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मरियम के स्वर्गोत्थान महापर्व में सन्त पापा फ्राँसिस देवदूत प्रार्थना में मरियम के स्वर्गोत्थान महापर्व में सन्त पापा फ्राँसिस देवदूत प्रार्थना में  (ANSA)

मरियम का स्वर्गोउत्थान

पहली नवम्बर 1950 ई. को सन्त पापा पियुस ने माँ मरियम के इस धरती पर जीवन के उपरान्त स्वर्ग में उठा लिये जाने को कलीसियाई धर्मसिद्धान्त घोषित कर 15 अगस्त को मरियम के स्वर्गोत्थान महापर्व मनाये जाने की आधिकारिक घोषणा की थी

जूलयट क्रिस्टोफर-वाटिकन सिटी

मरियम के स्वर्गोत्थान महापर्व के उपलक्ष्य में सन्त पापा फ्राँसिस ने सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में देश-विदेश से उपस्थित तीर्थयात्रियों के साथ मध्यान्ह देवदूत प्रार्थना का पाठ कर उन्हें अपना सन्देश प्रदान किया। उन्होंने कहा,

"अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात!
धन्य माता मरियम के स्वर्गोत्थान महापर्व के दिन ईश प्रजा आनन्द के साथ माँ मरियम के प्रति भक्तिभाव की अभिव्यक्ति करती है। आज के लिये निर्धारित धर्मविधि द्वारा तथा दया के कार्यों द्वारा वह इसकी अभिव्यक्ति करती है जिससे कि स्वतः मरियम की भविष्यवाणी पूरी हो सके, "अब से सभी पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी।" (लूक.1,48) "क्योंकि प्रभु ने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है।" आत्मा और शरीर सहित स्वर्ग में उठा लिया जाना वह ईश्वरीय अधिकार है जो ईश माता मरियम को येसु के साथ उनके विशिष्ट सम्बन्ध के कारण प्रदान किया गया है। यह एक शारीरिक और आध्यात्मिक सम्बन्ध है जो देवदूत की घोषणा से शुरु हुई तथा अपने पुत्र के रहस्य में अद्वितीय रूप से भागीदार बनने के द्वारा मरियम के सम्पूर्ण जीवन में परिपक्व होता गया।"

येसु के मुक्ति कार्य में मरियम

सन्त पापा ने कहा, "ज़ाहिर है कि माता मरियम का अस्तित्व उनके युग की एक आम महिला की तरह रहा: उन्होंने प्रार्थना की, परिवार और घर-भार सम्भाला और उसका संचालन किया, प्रायः सभागृह गई... किन्तु उनका हर दैनिक कार्य उनके द्वारा येसु के साथ पूर्ण रूपेण सहयोग करते हुए पूरा हुआ और कलवारी पर्वत पर उनका यह सम्मिलन प्रेम, करुणा तथा हृदय की अगाध पीड़ा में अपने चरम पर पहुँचा। इसीलिये प्रभु ईश्वर ने उन्हें येसु के पुनःरुत्थान में भी पूर्ण सहभागिता का वरदान प्रदान किया। माँ मरियम का शव भ्रष्ट होने से बचा रहा ठीक उसी प्रकार जैसे येसु का शव भ्रष्ट नहीं हुआ था। आज के ख्रीस्तयाग हेतु निर्धारित प्रवेश भजन इसी की घोषणा करता है, "हे सर्वशक्तिमान् ईश्वर तूने नहीं चाहा कि उसका शरीर भ्रष्ट हो जिसने जीवन के स्वामी को जन्म दिया।"

मनुष्य- शरीर और आत्मा

सन्त पापा ने आगे कहा, ... "माता कलीसिया आज हमें आमंत्रित करती हैं कि हम इस रहस्य पर मनन-चिन्तन करें। यह रहस्य दर्शाता है कि ईश्वर मनुष्य को शरीर और आत्मा सहित बचाना चाहते हैं। येसु उस शरीर सहित पुनर्जीवित हुए जिसे उन्होंने मरियम से धारण किया था और अपनी रूपान्तरित मानवता सहित वे पिता ईश्वर के पास आरोहित हो गये। मानवीय प्राणी मरियम का स्वर्गोत्थान, हमारे समक्ष हमारी महिमामय नियति की पुष्टि करता है। इससे पहले ही ग्रीक दार्शनिकों ने यह समझ लिया था कि मृत्यु के बाद आनन्द ही मानवीय आत्मा की नियति है। हालांकि, उन्होंने शरीर को तुच्छ समझा, उसे आत्मा में क़ैद माना और यह संकल्पना नहीं कर सके कि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर को भी आत्मा के साथ आनन्द मनाने के लिये संयुक्त रखने की व्यवस्था की थी। शरीर का पुनःरुत्थान, ख्रीस्तीय प्रकाशना और ख्रीस्तीय विश्वास का अनिवार्य तत्व है।

अनंत जीवन हेतु सेवा कार्य

उन्होंने कहा, "मरियम के स्वर्गोत्थान का वैभवशाली यथार्थ मानव व्यक्ति की एकता को प्रकाशित एवं पुष्ट करता है तथा यह स्मरण दिलाता है कि हम सब अपने तन-मन और धन से ईश्वर की सेवा करने तथा उनकी महिमा का बखान करने के लिये बुलाये गये हैं। केवल शरीर से ईश्वर की सेवा करना गुलाम के रूप में कार्य करना होगा जबकि केवल आत्मा से ईश्वर की सेवा हमारे मानवीय स्वभाव के विपरीत होगा। कलीसिया के महान आचार्य सन्त इरेनेओ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि "ईश्वर की महिमा जीवित मनुष्य से है और मनुष्य का जीवन ईश्वर की दृष्टि में निहित है।" (अपधर्म के विरुद्ध, अध्याय 04, 20,7)। यदि हमने अपना जीवन ईश्वर की आनन्दपूर्ण सेवा में व्यतीत किया, जो, भाइयों की उदार सेवा में व्यक्त होती है तो पुनःरुत्थान के दिन हमारी नियति भी स्वर्ग की रानी मरियम के सदृश होगी। तब हम पूर्ण रूप से प्रेरितवर सन्त पौल के प्रेरितिक उद्बोधन को साकार कर पायेंगे: "आप लोग अपने शरीर में ईश्वर की महिमा प्रकट करें।" (1 कुरिन्थियों 6,20), और हम सदा-सर्वदा के लिये स्वर्ग में उनकी महिमा करते रहेंगे।"

अन्त में माँ मरियम से सन्त पापा ने इस प्रकार प्रार्थना की, "आइये, मरियम से हम प्रार्थना करें कि उनकी ममतामयी मध्यस्थता द्वारा वे हमें हमारी दैनिक तीर्थयात्रा में आगे बढ़ने हेतु मदद करें जिससे हम एक दिन स्वर्ग में समस्त सन्तों और प्रियजनों तक पहुँच सकें।"

इन शब्दों से अपना सन्देश समाप्त कर सन्त पापा फ्राँसिस ने उपस्थित भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना किया तथा सबको अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।
 

15 August 2018, 15:40