कर, तू मेरी आशा है।” पर्वत प्रवचन में हमारे लिए इस बात पर गौर करना कितना मनोरम है कि “हे पिता हमारे” की प्रार्थना सिखलाने के तुरंत बाद येसु हमें कहते हैं कि हम चिंता न करें और किसी चीज की चिंता न करें। यह हमारे लिए विरोधाभास-सा लगता है क्योंकि वे पहले हमें रोज दिन के आहार की मांग करने को कहते और उसके बाद हमें कहते हैं,“इसलिए यह कहते हुए चिंता मत करो, हम क्या खायें, क्या पियें क्या पहने।” (6.31) लेकिन यह विरोधाभास हमारे लिए क्षणिक है, ख्रीस्तियों के रुप में पिता ईश्वर पर हमारा विश्वास हमें अपने जीवन में विचलित और चिंतित हुए बिना भरोसे के साथ उन चीजों की मांग करने को प्रेरित करता है जिनकी हमें जरूरत है।

हमारा बुलावा पवित्रता हेतु

संत पापा ने कहा कि और इसीलिए हम यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “तेरा नाम पवित्र किया जावे।” इस प्रथम संबोधन में हम येसु को अपने पिता की सुन्दरता और महानता का बखान करते हुए पाते हैं। हम इसमें उनकी इच्छा को पाते हैं कि सभी उन्हें पहचाने और उन्हें प्रेम करें जैसे की वे वास्तव में हैं। उनके नाम की महिमा हमारे जीवन में, हमारे परिवार में, हमारे समुदाय और सारी दुनिया में हो। यह ईश्वर हैं जो हमें पवित्र करते हैं जो अपने प्रेम में हमारे जीवन को परिवर्तित करते हैं, वहीं हमें भी अपने जीवन के साक्ष्य द्वारा, दुनिया में ईश्वर की पवित्रता को व्यक्त करने का निमंत्रण दिया जाता है। संत पापा ने कहा कि ईश्वर पवित्र हैं लेकिन हम, हमारा जीवन पवित्र नहीं तो हम इसमें एक बड़ी असमानता को पाते हैं। ईश्वर की पवित्रता को हमारे जीवन में, हमारे कार्यों में परिलक्षित होना है। “मैं एक ख्रीस्तीय हूँ, ईश्वर पवित्र हैं, लेकिन मैं बहुत सारी बुराइयों को करता हूँ, तो यह अपने में उचित नहीं है।” यह दूसरों को भी चोट पहुँचता और दूसरों के लिए सदमे का कारण बनता है, यह दूसरों को मदद नहीं करता है।

पवित्रता प्रसारित होती है

ईश्वरीय पवित्रता अपने में वह बड़ी शक्ति है जो विस्तृत होती है और हम विनय करते हैं क्योंकि यह हमारे दुनिया की दीवारों को बहुत जल्द तोड़ देती है। जब येसु अपनी शिक्षा देना शुरू करते तो वे उस बुराई का हिसाब चुकाते हैं जो दुनिया को प्रभावित करती है। दुष्ट आत्मा कहती है, “ईसा नाजरी, हमसे आप को क्याॽ क्या आप हमारा सर्वनाश करने आये हैंॽ मैं जानता हूँ कि आप कौन है-ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरूष।” (मकु.1.24) किसी ने इस तरह की पवित्रता का दर्शन नहीं किया था, यह अपने में संकुचित नहीं  वरन अपने आपसे बाहर निकलती है। येसु की पवित्रता संकेंद्रित वृत्त से बाहर की ओर फैलती है मानो  तलाब में एक पत्थर फेंका गया हो। बुराई के दिन गिने हुए हैं-यह अपने में अनंत नहीं है, यह हमें हानि नहीं पहुँचा सकती है, वह शक्तिशाली मनुष्य जो घर पर अधिकार कर सकता है हमारे बीच येसु ख्रीस्त के रुप में हैं। (मारकुस.3.23-27) वे हमें भी अपने आतंरिक घर को मजबूत बनाने हेतु अपनी शक्ति प्रदान करते हैं।   

प्रार्थना द्वारा भय से निजात

संत पापा ने कहा कि प्रार्थना हमारे जीवन से सारे भय को दूर करती है। पिता हमें प्रेम करते हैं, वे अपने बेटे येसु ख्रीस्त में अपनी बांहों को हमारी ओर फेरते हैं, पवित्र आत्मा रहस्यात्मक ढ़ंग से दुनिया की मुक्ति हेतु कार्य करते हैं। और हमॽ हम अपनी अनिश्चितता में नहीं भटकते हैं। हम अपने में इस बात से निचिंत हैं कि ईश्वर हमें प्रेम करते हैं, येसु ने हमारे लिए अपना जीवन दिया है। पवित्र आत्मा मुझमें निवास करते है। बुराई हमसे भय खाती है। यह कितनी सुन्दर अनुभूति है।

27 February 2019, 14:54