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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (AFP or licensors)

ईश्वर के समान हमें कोई प्रेम नहीं करता

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में “हे पिता हमारे प्रार्थना” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देते हुए ईश्वरीय प्रेम की चर्चा की।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 20 फरवरी 2019 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन के संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों का “हे पिता हमारे प्रार्थना” पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयों एवं बहनों सुप्रभात।

हम “हे पिता हमारे” की प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला को आगे बढ़ाते हैं। हर ख्रीस्तीय प्रार्थना का प्रथम चरण ईश्वर के पितामय रहस्य में प्रवेश करना है। संत पापा ने कहा, “हम तोतों के समान प्रार्थना नहीं कर सकते हैं। प्रार्थना करने हेतु हमें रहस्य में, ईश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करने की जरुरत है।” ईश्वर को पिता के रुप में समझने की कोशिश करते हुए इस भांति हम अपने माता-पिता के रुप का चिंतन करते हैं, लेकिन हमें उनके रुप को सदा परिशुद्ध करने की जरुरत है। काथलिक कलीसिया का धर्मशिक्षा भी हमें इसके बारे में कहती है, “हमारे हृदय में हमारे माता-पिता का परिशुद्ध रुप जैसे की वे हमारे व्यक्तिगत और सांस्कृतिक इतिहास का स्वरुप तैयार करते हैं, ईश्वर से हमारे संबंध को प्रभावित करता है।”(2279)

कोई पूर्ण नहीं है

संत पापा ने कहा कि किसी के अभिभावक अपने में परिपूर्ण नहीं हैं, कोई भी नहीं, और जैसे कि हम हैं, हम अपने में कभी परिपूर्ण माता-पिता या प्रेरितगण नहीं हो सकते हैं। हम प्रत्येक में त्रुटियाँ हैं। एक दूसरे के साथ हमारे प्रेम के संबंध को हम अपने जीवन की खम्मियों और स्वार्थ में जीते हैं, इसके फलस्वरूप हम अपने को एक समझौता या दूसरे को अपने अधिकार में रखने की इच्छा से ग्रसित होते हैं। यही कारण है कि हम अपने प्रेमपूर्ण संबंध में अपने को क्रोधित और शत्रुता का शिकार होता पाते हैं।  

भिक्षु के रुप में प्रेम की चाह

और इसीलिए, जब हम ईश्वर को “पिता” कहते तो हम अपने माता-पिता के प्रतिरुप का विचार करते हैं विशेष कर क्या वे हमें प्रेम करते हैं। ईश्वर का प्रेम हमारे लिए उस पिता के समान है “जो स्वर्ग में निवास करते हैं, जैसे कि येसु ख्रीस्त हमें उन्हें पुकारने का निमंत्रण देते हैं, इस परिपूर्ण प्रेम का रसास्वादन हम इस जीवन में अपूर्ण रुप से करते हैं। नर और नारी के रुप में हम अनंत प्रेम के भिक्षु हैं, हम प्रेम की खोज करते हैं, हमें प्रेम की आवश्यकता है। हम अपने लिए एक प्रेममय स्थल की खोज करते हैं जहाँ हमें प्रेम मिले लेकिन वह हमें प्राप्त नहीं होता है। संत पापा ने कहा कि इस संसार में कितने ही मित्रता और प्रेम में हम निराशा की बातों को देखते हैं।

यूनानी पौराणिक कथा

संत पापा फ्रांसिस ने यूनानी पौराणिक कथा, प्रेम के ईश्वर की चर्चा करते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि प्रेम का वह ईश्वर अपने में दूत या दैत्य है, जो अपने में एकदम भयावह है। पौराणिकी हमें बदलाती है कि वह पोरोस और पेनिया का पुत्र है। वह अपने में अपने माता-पिता के रुप को वहन करता है। यहाँ से हम मानवीय प्रेम की प्रकृति पर विचार कर सकते हैं जो अपने में खिलता और जीवन के रुप में विकसित होने के साथ ही तुरंत मुरझाता और मर जाता है, हम उसे पकड़ते लेकिन वह सदैव छूट जाता है। (पेल्टो परिसंवाद, 203) हम नबी होशया को प्रेम की एक जन्मजात कमजोरी की चर्चा करते हुए कहते हैं, “तुम्हारा प्रेम भोर के कोहरे और सुबह की ओस के समान है जो शीघ्र ही लुप्त हो जाती है।” (होश.6.4) हमारा प्रेम ऐसा ही है, एक प्रतिज्ञा जिससे पूरा करने हेतु हम अपने में कठिनाई का अनुभव करते हैं, यह प्रयास हमारी ओर से तुरंत सूखा और वाष्पित हो जाता है, जिस तरह दिन में धूप आने से रात का ओस समाप्त हो जाता है।

मानव प्रेम की कमजोरी

संत पापा ने कहा कि मानव के रुप में हमने कितनी बार इस तरह का कमजोर प्रेम किया है। हम सभों ने अनुभव किया है कि हमने प्रेम किया है और हमारा प्रेम खत्म या कमजोर हो गया है। प्रेम की चाह हमारे खाम्मियों के कारण खत्म हो जाती है क्योंकि हम अपने में शक्ति का अभाव पाते हैं। हम अपनी प्रतिज्ञा में बने रहने हेतु अपने को कमजोर पाते जो कृपा के दिनों में हमें सहज लगा था। येसु के प्रेम में विश्वासनीय बने रहने हेतु यहाँ तक कि प्रेरित पेत्रुस ने भी कठिनाई का अनुभव किया। हम सभों में यह कमजोरी है और हम अपने जीवन में गिर जाते हैं। हम वे भिक्षु हैं जो अपने जीवन की राह में प्रेम की खोज करते लेकिन हम उस निधि को कभी पूर्णरुपेण प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

हमारे लिए ईश्वर का प्रेम

संत पापा ने कहा यद्पति एक प्रेम है जो पिता का है, “जो स्वर्ग में है।” हममें कोई भी उस प्रेम में संदेह नहीं कर सकते हैं। हम कह सकते हैं कि “वे मुझे प्रेम करते हैं।” यदि हमारे माता-पिता ने हमें जीवन में प्रेम नहीं किया तो भी हम अपने में यह सकते हैं कि स्वर्ग में एक ईश्वर हैं जिन्होंने हमें प्रेम किया है और उनके जैसा दुनिया में न तो हमें किसी ने कभी प्रेम किया और न ही कभी प्रेम करेंगे। ईश्वर का प्रेम हमारे लिए निरंतर बना रहता है। नबी इसायस कहते हैं, “क्या स्त्री अपना दुधमुंहा बच्चा भुला सकती हैॽ क्या वह अपनी गोद के पुत्र पर तरस नहीं खायेगीॽ यदि वह उसे भुला भी दे, तो भी मैं तुम्हें नहीं भुलाऊंगा। मैंने तुम्हें अपनी हथेलियों पर अंकित किया है।” (इसा. 49. 15-16) संत पापा ने कहा कि आज टैटू बनवाना एक फैशन है, “मैं तुम्हें अपने हाथों में अंकित किया है।”  ईश्वर ने हमें अपनी हथेली में अंकित किया है और मैं इसे नहीं मिटा सकता हूँ। ईश्वर का प्रेम हमारे लिए एक माता के प्रेम समान है वे हमें कभी नहीं भुला सकते हैं। उन्होंने ईश्वर के प्रेम पर जोर देते हुए कहा कि यदि माता हमें भूल भी जाये तो भी ईश्वर हमें नहीं भूलेंगे। उनका प्रेम हमारे लिए परिपूर्ण है। चाहे दुनियावी प्रेम गिर कर मिट्टी में क्यों न मिल जाये  हमारे लिए ईश्वर का अद्भुत, अनमोल और विश्वासनीय प्रेम सदा बना रहेगा।

प्रेम की भूख जिसे हम अपने जीवन में अनुभव करते हैं हम उन चीजों की खोज न करें जो हमें नहीं मिलती वरन हम ईश्वर को जो हमारे लिए पिता हैं खोजने और जाने हेतु बुलाये जाते हैं। युवा, तेजस्वी संत अगुस्टीन अपने मन परिवर्तन के उपरांत सारी चीजों में उसे खोजते हैं जो प्रेम के स्रोत हैं और वे एक दिन ईश्वर का ज्ञान हासिल कर लेते हैं जो उन्हें प्रेम करते हैं।

एक कहावत, "आसमाँ" दूरी व्यक्त नहीं करती, लेकिन प्यार की एक मूलभूत विविधता, प्यार का एक दूसरा आयाम, एक अथक प्यार, एक प्यार जो हमेशा रहता, वास्तव में, जो सदा हमारी पहुंच के भीतर है। हम सिर्फ कहें "हमारे पिता जो स्वर्ग में है" जहाँ से हमारे लिए प्रेम आता है।

संत पापा ने कहा अतः हम न डरे, हम अपने में अकेले नहीं हैं। यदि किसी दुर्भग्यवश  तुम्हारे सांसारिक पिता ने तुम्हें भुला दिया और तुम उससे नराज हो, तो भी तुम अपने ख्रीस्तीय विश्वास से अछूते नहीं हो, क्योंक तुम ईश्वर की प्यारी संतान हो और तुम्हारे लिए उनके अंनत प्रेम को कोई बुझा नहीं सकता है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभों के संग हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

20 February 2019, 16:43