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संत पापा, मरियम ईश्वर की माता  महापर्व के दौरान मिस्सा में संत पापा, मरियम ईश्वर की माता महापर्व के दौरान मिस्सा में  (ANSA)

मरियम येसु की पवित्र माता

संत पापा फ्रांसिस ने 01 जनवरी, नये साल को संत पेत्रुस के महागिरजाघर में ईश्वर की माता मरियम का महोत्सव मनाते हुए ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

“चरवाहों की बातों को सुन कर सभी आश्चर्यचकित थे।” (लूका. 2.18) उन्होंने मिस्सा बलिदान के दौरान दिये गये अपने प्रवचन में कहा कि ख्रीस्त जंयती के अठवारे जहाँ हम बालक येसु पर अपना चिंतन जारी रखते हैं येसु के जीवन में सारी चीजों की कमी को दिखलाता है यद्पित वे प्रेम से भरे हैं, जो आज हमें आश्चर्यचकित होने को निमंत्रण देता है। नये साल की शुरूआत करते हुए हमें आश्चर्य व्यक्त करने को कहा जा रहा है क्योंकि हमारा जीवन एक उपहार है जहाँ हमें सदैव एक नये शुरूआत करने का मौका मिलता है।

आश्चर्य हमारे जीवन का अंग

आज हमारे लिए वह दिन भी है जब हमें ईश्वर की माता मरियम पर आश्चर्य करते हैं। ईश्वर उस माता की बांहों में प्रकट होते हैं जो सृजनहार का लालन-पालन करती हैं। हमारे मध्य जो मूर्तियाँ हैं वे हमें माता और बच्चे के अति निकटता का एहसास दिलाती है। यह एक रहस्य है जिसे आज हम याद करते हैं जो हमें अपने में आश्चर्यों से भर देता है। ईश्वर मानव के साथ हमेशा के लिए एक हो गये हैं। हमारे लिए नये साल का संदेश यही है कि ईश्वर और मानव सदा एक दूसरे के साथ रहते हैं। ईश्वर हमसे दूर, स्वर्ग में अपनी महिमा में हम से अलग नहीं रहते वरन् प्रेम में मानव की हमारी तरह वे माता से जन्म लेते हैं जिससे वे हममें से प्रत्येक जन के लिए एक भाई बन सकें। वे अपनी माता की गोद में बैठते हैं जो हम सबों की भी माता हैं वहाँ से वे हम सभों के लिए अपनी एक नई करूणा की बरसा करते हैं। इस भांति हम ईश्वर के प्रेम को अपने में और अधिक गरहाई से समझते हैं जो हमारे लिए माता-पिता के प्रेम स्वरुप प्रकट होता है उस माता की भांति जो अपने बच्चों पर विश्वास करना कभी नहीं छोड़ती और उनका परित्याग कभी नहीं करती है। इम्मनुएल, ईश्वर हमारे साथ हैं हमारी गलतियों और पापों के बावजूद हमें प्रेम करते हैं। ईश्वर मानव जाति पर विश्वास करते हैं क्योंकि इसका पहला और प्रमुख सदस्य उसकी अपनी माँ हैं।   

संत पापा ने कहा कि हम साल के शुरू में माता मरियम से इस कृपा हेतु निवेदन करें कि वे हमें ईश्वर के अद्भुत कार्यों पर आश्चर्यचकित होने की कृपा दें। हमें अपने में प्रथम विश्वास के जन्म लेने की उस आश्चर्य अनुभूति का एहसास और एक बार करें। ईश्वर की माता इसके लिए हमारी सहायता करें। वे थियोटोक्स  हैं जिन्होंने ईश पुत्र को हमारे लिए जन्म दिया। वे हमारी वह माता हैं जो अपने बच्चों में विश्वास के आश्चर्य को जन्म देती हैं। आश्चर्य के बिना हमारा जीवन सुस्त और रूटीन की भांति हो जाता है वैसे ही विश्वास के साथ भी होता है। कलीसिया को भी आज अपने आश्चर्य को नवीकृत करने की जरुरत है जहाँ ईश्वर उसके बीच निवास करते, जो ईश्वर की वधू की भांति है, एक माता जो बच्चों को जन्म देती है। यदि ऐसा नहीं होता तो यह अतीत की एक सुंदर सग्रहालय की भांति हो जाती। माता मरियम हमें कलीसिया को एक घर स्वरुप अनुभव करने में हमारी मदद करती है जहाँ ईश्वर की नवीनता व्याप्त है। हम मरियम ईश्वर की माता के रहस्य को अपने में ग्रहण करें जैसे कि ऐफिसस के निवासियों के धर्मसभा के दौरान अनुभव किया। हम मरिया को “ईश्वर की पवित्र माता” कह कर संबोधित करें। हम अपने को उनके द्वारा देखने दें, आलिंगन होने दें और अपने को उनकी बाहों में होने दें।

हम अपने को उनके द्वारा देखने दें

संत पापा ने कहा कि विशेष कर अपने जीवन के उन क्षणों में जब हम अपने को जरुरत की घड़ी में पाते हैं, अपने को जीवन की मुसीबतों में फंसा पाते हैं, तो हम अपनी आंखें माता मरियम की ओर फेरें। जब वे हमारी ओर दृष्टि फेरती हैं तो वे हमें पापियों की तरह नहीं वरन् बच्चों की तरह देखती हैं। यह कहा गया है कि आंखें हमारे हृदय के दर्पण हैं, मरियम की आंखें जो कृपा से पूर्ण हैं ईश्वर की सुन्दर को व्यक्त करती हैं जो हमें स्वर्ग के दर्शन करते हैं। इस बात को येसु ने भी कहा, “आंख शरीर का दीपक है” (मत्ती. 6.22) माता मरियम की आंखें हमारे अंधकारमय क्षणों में आशा रुपी ज्योति से भर देती है। वे हमें कहती हैं, “हिम्मत रखो, मेरे बच्चों, मैं तुम्हारी मां यहाँ हूँ।”

यह ममतामयी नजर हमें विश्वास और भरोसा में बढ़ने हेतु मदद करता है। विश्वास हमारे लिए वह बंधन है जो हमें ईश्वर के साथ सुदृढ़ बनाये रखता है जहाँ हमें ईश्वर की माता की जरुरत होती है। उनकी ममतामयी नजरें हमें अपने को ईश्वर के विश्वासी संतान स्वरुप देखने हेतु मदद करती है जिसके फलस्वरुप हम एक दूसरे की कमजोरियो के बावजूद उन्हें प्रेम करते हैं। माता हमें कलीसिया के साथ संयुक्त रहने में मदद करती है जहाँ विभिन्नताओं की अपेक्षा एकता अधिक महत्वपूर्ण है, वे हमें एक दूसरे की चिंता करने हेतु प्रोत्साहन देती हैं। वे हमें इस बात का एहसास दिलाती हैं कि विश्वास हमसे कोमलता की मांग करती है क्योंकि इसके बिना हम अपने में कुनकुने जल की भांति हो जाते हैं। वे हमें येसु की ओर ध्यान क्रेन्दित करने हेतु मदद करती है जिसके फलस्वरूप हम अपने भाई-बहनों की ओर ध्यान देते हैं, वे हमारी माता हैं।  

माता की नजरों के बिना दुनिया की ओर हमारी नजरें कमजोर हो जाती हैं। हम दुनिया में लाभ कमा सकते हैं लेकिन हम दूसरों को बच्चों की तरह नहीं देख सकते हैं। हम धन कमा सकते हैं पर यह सबों के लिए नहीं होता है। हम एक घर में रहते हुए भी भाई-बहनों की तरह जीवन यापन नहीं कर सकते हैं। मानव परिवार माताओं पर निर्मित है। दुनिया जहाँ हम ममतामयी करूणा की कमी पाते हैं वहाँ हम भौतिक रुप से धनी होते हुए भी अपने में भविष्य की चीजों को लेकर गरीब रह जाते हैं। ईश्वर की माता हमें जीवन जीने को सिखलाती हैं।

हम अपने को आलिंगन करने दें

माता की नजरों से अब हम उनके हृदय की ओर अभिमुख होते हैं जिससे आज का सुसमाचार हमारे लिए प्रस्तुत करता है, “उन्हें अपने हृदय में उन सारी बातों को संचित रखा।” (लूका.2.19) उन्होंने अपने हृदय में अच्छी और बुरी सारी घटनाओं को रखा। उन्होंने उन सारी बातों पर चिंतन किया और उन्हें ईश्वर के सम्मुख लाया। यह उनका रहस्य था। वह हमें अपने हृदय के करीब रखती हैं और हमें ईश्वर के सामने प्रस्तुत करती हैं।

आज की टूटी दुनिया में जहाँ हम अपने को खोने की जोखिम में पाते हैं, हमें माता के आलिंगन की जरूरत है। हमारे चारों ओर कितनी निराश और अकेलापन है। संसार अपने में जुड़ा है यद्यपि यह अपने में एकदम विखंडित है। हमें अपने को माता मरिमय को सौंपने की जरुरत है। धर्मग्रंथ में माता मरियम सभी बातों को अपने हृदय में संजोकर रखती हैं वह जरुरत के समय आगे आती हैं। वह एलिजबेथ की सेवा हेतु जाती हैं, वह काना के विवाह भोज में नव वर-वधू की सहायता करती हैं, वह शिष्यों को अंतिम व्यारी के समय एक साथ जमा करते हुए प्रोत्साहित करती हैं... मरिया हमारे अकेलेपन और निराश की औषधि हैं। वे हमारे लिए सांत्वना की माता हैं वे उनके साथ खड़ी होती हैं जो अकेले हैं। वह जानती हैं कि शब्द सांत्वना हेतु हमारे लिए प्रर्याप्त नहीं हैं, वरन उपस्थिति हमारे लिए जरुरी है और वे माता के रुप में हमारे साथ रहती हैं। हम अपने को उनके द्वारा आलिंगन करने दें। हम उन्हें “अपना जीवन” कहते हैं। यह हमारे लिए अतिश्योक्ति प्रतीत होती है क्योंकि येसु ख्रीस्त हमारे लिए जीवन हैं (यो. 14.6) यद्यपि वे उनके साथ गहरे रुप में संयुक्त हैं जहाँ हम अपने को उनके हाथों में सुपुर्द करते हुए यह कहते हैं,“हमारा जीवन और हमारे जीवन की मीठी आशा।”

अपने को उनके हाथों संचालित होने दें

माताएँ अपने बच्चों का हाथ पकड़ कर ले चलती और प्रेम में जीवन जीने को सिखलाती हैं। लेकिन आज कितने ही बच्चों हैं जो अपने जीवन को भकट जा रहें हैं। वे अपने में सोचते हैं कि वे मजबूत हैं, लेकिन वे खो जाते हैं, वे सोचते हैं कि वे अपने में स्वतंत्र हैं लेकिन वे गुलाम बन जाते हैं। कितने ऐसे हैं जो अपनी माता के प्रेम को भूल जाते हैं और क्रोध और सभी चीजों में प्रति एक उदासीनता में जीवन यापन करते हैं। कितने हैं जो अपने जीवन की कटुता के कारण विरोध करते हैं। दुर्भावना अपने में बहुत बार साहस की निशानी प्रतीत होती है लेकिन यह अपने में एक कमजोरी है। हमें आज माताओं से सीखने की जरुरत है जहाँ वे अपने गुणों को हमारे लिए त्याग, करूणा की शक्ति और विवेक की नम्रता में व्यक्त करती हैं।  

ईश्वर को स्वयं एक माता की जरूरत हुई तो हमें उनकी कितनी जरूरत है। येसु ने स्वयं हमें अपनी माता को दिया है, “देखो यह तुम्हारी माता है।” (यो.19.27) उन्हें अपने प्रिय शिष्य से कहा और वे इसे हम सबों के लिए कहते हैं। माता मरियम हमारे लिए विकल्प का मार्ग नहीं हैं वरन हमें उन्हें अपने जीवन में स्वागत करना है। वे हमारे लिए शांति की महारानी हैं, जो बुराई पर विजय होती हैं और हमें अच्छाई के मार्ग में अग्रसर करती हैं, जो अपने बच्चों को एकता के सूत्र में पिरो कर रखती है, हमें प्रेम की शिक्षा देती हैं।

संत पापा फ्रांसिस ने अपने प्रवचन के अंत में विन्ती करते हुए कहा, “मरिया हमारे हाथों को पकड़कर ले चलिए। आप के साथ जुड़े रहते हुए हम अपने जीवन के तनाव भरे परिस्थितियों में सुरक्षित रहेंगे। आप हमें जीवन में पुनः एकता को खोजने में मदद कीजिए जो हमें एक दूसरे से संयुक्त रखती है। अपने अँचल के छांव तले हमें अपने करूणामय प्रेम का सच्चा एहसास दिलाइये जहाँ मानव परिवार का उद्भव होता है, हम आप की शरण में दौड़े आते हैं, हे ईश्वर की पवित्र माँ।”

01 January 2019, 17:02