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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (Vatican Media)

करुणा ईश्वर की भाषा है, संत पापा फ्राँसिस

करुणा हृदय के लेंस के समान है जो सच्चाई के आयाम को समझने में मदद देता है। यह ईश्वर की भाषा है। मनुष्यों की भाषा कई बार अलग होती है। यह बात संत पापा फ्रांसिस ने वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में कही।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 17 सितम्बर 2019 (रेई)˸ 17 सितम्बर को ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में संत पापा फ्राँसिस ने संत लूकस रचित सुसमाचार से लिए गये पाठ पर चिंतन किया जहाँ नाईन नगर की विधवा के बेटे को येसु चंगाई प्रदान करते हैं।

संत पापा ने कहा, "दया के लिए अपना हृदय खोलो और उदासीनता से इसे बंद मत करो। करुणा हमें सच्चे न्याय के रास्ते पर लाती है, इस तरह हमें अपने आप में बंद हो जाने से बचाती है।"

हृदय का लेंस

संत लूकस कहते हैं कि येसु को तरस हो आया। संत पापा ने कहा कि विधवा के साथ बहुत सारे लोग थे किन्तु येसु ने ही उसकी परिस्थिति को समझा कि वह आज अकेली हो गयी है और जीवन के अंत तक अकेली ही रहेगी क्योंकि वह एक विधवा है और उसने अपने एकलौटे बेटे को खो दिया है। वास्तव में, करुणा हमें सच्चाई को गहराई से समझने में मदद देती है।      

संत पापा ने कहा, "करुणा हमें चीजों को उसी तरह देखने में मदद करती है जिस तरह वे वास्तव में हैं। करुणा हृदय के एक लेंस के समान है। यह सचमुच आयामों को समझने में मदद देती है।" सुसमाचार में हम पाते हैं कि येसु बहुधा दया से द्रवित हो जाते हैं। करुणा ईश्वर की भाषा भी है। पुराने व्यस्थान में ईश्वर मूसा से कहते हैं- "मैंने अपने लोगों का दुःख देखा है।" (निर. 3:7) यह ईश्वर की दया है जिन्होंने अपने लोगों को बचाने के लिए मूसा को भेजा। हम इसे ईश्वर की कमजोरी के रूप में देख सकते हैं किन्तु यह उनका सामर्थ्य भी है। उनकी दया का सबसे बड़ा उदाहरण है कि उन्होंने हमें बचाने के लिए अपने पुत्र को भेजा।  

करुणा दुःख का अनुभव करना नहीं है बल्कि दूसरों की समस्या में सहभागी होना है, अपने जीवन को जोखिम में डालना है। जब रास्ते पर कुत्ता मर जाता है तब उसे देखकर हम दुःख महसूस करते हैं और कहते हैं, बेचारा कुत्ता। करुणा ऐसा नहीं है। इसके लिए ईश्वर ने अपना जीवन अर्पित कर दिया है।

ईश्वर की भाषा

दूसरा उदाहरण संत पापा ने रोटी के चमत्कार से लिया जिसमें येसु शिष्यों से भीड़ को खिलाने के लिए कहते हैं, उन्हें खाने के लिए दो। इसके द्वारा येसु का निमंत्रण था कि वे लोगों को खिलाने की चिंता करें जिसके लिए चाहे उन्हें गाँव जाकर ही रोटी खरीदना क्यों न पड़े। सुसमाचार बतलाता है कि प्रभु भीड़ को देखकर दया से द्रवित हो गये क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे। यहाँ एक ओर येसु की दया का मनोभाव वहीं शिष्यों का स्वार्थी मनोभाव दिखाई पड़ता है जो हल ढूँढ़ने की कोशिश तो करते किन्तु बिना करुणा के। वे अपना हाथ गंदा करना नहीं चाहते थे।  

संत पापा ने कहा कि ईश्वर की भाषा जहाँ करुणा की भाषा है तो वहीं मनुष्यों की भाषा बहुधा उदासीनता की भाषा हो जाती है। हम भी कई बार सहानुभूति के द्वार को बंद कर देते हैं। संत पापा ने सलाह दी कि हम अंतःकरण की जाँच करें कि क्या हम दया के रास्ते पर पवित्र आत्मा द्वारा संचालित होते हैं?  

न्याय का कार्य

संत पापा ने बतलाया कि वे आज के सुसमाचार से बहुत प्रभावित हुए जिसमें येसु उस विधवा से कहते हैं, रोओ मत। उसके बाद वे शव का स्पर्श करते तथा युवक को उठने के लिए कहते हैं। युवक उठ बैठता है और बात करने लगता है। अंत में येसु उस युवक को उसकी माता को सौंप देते हैं।  

संत पापा ने कहा कि येसु ने वापस कर दिया। यही शब्द न्याय के लिए किया जाता है। दया हमें न्याय की सच्ची राह पर ले चलती है। अतः हमें उन चीजों को हमेशा वापस कर देना चाहिए जिन्हें उनपर अधिकार है। संत पापा ने कहा कि यह हमें स्वार्थ, उदासीनता और बंद होने से बचाता है।

संत पापा ने विश्वासियों को प्रभु की करुणा पर चिंतन करने हेतु निमंत्रण दिया तथा प्रभु से प्रार्थना की वे हमें करुणा का गुण प्रदान करें।  

17 September 2019, 17:21
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