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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (Vatican Media)

ईश्वर एवं पड़ोसी के प्रति प्रेम, एक सिक्का के दो पहलू

वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में रविवार 4 नवम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया, देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

इस रविवार के सुसमाचार पाठ के केंद्र में प्रेम की आज्ञा है (मार. 12,28b-34) ईश्वर के प्रति प्रेम एवं पड़ोसियों के प्रति प्रेम। एक शास्त्री ने येसु से पूछा, सबसे पहली आज्ञा कौन सी है? (पद. 28) येसु ने इस्राइयों के विश्वास की उस अभिव्यक्ति को दुहराते हुए जिसके द्वारा वे दिन की शुरूआत एवं अंत करते हैं, उत्तर दिया, "इस्राएल, सुनो! हमारा प्रभु-ईश्वर एकमात्र प्रभु हैं।" (विधि.6.4) इस तरह इस्राइली पूरे विश्वास की मौलिक वास्तविकता में, अपने विश्वास की रक्षा करते हैं। एक ही प्रभु हैं और वे हमारे प्रभु हैं अर्थात् उन्होंने एक चिरस्थायी व्यवस्थान द्वारा अपने आप को हमारे साथ जोड़ा है,  हमें प्यार किया है और हमेशा प्यार करते रहेंगे। इसी स्रोत से, इसी ईश्वर के प्रेम से दो आज्ञाएँ प्रस्फूटित होती हैं- "अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि और सारी शक्ति से प्यार करो। दूसरी आज्ञा है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इनसे बड़ी कोई आज्ञा नहीं।''(मार.12.30-31)

ईश्वर को प्यार करने का अर्थ

ईश्वर द्वारा अपनी प्रजा को कहे गये इन दो शब्दों को चुनते हुए तथा उन्हें एक साथ लाते हुए येसु ने एक बार एवं सभी के लिए यह शिक्षा दी है कि ईश्वर के प्रति प्रेम एवं पड़ोसियों के प्रति प्रेम को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। वास्तव में, इससे भी बढ़कर है एक-दूसरे को समर्थन दिया जाना। यदि उन्हें श्रेणी में रखा जाए तो वे एक ही सिक्के के दो पहलू होंगे। एक साथ होकर वे विश्वासियों की सच्ची शक्ति बन जाते हैं। ईश्वर को प्यार करने का अर्थ है वे जो हैं और जो कुछ करते हैं उनमें तथा उनके लिए जीना। ईश्वर हमें बिना शर्त देते हैं तथा वे हमेशा क्षमा करते हैं उनके साथ हमारा संबंध हमें बढ़ने में मदद देता है। इसलिए ईश्वर को प्यार करने का अर्थ है अपने पड़ोसियों की सेवा के लिए सदा तत्पर रहना। उन्हें हमेशा माफ करना तथा एकता एवं भाईचारा का संबंध बनाये रखना।

पड़ोसी होने का अर्थ

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार लेखक संत मारकुस इस बात पर विशेष प्रकाश नहीं डालते हैं कि पड़ोसी कौन है क्योंकि पड़ोसी वही है जिससे हमारी मुलाकात रास्ते पर हमारी दिनचर्या में होती है। हम सोचते हैं कि जिन्हें हम पहले से जानते हैं वही हमारा पड़ोसी है नहीं, ऐसा करना ख्रीस्तीयता का चिन्ह नहीं है, यह एक गैर-ख्रीस्तीय के समान व्यवहार है। पड़ोसी होने का अर्थ है- देख पाना तथा एक ऐसा हृदय होना जो उनकी भलाई की चाह रखता हो। यदि हम येसु की नजरों से देखेंगे तो हम हमेशा सुन सकेंगे तथा जरूतमंद व्यक्ति के करीब रह पायेंगे। पड़ोसियों की आवश्यकताएँ निश्चय की ठोस प्रत्युत्तर की मांग करती हैं जिसके लिए बांटने की आवश्यकता है। अतः एक कल्पना के द्वारा हम कह सकते हैं कि भूखे को न केवल एक थाली भोजन की किन्तु एक मुस्कान भी आवश्यकता है। उन्हें सुने जाने तथा प्रार्थना किये जाने की, जिसको उनके साथ किया जाए।

लोगों के करीब रहने की आवश्यकता

संत पापा ने सभी विश्वासयों का आह्वान करते हुए कहा, "आज का सुसमाचार पाठ हम सभी को निमंत्रण देता है कि हम न केवल गरीब भाई-बहनों की जरूरतों पर ध्यान दें बल्कि उनके करीब रहने की आवश्यकता को समझें, जीवन के अर्थ एवं उसकी कोमलता को देख सकें। यह हमारे ख्रीस्तीय समुदाय को चुनौती देता है। यह उस समुदाय की जोखिम को दूर करने का सवाल है जिसमें कई पहल किये जाते हैं किन्तु संबंधों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस तरह समुदाय सेवा का पड़ाव बन जाता है और लोगों को बहुत कम साथ दिया जाता है।"

पड़ोसियों से प्रेम किये बिना ईश्वर से प्रेम करना असंभव

ईश्वर प्रेम हैं, उन्होंने प्रेम से सृष्टि की है अतः हम भी उनके साथ संयुक्त रहकर दूसरों को प्यार कर सकें। यह झूठी कल्पना ही होगी यदि हम पड़ोसियों से प्रेम किये बगैर ईश्वर से प्रेम करना चाहेंगे। प्रेम के दो पहलू हैं ईश्वर के प्रति प्रेम एवं पड़ोसियों के प्रति प्रेम। उन दोनों को एक साथ मिलाना ही ख्रीस्त के शिष्यों की विशेषता है।

धन्य कुँवारी मरियम हमें इस महान शिक्षा को स्वीकार करने तथा अपने दैनिक जीवन में इसका साक्ष्य देने में सहायता दे।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

05 November 2018, 15:27