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नव नियुक्त कार्डिनल महाधर्माध्यक्ष अंतोनी पूला का पुरोहितों और विश्वासियों द्वारा स्वागत नव नियुक्त कार्डिनल महाधर्माध्यक्ष अंतोनी पूला का पुरोहितों और विश्वासियों द्वारा स्वागत   (AFP or licensors)

प्रथम दलित कार्डिनल: 'मेरा मिशन, ज्यादा से ज्यादा गरीब बच्चों की मदद करना'

एक व्यापक साक्षात्कार में, हैदराबाद के महाधर्माध्यक्ष एवं इतिहास में पहले "दलित" नव नियुक्त कार्डिनल अंतोनी पूला ने अपने मिशन को "अधिक से अधिक गरीब बच्चों की मदद करने" के रूप में वर्णित किया है। वे 27 अगस्त की कंसिस्टरी में कार्डिनल बनेंगे और लाल टोपी धारण करेंगे। उन्होंने भारत के सबसे गरीब और अक्सर भुला दिए गए "अछूतों" की सेवा करने पर प्रति अपने मिशन को साझा किया।

माग्रेट सुनीता मिंज-वेटिकन सिटी

हैदराबाद, शनिवार 11 जून 2022 (वाटिकन न्यूज) : इतिहास में पहले "दलित" कार्डिनल, भारत हैदराबाद, के महाधर्माध्यक्ष अंतोनी पूला, जिन्हें 27 अगस्त की कंसिस्टरी में कार्डिनल बनाया जाएगा, का कहना है कि उनका मिशन "अधिक से अधिक गरीब बच्चों की मदद करना" है।

संस्कृत से व्युत्पन्न, "दलित" शब्द का अर्थ है "टूटा हुआ" या "दलित", और उन लोगों को संदर्भित करता है जो "सामाजिक स्थिति" में सबसे नीचे हैं कि उन्हें हिंदू समाज की चार-स्तरीय जाति व्यवस्था से बाहर माना जाता है। अक्सर "अछूत" के रूप में जाना जाता है, इन लोगों पर अत्याचार और बहुत शोषण किया गया है।

वाटिकन न्यूज के साथ एक लम्बे साक्षात्कार में, 60 वर्षीय नव नियुक्त कार्डिनल अंतोनी पूला, इस बात पर चिंतन करते हैं कि कैसे जाति व्यवस्था, भले ही तकनीकी रूप से समाप्त हो गई हो, अभी भी मौजूद है, यह धार्मिक स्वतंत्रता की वर्तमान स्थिति में भारत के छोटे ख्रीस्तीय अल्पसंख्यक के लिए 'अछूतों' की सेवा करने जैसा है।

प्रश्न: आपकी प्रतिक्रिया क्या थी, जब आपको पता चला कि संत पापा फ्राँसिस ने आपको कार्डिनल नामित किया है?

नव नियुक्त कार्डिनल अंतोनी पूलाः मैं उस दिन केरल में काथलिक करिश्माई नवीनीकरण (सीसीआर) के स्वर्ण जयंती समारोह में भाग ले रहा था। उस दिन सर्देनिया और कतानिया के मेरे कुछ दोस्तों ने मुझे एक संदेश भेजा, “कार्डिनल के रूप में नियुक्त होने के लिए आपको बधाई।” मेरा दोस्त इतनी अच्छी तरह से अंग्रेजी नहीं समझता है, इस बजह से मैंने कहा कि मैं केवल हैदराबाद का महाधर्माध्यक्ष हूं, कार्डिनल नहीं और 14 महीने से मैं यहां सेवा कर रहा हूं। फिर उन्होंने लिंक भेज दिया और लिखा कि संत पापा फ्राँसिस ने आज यही घोषणा की। उन्होंने मुझे बताया कि आपके नाम को संत पापा ने 17 मिनट, 12 या 13 सेकंड, पर घोषणा किया है।

प्रश्न: आपके लिए व्यक्तिगत रूप से यह नियुक्ति का क्या अर्थ है और आप संत पापा फ्राँसिस को सलाह देने और मदद करने के लिए कितने तत्पर हैं?

नव नियुक्त कार्डिनल अंतोनी पूलाः मैं सदमे में था। यह मेरे लिए आश्चर्य की खबर थी, जिसकी मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी। मैंने कभी सपना नहीं देखा। मुझे लगता है कि यह ईश्वर की कृपा है और संत पापा फ्राँसिस के माध्यम से यह उनकी इच्छा है, कि मैं इसे स्वीकार करता हूं। मैं इसे लोगों की सेवा करने, दक्षिण भारत और सभी क्षेत्रों  लोगों, विशेष रूप से तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के तेलुगु राज्यों में लोगों की सेवा करने के लिए एक महान अवसर के रूप में मानता हूं।

प्रश्न: संत पापा फ्राँसिस द्वारा इतिहास में पहला "दलित" कार्डिनल चुने जाने की आप क्या व्याख्या करते हैं? आपको क्या लगता है कि संत पापा क्या संदेश भेजने की कोशिश कर रहे हैं?

नव नियुक्त कार्डिनल अंतोनी पूलाः मुझे तभी समझ में आ गया था जब संत पापा फ्राँसिस ने परमाध्यक्ष का पद ग्रहण किया था। जैसा कि मैं व्यक्तिगत रूप से उन्हें समझता हूं: वे प्यारे, दयालु और गरीबों में से सबसे गरीब एवं दूर दराज तक पहुंचने वाले व्यक्ति हैं।  , इसलिए, जैसा कि हम हमेशा गरीबों और हाशिए पर रहने वालों को प्राथमिकता देते हैं, हमारे पास "गरीबों के लिए एक गरीब चर्च" का एक मजबूत संदेश है। मैं कह सकता हूं कि जब भी किसी प्रकार का विनाश आया, चक्रवात या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के माध्यम से, या हाल ही में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध का प्रकोप, मैं ब्रह्मांड के सभी लोगों के प्रति पवित्र पिता की चिंता देखता हूं। एक विशेष तरीके से, मुझे लगता है, शायद यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ पोप मुझसे गरीबों की समस्याओं को हल करने की उम्मीद कर रहे हैं, हाशिए पर रहने वालों की, और शायद दलितों की भी। इसका मतलब यह नहीं है कि हम उन अन्य लोगों की उपेक्षा करते हैं जो हमारी देखरेख में हैं। मुझे सौंपे गए सभी लोगों की जरूरतों में उनकी देखभाल करना मेरी जिम्मेदारी है।

प्रश्न: भारत में जाति व्यवस्था को तकनीकी रूप से समाप्त कर दिया गया है। लेकिन वास्तव में जमीनी स्थिति क्या है?

हम कह सकते हैं जाति व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया था, लेकिन कुछ सामाजिक कारक हैं। खैर, हम पूरी तरह से यह नहीं कह सकते कि उन्हें समाप्त कर दिया गया है। लेकिन वास्तविक स्थिति और जमीनी हकीकत, जहां तक ​​आपके सवाल का सवाल है, कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो वास्तव में अपनी प्रतिभा की पहचान और उनके द्वारा की जा रही विभिन्न गतिविधियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बहुत पहले, दलित, "अछूत" के लिए स्कूल या शिक्षा तक पहुंच की कोई संभावना नहीं थी। लेकिन अब भारत की सरकार ने विशेष रूप से हमारे राज्यों, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में, जहां से मैं आता हूं, इन हाशिए पर रहने वाले, गरीब और दलितों को अधिक अवसर दिया हैं,  गरीब लोगों को स्कूल जाने और पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुछ पढ़-लिख कर नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन उनके साथ अलग तरह से व्यवहार किया जाता है क्योंकि वे 'स्थानीय' नहीं हैं। मानव स्वभाव में थोड़ी सी ईर्ष्या है। मुझे लगता है कि मैं लोगों से जो उम्मीद करता हूं और जो हम अभ्यास करने की कोशिश करते हैं, वह लोगों और स्थितियों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है, इन अच्छी स्थितियों के बारे में भी जहाँ सभी लोगों के बीच समानता लाने की कोशिश की जा रही है।

प्रश्न:: क्या आप दलित लोगों या भारत के सबसे गरीब लोगों का कुछ ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जिसने आपको विशेष रूप से प्रभावित किया है या एक स्थायी छाप छोड़ी है?

मेरा जन्म कुरनूल  धर्मप्रांत में हुआ। लेकिन मैंने कडपा धर्मप्रांत के लिए सेमिनरी में प्रवेश किया। कुरनूल धर्मप्रांत का पड़ोसी है कडपा धर्मप्रांत। स्नातक के बाद मेरा पुरोहिताभिषेक हुआ। मेरी रुचि लोगों की सेवा करने में थी, चाहे पल्ली स्तर पर और डीनरी स्तर पर या संस्था में और मैंने प्रायोजन कार्यक्रम आदि के प्रभारी के रूप में कार्य किया। लेकिन हर पल्ली में दूरदराज गांव हैं। ये स्थान बहुत ही गरीब और सूखा क्षेत्र हैं। जब हमें गांवों में जाना होता है। हम केवल शाम को जा सकते हैं क्योंकि लोग दिन में काम पर जाते और शाम को गाँव लौटते हैं। हम  शाम को गांव के गिरजाघऱ का घंटी बजाते थे और बच्चों को इकट्ठा कर उनहें धर्म शिक्षा देते थे। और कभी-कभी कुछ लोग खाना बनाने के बाद गिरजा आते थे। तो यह देखना अद्भुत था। इनके प्रति मेरा स्नेह और दया बढ़ती गई। विशेष रूप से मुझे बच्चों को शिक्षा का उपहार देने की एक बड़ी जिम्मेदारी महसूस हुई उन्हें शिक्षित करना उन्हें महान उपहार देना है। मैं अपनी खुद की जीवन कहानी देख रहा हूं।

सातवीं कक्षा के बाद मुझे गरीबी के कारण स्कूल रोकना पड़ा था। मुझे लगा कि यह मेरी शिक्षा का अंत है। लेकिन मिशनरियों ने मुझमें दिलचस्पी ली और मुझे कडप्पा ले आए और मुझे शिक्षा के लिए मदद की। बी.ए. के बाद, जो, मुझे लगा कि मिशनरियों ने मुझे संभाला और मुझे स्कूल जाने में मदद की और मुझे एक योग्य  इन्सान बनाया। यही कारण है कि मैं सेमिनरी में प्रवेश करने के लिए में कडप्पा गया।

मेरा सारा जीवन मैं एक साधारण पुरोहित, साधारण मिशनरी रहा हूं। मैंने करीब दस साल मिशनरी के तौर पर काम किया। फिर कुछ वर्षों के लिए मैं कुछ अध्ययन करने के लिए यूएसए गया, लेकिन मैंने एक सहयोगी के रूप में ज्यादातर पल्लियों का काम किया। जब मैं दोबारा वापस आया तो मुझे स्पॉन्सरशिप प्रोग्राम दिया गया। मैं धर्मप्रांत के सभी काथलिक स्कूलों के उप प्रबंधक की तरह प्रभारी भी था। वहां इन गरीब लोगों तक पहुंच पाता था। उनमें से कुछ 90% दलित हैं, हाशिए पर हैं। ऐसे अन्य वर्ग भी हैं जहां गरीब लोग हैं जहां हमें उनकी जरूरतों को पूरा करने की जरूरत है।

 

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11 June 2022, 16:06