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संत पापा, रीगा स्थित अग्लोना की माता मरियम तीर्थ पर ख्रीस्तीयाग संत पापा, रीगा स्थित अग्लोना की माता मरियम तीर्थ पर ख्रीस्तीयाग   (AFP or licensors)

मरियम की तरह दुःख में साथ देना

संत पापा फ्राँसिस ने बाल्टिक देशों की प्रेरितिक यात्रा के दौरान लातविया के रीगा स्थित अग्लोना की माता मरियम तीर्थ पर ख्रीस्तीयाग अर्पित करते हुए दुःख में पड़े लोगों का साथ माता मरियम की तरह देने का संदेश दिया।

 उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

संत पापा ने प्रवचन में कहा कि संत योहन रचित सुसमाचार में दो अवसर ऐसे आते हैं जब येसु का जीवन अपनी माता के विपरीत दिखाई पड़ते हैं, वे अवसर हैं, काना का विवाह भोज एवं क्रूस के नीचे खड़ी मरियम। शायद सुसमाचार लेखक हमें येसु की माता के जीवन में विपरीत परिस्थिति को प्रस्तुत करना चाहते हैं, विवाह उत्सव के आनन्द एवं पुत्र की मृत्यु पर दुःख। शब्द के रहस्य पर अपनी समझ में मरियम उस सुसमाचार को इंगित करती है जिसे प्रभु आज हमारे साथ बांटना चाहते हैं।

हमारे जीवन में माता मरियम

पहली चीज जिसका वर्णन योहन करते हैं कि मरियम येसु अपने पुत्र के निकट खड़ी थी। वह क्रूस के नीचे अटल विश्वास, बिना भय एवं अचल होकर खड़ी रही। इसी मुख्य तरीका है जिसमें माता मरियम दिखलाती है कि वे उन लोगों के नजदीक खड़े होते जो दुःख सहते, दुनिया की दृष्टि में घृणित तथा कठिनाई में पड़े हैं। माता मरियम उनके निकट, उनके असुविधा और पीड़ा रुपी क्रूस के में उनके साथ खड़ी रहती है।

किसी के निकट रहना

मरियम हमें इन परिस्थितियों में नजदीक खड़ा होना सिखलाती है जो सिर्फ पार होने अथवा शीघ्र मुलाकात के बढ़कर है। इसका अर्थ है, इतना करीब होना कि पीड़ित व्यक्ति उसे अपने बगल में महसूस कर सके। समाज के सभी बहिष्कृत लोग माता मरियम को महसूस कर सकें जो सचमुच उनके नजदीक रहती हैं क्योंकि वे उनकी पीड़ा में अपने पुत्र येसु के खुले घाव को देखती है। उन्होंने इसे क्रूस के नीचे सीखा। हम भी दूसरों की पीड़ा को महसूस करने के लिए बुलाये गये हैं। हम लोगों के पास उन्हें सांत्वना देने जाएँ तथा उनका साथ दें। हम कोमलता की शक्ति को महसूस करने, उनके साथ शामिल होने एवं दूसरों के खातिर अपने जीवन में आने वाली परेशानी से न डरें। मरियम की तरह हम दृढ़ बनें, हमारा हृदय ईश्वर में शांति प्राप्त करे। हम गिरे हुओं को उठाने हेतु तैयार रहें और उनकी सहायता करें जो अपने को दुःखद परिस्थिति में पाते हुए क्रूसित होने का अनुभव करते हैं।

साथ खड़ा होना, प्रेम करना

येसु ने अपने प्रिय शिष्य को अपनी माता को स्वीकार करने हेतु कहा। सुसमाचार में हम पाते हैं कि वे दोनों एक क्रूस के नीचे एक साथ खड़े थे। हम अपने जीवन में दूसरे के साथ, अपने पड़ोसियों के साथ खड़ा हो सकते हैं लेकिन प्रेम के बिना हमारा खड़ा होना व्यर्थ होता है। आज कितने ही विवाहित दंपति अपने जीवन में एकसाथ रहते हैं किन्तु उनके जीवन में हम प्रेम का अभाव पाते हैं। कितने ही युवा और बुजूर्ग अपने में प्रेम की कमी का एहसास करते हैं।

दूसरों से जुड़ाना

संत पापा ने कहा कि जब हम अपने को दूसरों के लिए खोलते तो हम अपने में चोटिल होते हैं। माता मरियम हमें अपने जीवन के द्वारा क्षमा दान को सिखलाती है वह क्रोध और शांका को अपने से दूर करती है। वह इस बात पर विचार नहीं करती कि उसके पुत्र का मित्र या पुरोहित और शासक अपने में किस तरह का व्यवहार करेंगे। वह अपने में हताश और निराश नहीं होती है। वह येसु पर विश्वास करती और शिष्य को स्वीकार करती है क्योंकि एक दूसरे के साथ हमारा संबंध हमें चंगाई प्रदान करता है। वे जो अपने हृदय खुला रखते हैं वे दूसरे के साथ भ्रातृत्व की भावना का एहसास करते हैं जो ईश्वरीय अनुभूति प्रदान करती है। धर्माध्यक्ष स्लोसकान्स जिसकी क्रब यहाँ है उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के बाद अपने माता-पिता को लिखा, “मैं आप से सविनय निवेदन करता हूँ कि आप अपने हृदय में प्रतिकार या निराश के भाव न आने दें। यदि हम अपने जीवन में ऐसा होने देते तो हम सच्चे ख्रीस्तीय नहीं वरन कट्टरवादी होंगे।” जीवन के उन क्षणों में जब हमें दूसरों पर संदेह होता और हम अपने में सोचते कि हम अपनी मेहनत द्वारा स्वयं में समृद्ध होंगे। ऐसी परिस्थिति में माता मरिया और शिष्य हमें अपने भाई-बहनों को अपने जीवन में स्वीकार करने और भ्रातृत्व में जुड़ने हेतु कहते हैं।

विश्वास में आज्ञापालन

माता मरिया अपनी नम्रता में अपने को दूसरो के द्वारा स्वीकार करने देती है। वह शिष्य के जीवन का अंग बनती है। काना के विवाह भोज में अंगूरी के समाप्त हो जाने पर वह सेवकों से कहती है कि येसु जैसा कहे वैसा ही करो। (यो.2.5) एक आज्ञाकारी शिष्या की भांति वह स्वेच्छा से अपने से उम्र में छोटे के साथ जाती है। संत पापा ने कहा कि जब हम में विभिन्नता होती, हमारे बीच उम्र का अंतर होता तो हम अपने जीवन में कठिनाई का अनुभव करते हैं। लेकिन जब हम विश्वास में आज्ञाओं को सुनते और स्वीकार करते तो विभिन्नताएँ भी हमें जीवन को अधिक गहाई से अनुभव करने का अवसर बनती है।

हमारे घरों में मरियम को स्थान

संत पापा ने कहा कि इस मिस्सा बलिदान में हम गोलगोथा की याद करते हैं जैसे कि हर एक मिस्सा बलिदान में होता है। क्रूस के नीचे खड़ी माता मरियम हम सभों को आनंद मनाने हेतु बुलाती है क्योंकि हम सभी पुत्र-पुत्रियों की भांति स्वीकारे गये हैं। येसु हमें अपनी माता को अपने घर में स्थान देना को कहते हैं जिससे वे हमारे जीवन का अंग बन सके। माता मरियम हमें अपना साहस देना चाहती हैं जिससे हम अपने जीवन में सुदृढ़ और उनकी तरह नम्र बने रहें जिससे हम अपने जीवन में आने वाली किसी भी चीज को ग्रहण करने के योग्य बन सकें। अपनी इस तीर्थ में वह हम से निवदेन करती है कि हम बिना भेदभाव के एक-दूसरे का स्वागत करें। इस भांति लातविया में हम गरीबों के लिए अपने प्रेम दिखा पायेंगे, गिरे लोगों को उठा पायेंगे और दूसरों को अपने जीवन में स्वीकर कर पायेंगे चाहे वे किसी भी रूप में हमारे जीवन में आयें।

24 September 2018, 19:32