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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (AFP or licensors)

माता-पिता का आदर

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में संहिता की चौथी आज्ञा पर प्रकाश डालते हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को माता-पिता का आदर करने का मर्म समझाया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 19 सितम्बर 2018 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को ईश्वर की दस आज्ञाओं पर अपनी धर्मशिक्षा माला को आगे बढ़ते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

“आदर” का अर्थ

ईश्वर की दस आज्ञाओं के संदर्भ में आज हम माता-पिता की आज्ञा पर पहुंचते हैं। यह हमें अपने माता-पिता का आदर करने हेतु कहता है। संत पापा ने कहा कि यह “आदर” क्या हैॽ ईब्रानी भाषा में यह शब्द हमें महिमा, महत्व की ओर इंगित कराता है। इस तरह “आदर” करने का अर्थ हमारे लिए हमारे जीवन में माता-पिता के मूल्य को पहचानना है। यह हमें जीवन में उनकी उपस्थिति, एक सच्चाई को स्वीकारने का आहृवान करती है। धर्मग्रंथ में ईश्वर का आदर करने का अर्थ उस सत्य को स्वीकार करना है जहाँ हम अपने बीच ईश्वर की उपस्थिति को मानते हैं। यह हमारे दैनिक जीवन के रीति-रिवाजों में प्रकट होता है और उससे भी बढ़कर यह हम से इस बात की माँग करती है कि हम अपने जीवन में उनके अस्तित्व को महत्व दें। माता-पिता का आदर करने का अर्थ इस तरह हमारे जीवन में उन्हें महत्व देना है जो हमारे ठोस कार्यों में व्यक्त होता है जिनके द्वारा हम उन्हें अपना समर्पण, स्नेह और सेवा के भाव दिखलाते हैं। लेकिन केवल इतना ही काफी नहीं है।

चौथी आज्ञा, खुशी का कारण

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि चौथी आज्ञा की अपनी एक विशेषता है, यह आज्ञा अपने में एक रुप-रेखा को धारण करती है। वास्तव में यह हमें कहती है, “अपने माता-पिता का आदर करो, जैसा कि प्रभु, तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हें निर्देश दिया है। तब तुम बहुत दिनों तक उस भूमि पर खुशीपूर्वक जीते रहोगे, जिसे वह तुम्हें प्रदान करेंगे।” (वि.वि.5.19) संत पापा ने कहा, “माता-पिता का आदर करना हमारे जीवन में खुशी लेकर आती है। दस आज्ञाओं के संदर्भ में यह “खुशी” शब्द केवल माता-पिता से हमारे संबंध में आती है।

बचपन अमिट स्याही

हजारों सालों से चली आ रही ज्ञान की इस बात को मानव केवल एक छोटे रुप में व्याख्या कर पाया है कि बचपन में मिली शिक्षा, छाप हमारे पूरे जीवन को प्रभावित करती है। यह हमें इस तथ्य को जानने और समझने में मदद करती है कि किसी व्यक्ति की परवरिश कितने स्वास्थ्य परिवेश में और किस तरह एक संतुलित वतावरण में हुई है। हम अपने में इस बात का अनुभव भांलि-भांति कर सकते हैं कि कोई अपने जीवन में परित्यक्त परिस्थिति या हिंसा की अनुभूतियों से आता है। संत पापा ने कहा कि हम सभों का बचपना एक तरह से अमिट स्याही की तरह होती है जो हमारे पेश आने, व्यवहार में व्यक्त होता है जिसे हम अपने में छुपाने की कितनी भी कोशिश करें, हम शुरूआती दिनों के अपने घावों को नहीं छिपा सकते हैं।

संतानों की खुशी, माता-पिता के प्रति कृतज्ञता 

चौथी आज्ञा हमें अन्य बहुत सारी बातें कहती हैं। यह हमारे लिए माता-पिता की अच्छाइय़ों का जिक्र नहीं करती है, जो एक सर्वोतम अभिभावक होने हेतु उनकी आवश्यकता है। यह माता-पिता के गुणों के बदले बच्चों के कार्य का जिक्र करती है जो अपने में अतिविशिष्ट है जो उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करती है। यद्यपि सभी माता-पिता और संतान अपने में अच्छे और खुश नहीं हैं, लेकिन सभी बच्चे अपने में खुशी को प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि जीवन की हमारी सम्पूर्णतः और खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि एक संतान के रुप में हम दुनिया में जन्म देने वाले अपने माता-पिता के प्रति कितने कृतज्ञ बने रहते हैं।

ईश्वर की कृपा, मेल-मिलाप का साधन

संत पापा ने कहा,“हम इस बात पर चिंतन करें कि हममें से कितने हैं जिन्हें यह वाक्य साकरात्मक प्रतीत होता है जो अपने जीवन में बहुत सारे दुःख भरी परिस्थितियों से होकर गुजरे हैं, अपने युवा काल में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना किया है। बहुत से संत और बहुत सारे ख्रीस्तीय हैं जिन्होंने अपने दुःखदायी बचपना के बावजूद अपने जीवन को शानदार तरीके से जीया, हम येसु ख्रीस्त का शुक्रिया अदा करते हैं क्योंकि उन्होंने उनकी कृपा से अपने जीवन में मेल-मिलाप कर लिया। संत कामिलुस दे लेलिस का बचपना अपने में विकृत था लेकिन उन्होंने अपने जीवन को प्रेम और सेवा से सुसज्जित किया, संत जोसेफिना बाकीता जीवन की भंयकर गुलामी में पली-बढ़ी, धन्य कार्लो गोनोची अनाथ और एक गरीब व्यक्ति थे, उसी प्रकार संत योहन पौलुस द्वितीय जिन्होंने अपने बचपन में ही अपनी माता को खो दिया।

संहिता की आज्ञा हमारे मार्ग

संत पापा ने कहा कि मनुष्य चाहे किसी भी परिवेश से क्यों न आता हो, संहिता की आज्ञा उसे अपने में निर्देशित करती है जिसके द्वारा वह ख्रीस्त की ओर अभिमुख होता है। वास्तव में हम येसु ख्रीस्त में असल पिता के रहस्य को पाते हैं जो हमारे लिए स्वर्ग से आते हैं। (यो.3.3-8) हमारे जीवन के रहस्य अपने में तब आलोकित हो उठते हैं जब हम अपने में इस बात का एहसास करते हैं कि ईश्वर हमें सदैव जीवन का दान देते हैं जहाँ हमारे जीवन के सारे कार्यों उनकी ओर से प्रेरित किये जाते हैं।

ईश्वरीय कृपा द्वारा हमारा परिवर्तन 

हमारे जीवन के हमारे घाव,“क्यों” लेकिन “किस के लिए”, जिसे हम रहस्य के रुप में पाते हैं   फलहित होना शुरू करते जब हम अपने में ईश्वरीय कृपा का एहसास करते हैं। मेरे साथ ऐसा हुआ। अपने किस कार्य को पूरा करने हेतु ईश्वर ने मेरे जीवन के इतिहास में ऐसा होने दियाॽ इस तरह हम अपने में पाते हैं कि सारी बातें उलट जाती हैं, सभी चीजें मूल्यवान हो जातीं, हर एक घटना सुव्यवस्थित हो जाती है। इस तरह हम एक व्यस्क संतान की भांति अपनी स्वतंत्रता में अपने माता-पिता का आदर करने लगते हैं और करुणा में उनकी खाम्मियों को भी स्वीकराते हैं।

जीवन एक वरदान

संत पापा ने कहा कि यह जीवन हमें थोपा नहीं गया है वरन् यह हमें एक उपहार स्वरुप दिया गया है जिसे हम स्वतंत्र रुप से येसु ख्रीस्त में उनकी कृपाओं द्वारा नवीन बनाते हैं।(यो. 1.11-13) बपतिस्मा का संस्कार हमारे लिए वह निधि है जहाँ हम पवित्र आत्मा की शक्ति से एकमात्र पिता की संतान बनते जो स्वर्ग में रहते हैं।(मति.23.9, 1 कुरि. 8.6, एफि.4.6)

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासियों के संग हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सबों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

19 September 2018, 14:25