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Synod of Bishops: A Christian obligation to welcome migrants प्रावसियों का स्वागत ख्रीस्तीय कर्तव्य इथोपियाई कार्डिनल ने प्रेस विज्ञाप्ति के दौरान प्रवासन मुद्दे पर व्यक्तव्य देते हुए यूरोप में अफ्रीका के प्रवासियों संग किये जा रहे व्यवहार के प्रति शोक व्यक्त किया।  Ethiopian Cardinal addressed the issue of migration at length today. He lamented how African migrants are treated in Europe. धर्माध्यक्षीय धर्मसभा में दस्तावेज ईन्त्रेमेन्तुम लाबोरिस के तीसरे भाग में बहुत से हस्तक्षेप किये गये। वाटिकन संचार विभाग के अधिकारी पॉलो रुफीनी ने  बुधवारीय प्रेस विज्ञाप्ति के शुरू में सभा को इस बात से अवगत कराया कि धर्मसभा ने युवाओं ने नाम पत्र लिखने का निर्णय लिया है जिसके लिए एक समिति का गठन किया जा चुका है।  उन्होंने ने कई मुद्दों के बारे में जिक्र किया जो धर्मसभा में चर्चा के विषय रहे हैं, इसमें मुख्य रुप से युवाओँ को पवित्र धर्मग्रंथ का अध्यायन करने में मदद करना जिससे वे उसके महत्व को अपने जीवन में समझ सकें। विश्वास पर जोर देते हुए उनसे कार्यों में परिलक्षित करना, सामुदायिक जीवन पर जोर के अलावे पश्चिमी देशों को उपवास की आश्वयकता जैसी बाते उभर कर आयी। कलीसिया में महिलाओं की भूमिका पुनः उभर कर आई। महिलाओँ की कलीसिया में भूमिका से संबंध में इस बात पर बल दिया गया कि कलीसिया को संस्कृतिक रुप में परिवर्तन की जरूरत है। उन्हें कलीसिया और समाज में समान स्थान देने की आश्वयकता  है। उन्होंने कहा कि धर्मसभा में इस बात का भी प्रस्तवाना के रुप में रखा गया कि महिलाओँ की धर्मसभा अयोजित किया जाये।  डा. रुफीनी ने कहा कि धर्मसभा में युवाओं हेतु परमधर्मपीठ या विभाग की स्थापना की प्रस्तावना आई। इसके मुख्य अधिकारी के अधिकार अन्य धर्मपीठ विभाग की तरह हो। इस संबंध में यह भी कहा गया कि एक महिला अधिकारिणी स्वरुप इस क्षेत्र में एक नई शुरूआत कर सकती है। जीवन में  अफ्रीकी देशों को प्रभावित करने वाले कई मुद्दों पर जिक्र किया गया जिसमें सतत विकास के प्रश्न उठाये गये। यह सतत विकास की कमी है जो आफ्रीकी देशों में आप्रवास का कारण बनात है। कलीसिया को चाहिए कि वह विकास के प्ररूप की खोज करते हुए उचित रुप में लागू करे यदि ऐसा नहीं होता तो हम सदैव प्रवास के परिमाणों को हल करने का प्रयास करेंगे लेकिन प्रणालीगत समस्याओं से निपट नहीं होगा। गुलामी की समस्या जो विभिन्न देशों की सहभागी है विचार एवं वाद-विवाद की विषय वस्तु रही।   पुरोहित अलेक्साद्रे आवी मेल्लो लोकधर्मियों, परिवार और जीवन हेतु गठित विभागीय अध्यक्ष ने कहा कि वे धर्मसभा की प्रक्रिया और क्रार्यविधि के फलस्वरुप जो कार्य हुए है वे उसे बहुत अधिक प्रभावित है। विश्व  के विभिन्न देशों में धर्मसभा में सहभागी अपने में अद्वितीय है।   प्रावास, यूरोप की अंतरआत्मा कहाँ है Migration: Where is Europe’s Christian conscience? इथोपिया के कार्डिलन बरहानेयेसस डेमेर्यू सूराफिल ने कहा कि अफ्रीका के अन्दर प्रवासऩ मुख्य रुप से युवाओँ को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि धर्मसभा में हथियारों के व्यपार पर कोई चर्चा नहीं की गई है। यह दुःख की बात है कि युद्ध असंख्या लोगों को पलायन के लिए बाध्य करता है। बच्चों को बहुधा हथियारों की बिक्री हेतु उपयोग किया जाता है।  उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि आफ्रीकी देशों में तकनीकी और अन्य चीजें की अपेक्षा जिसे धर्मसभा ने अपने विचार मंथन में लाया है यदि स्पष्ट रुप में कहा जाये तो उन बातों से अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा युवाओं की जीविका का सवाल है।  कार्डिनल ने खनिज पद्धार्थों के दोहन की बातें को रखते हुए कहा, विशेष कर कांगो में कोल्टन, जिसके कारण कितने ही गावों और परिवारों को विस्थापित होना पड़ा रहा है। खनन ने कितने ही युवाओं को प्रभावित किया है।  कार्डिनल सूराफिल ने यूरोप में अफ्रीकी देशों के नागरिकों के प्रति हो रहे व्यवहार पर अपने शोक व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि जब यूरोपीय अफ्रीकी देशों में आये तो यह उनके लिए सहज रहा लकिन अफ्रीका के लोगों के साथ वैसा बर्ताव नहीं किया जाता जैसा उनके साथ किया गया। उऩ्होंने प्रश्न किया, ऍ यूरोपवासियों के ख्रीस्त मूल्य कहाँ हैं। हम ख्रीस्तीयता को कहाँ जीते हैं। कर्डिनल ने कहा कि यह ख्रीस्तीय मूल्य, ख्रीस्तीय कर्तव्य है कि हम एक अजनबी का स्वागत करें। आप्रवासियों के संबंध में सरकारी नीतियों को ले कर उन्होंने कहा कि यह बात ख्रीस्तीय अंतकारण को स्पर्श करने वाली बात है।     समुदाय इटली के महाधर्माध्यक्ष मात्तेओ मरिया जुप्पी ने कहा कि धर्मसभा में सामुदायिकता का एहसास करते हैं जिसके फलस्वरुप हम सुनने के कार्य हो रहे हैं। यह हमें एकमत होने में मदद करता और हम अपने विचारों पर ध्यान दे सकते हैं। कलीसिया को आगे बढ़ने हेतु समुदाय की आवश्यकता है। उन्होने कहा कि संत पापा फ्रांसिस पहले व्यक्ति है जो समुदाय की बात करते हैं। यदि हम अपने याजकीयता और राष्ट्रवाद से बाहर निकला चाहते हैं तो यही हमारे लिए एक उपाय है। कलीसिया सभों के लिए कहती और सभों के साथ खड़ी होती है क्योंकि वह सभों के पास पहुँचना चाहती है। सामुदायिकता हमारी असल पहचान है उन्होंने कहा।  एक प्रेरितिक कलीसिया धर्मबहन अलेस्द्रा स्मेरेली, अर्थशास्त्र की प्रध्यापिका ने प्रेस विज्ञाप्ति के दौरान कहा कि धर्माध्यक्ष सचमुच में एक दूसरों की बातों को सुन रहें है जो छिछला नहीं है। वह उनके हृदय में युवाओं के लिए व्याप्त सच्चे स्नेह का अऩुभव कर सकती है। उन्होंने कहा कि वह एक प्रेरितिक कलीसिया का सपना देखती है। अर्थशास्त्र और पारिस्थितिकी एक दूसरे से जुड़े हुए है और पृथ्वी की रुदन को सुने बिना हम युवाओं और गरीबों की कराह को नहीं सुन सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम प्रर्यावण की चिंता नहीं करते तो हम अपने में एक नयी दरिद्रता को जन्म दे रहें है और यह युवा पीढ़ी है जो इसका शिकार होने वाली है।  उन्होंने संत पापा फ्रांसिस के विश्व पत्र की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि यदि कलीसिया लौदातो सी को कार्यान्वित करती यह सही अर्थ में विश्व के लिए एक अंतर लायेगा क्योंकि यह गरीबी और मनाव पीड़ा जैसे कई मुद्दों से जुड़ी है। संत मार्था प्रार्थनालय में प्रवचन देते हुए संत पापा फ्राँसिस  (@Vatican Media)

पवित्र आत्मा का खमीर मुक्ति का स्रोत

संत पापा फ्रांसिस ने अपने प्रातःकालीन मिस्सा बलिदान के दौरान पवित्र आत्मा के द्वारा मिलने वाले खमीर का जिक्र किया जो हमें मुक्ति प्रदान करता है।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने वाटिकन के अपने निवास संत मार्था के प्रार्थनालय में प्रातःकालीन मिस्सा के दौरान अपने प्रवचन में कहा कि हम पवित्र आत्मा के खमीर से अपने को प्रोषित होने दें जिसे येसु ने हमें “विरासत” के रुप में प्रदान किया है। उन्होंने संत लूकस के सुसमाचार पर चिंतन करते हुए दो तरह के लोगों के बारे में कहा जो अपने में एक दूसरे के विपरीत विकास करते हैं।

येसु को दिखावा नपसंद

संत पापा ने कहा कि येसु उस खमीर के बारे में कहते हैं जो हमें वृद्धि करता है लेकिन इसके अलावे एक दूसरा खमीर भी है जो “खराब” है जो हमें “बिगाड़” देता है। यह फरीसियों और उस समय के संहिता के ज्ञाताओं शस्त्रियों की “दिखावा” रुपी खमीर है। संत पापा ने इस पर जिक्र करते हुए कहा कि ये वे लोग हैं जो अपने में बंद हैं, अपने कार्यों को “दिखावे” के लिए करते हैं। वे दूसरों के सामने अपनी “तुरही” बजाते हैं। वे अपने हृदय के अंदर व्याप्त अपने “स्वार्थ” और अपनी “सुरक्षा” तक ही सीमित हैं। यदि कोई कठिन परिस्थिति जैसे की डाकू के हाथों में पड़ा अधमरा व्यक्ति, कोई कोढ़ग्रस्त व्यक्ति उनके जीवन में आता, तो वे अपने “हृदय के मनोभावों” अनुरूप अपना मुंह दूसरी ओर फेर लेते हैं।

संत पापा ने कहा कि येसु इस तरह के खमीर को खतरनाक बतलाते हैं। यह दिखावा है और इस तरह के दिखावे को येसु एकदम पसंद नहीं करते हैं। यह अपने में सुन्दर दिखलाई देता है, शिक्षित प्रतीत होता है लेकिन यह अंदर से खराब आदतों से भरा है। “तुम बाहर से सुन्दर दिखते लेकिन तुम कब्र के समान हो, जो अंदर सड़ी-गली चीजों से भरा है।” यह खमीर हमारे अन्दर विकसित होता है जहाँ हम अपने स्वार्थ के बारे में ही बाते करते हैं। इसका कोई भविष्य नहीं है। वही दूसरी ओर एक दूसरा व्यक्ति जो ठीक इसके विपरीत है जो अपने में बाहर की ओर विकसित होता है। यह हमें उत्तराधिकारी के समान बढ़ने में मदद करता है, जहाँ हम ईश्वरीय वदरानों के हकदार बनते हैं।

अनंत आनंद की प्रतिज्ञा

संत पापा ने संत पौलुस द्वारा ऐफेसियों को लिखे गये पत्र का जिक्र करते हुए कहा,“हमें येसु ख्रीस्त में उत्तराधिकारी होने का वरदान मिला है।” यह हमारा ध्यान अपने से बाहर निकलने की ओर कराता है।

हम अपने जीवन में गलती करते हैं लेकिन हम सुधार के लिए खुला रहते। हम गिरते हैं लेकिन हम खड़ा हो जाते। हम पाप करते लेकिन हम अपने पापों के लिए पश्चताप करते हुए उसके लिए क्षमा की याचना करते हैं। हम अपने आप से बाहर निकलते हैं जो हमें अनंत खुशी प्रदान करती है क्योंकि इसकी प्रतिज्ञा हमारे लिए की गई है। संत पौलुस हमारे लिए इसे पवित्र आत्मा का वरदान कहते हैं जो हमें ईश्वर की महिमा और स्तुति हेतु प्रेरित करता है।

हमारे हृदय की खुशी

संत पापा ने कहा कि येसु ख्रीस्त द्वारा पवित्र आत्मा की मुहर हमें अपने आप में सीमित नहीं करती वरन यह हमें अपने से बाहर जाने हेतु प्रेरित करती है। येसु ख्रीस्त हमसे चाहते हैं कि हम कठिनाइयों, तकलीफों, दुःखों में भी नये क्षितिज की ओर आशा में आगे बढ़ते जाये क्योंकि वे हमारे जीवन को पवित्र आत्मा की खमीर से पोषित करते हैं।

वह व्यक्ति जो अपने स्वार्थ से प्रेरित है वह अपना विकास करता है उसके हृदय में स्वार्थ का खमीर है। वह अपने आप तक सीमित होकर रह जाता है वह अपने रुप-रंग, सुन्दरता की चिंता करता है, वह अपने जीवन में व्याप्त कमजोरियों की ओर ध्यान नहीं देता है। येसु ऐसे लोगों को “ढ़ोगी की संज्ञा देते और उनसे हमें सचेत रहने को कहते हैं। संत पापा ने कहा कि अन्य दूसरे ख्रीस्तीय भी हैं जो पवित्र आत्मा के खमीर को स्वीकार नहीं करते हैं वे उन फरीसियों को समान हैं जिन्हें येसु फटकारते हैं, “फरीसियों के खमीर से सावधान रहो”। ख्रीस्तियों का खमीर पवित्र आत्मा है हमें जीवन की कठिनाइयों के बावजूद सदैव प्रेरित करता और हमारे पापों के बावजूद हमें आशा में बने रहने को मदद करता है। हम उनमें उस आशा को पाते हैं जो हमें ईश्वर की महिमा करते हुए आनंद की अनुभूति प्रदान करती है। ढ़ोगी अपने में इस बात को भूल जाते हैं कि खुश होने का अर्थ क्या है। 

19 October 2018, 16:55
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