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धरती की पीड़ा दर्शाती है गरीबों की पुकार, सबकी पुकार

जलवायु-विज्ञान प्रोफेसर वीरभद्रन रामनाथन का कहना है कि धरती का रोना और गरीबों का रोना अब हर किसी का रोना बन गया है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग (विश्व तापमान में वृद्धि) के प्रभाव ने विश्व मौसम प्रणालियों के विनाश' को उजागर कर दिया है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार 27 अक्टूबर 2021 (वाटिकन न्यूज) : कुछ ही दिनों में, विश्व के नेता 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक होने वाले 26वें संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (कोप 26) के लिए ग्लासगो में एकत्रित होंगे। इसका एक उद्देश्य "पेरिस समझौते और जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के लक्ष्यों की दिशा में कार्रवाई में तेजी लाना" है। इस महत्वपूर्ण बैठक के पहले, वाटिकन न्यूज ने प्रोफेसर वीरभद्रन रामनाथन के साथ बात की, जो 2015 में पेरिस में कोप 21 के लिए वाटिकन प्रतिनिधिमंडल के विज्ञान सलाहकार थे। प्रो. रामनाथन ने भविष्यवाणी की है कि वर्तमान में हम जिस "अजीब मौसम" का अनुभव कर रहे हैं, अगर हम जल्दी से कार्य नहीं करते हैं तो यह 50% तक बढ़ जाएगा।

वाटिकन प्रतिनिधिमंडल, कोप 21 पेरिस, के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस
वाटिकन प्रतिनिधिमंडल, कोप 21 पेरिस, के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस

धरती माँ की पुकार

संत पापा के जलवायु वैज्ञानिक' कहे जाने वाले प्रोफेसर रामनाथन ने अपना पहला पेपर 1975 में दुनिया भर में हो रहे परिवर्तनों पर लिखा था जब वे इकतीस वर्ष के थे। वे कहते हैं, “इसके बाद, हमने इस बारे में मानवीय शब्दों में कभी बात नहीं की। हमने ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के स्तर में वृद्धि के बारे में बात की ... गर्मी और चरम मौसम के बीच यह परिवर्तन पिछले दस वर्षों में ही प्रकट हो गया।”

 

वाटिकन प्रतिनिधिमंडल, कोप 21 पेरिस, के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस

प्रो. रामनाथन कहते हैं, "धरती माँ हमें यह बताने की पूरी कोशिश कर रही है, 'तुम मुझे चोट पहुँचा रहे हो!' हमें लौदातो सी में संत पापा फ्राँसिस द्वारा कही गई बात और पृथ्वी की पुकार पर वापस जाना है। हमें इसे सुनना होगा। संत पापा फ्राँसिस कहते हैं कि धरती की पुकार गरीबों की पुकार के साथ सुनी जानी चाहिए।

प्रो. रामनाथन परमधर्मपीठीय विज्ञान अकादमी (गैब्रिएला क्लेयर मैरिनो/पीएएस) द्वारा आयोजित एक बैठक में भाग लेते हैं।
प्रो. रामनाथन परमधर्मपीठीय विज्ञान अकादमी (गैब्रिएला क्लेयर मैरिनो/पीएएस) द्वारा आयोजित एक बैठक में भाग लेते हैं।

धरती की पुकार

पृथ्वी किस प्रकार रो रही है? तापमान में वृद्धि उनमें से एक है। प्रो. रामनाथन कहते हैं कि उन्होंने 2018 में सहकर्मियों के साथ एक पेपर प्रकाशित किया था जिसमें भविष्यवाणी की गई थी कि 2030 तक तापमान 1.5 डिग्री बढ़ जाएगा। "यह अब से सिर्फ नौ साल बाकी रह गया है। 1 से 1.5 डिग्री तक जाना 50% प्रवर्धन है। कल्पना कीजिए कि हम जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं वह 50% बढ़ा हुआ है।”

तापमान में वृद्धि मौसम के पैटर्न में बदलाव को प्रभावित है क्योंकि दोनों एक दूसरे के साथ घनिष्ठ संबंध में हैं। प्रो.रामनाथन कहते हैं कि हम अभी "ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को देखना शुरू कर रहे हैं, जो पिछले दस से पंद्रह वर्षों में दुनिया की मौसम प्रणालियों के वैश्विक व्यवधान में बदल गया है। हर जगह लोग अजीबोगरीब मौसम का अनुभव कर रहे हैं, जो हर हजार साल में एक बार, हर पांच सौ साल में एक बार होना चाहिए, पर यह  दस साल में दो बार हो रहा है। आम तौर पर पैटर्न यह है कि शुष्क क्षेत्र सूख रहे हैं और गीले क्षेत्र और गीले हो रहे हैं। हल्की बारिश हो तो गीला अच्छा होगा। अगर यह जर्मनी में देखी गई बारिश की तरह है, तो यह भयानक है, यह लोगों सहित सब कुछ को बर्बाद कर देता है।”

संत पापा फ्राँसिस के साथ प्रोफेसर रामनाथन
संत पापा फ्राँसिस के साथ प्रोफेसर रामनाथन

गरीबों का रोना

प्रो. रामनाथन ने धरती की पुकार को गरीबों की पुकार से जोड़ने के लिए संत पापा फ्राँसिस की प्रशंसा की। वे कहते हैं, "मैंने इस बारे में संत पापा फ्राँसिस से बात की है। दुनिया में तीन अरब लोग जिन्होंने अभी भी जीवाश्म ईंधन का प्रयोग नहीं किया है, तापमान और मौसम में बदलाव से प्रभावित हैं।  वे अभी भी घर को पकाने और गर्म करने की अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जलाऊ लकड़ी और गाय के गोबर और जैविक कचरे को जला रहे हैं। लेकिन वे जीवाश्म ईंधन के सबसे बुरे परिणाम भुगतने जा रहे हैं। इन तीन अरब में से अधिकांश किसान हैं। लेकिन वे लाखों एकड़, हजारों एकड़ वाले पश्चिमी किसानों की तरह नहीं हैं। उनमें से प्रत्येक डेढ़ से एक एकड़ में खेती कर रहा है।”

मानसून में भारी बारिश आ रही है, यह भारत के किसानों के लिए एक बड़ी समस्या है। आप पूछेंगे कि 'इसमें क्या समस्या है?  जब भारी बारिश होती है, तो अधिकांश पानी समुद्र में चला जाता है और यह सभी पोषक तत्वों को मिट्टी से बाहर निकाल देता है।"

सबका रोना

अब न सिर्फ धरती मां, पृथ्वी और गरीब रो रहे हैं। अब हर कोई गरीब, मध्यम वर्ग और धनी समान रूप से ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को भुगत रहा है। बाढ़ का पानी और आग लोगों और पेड़ों के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं। प्रो रामनाथन ने व्यक्त किया कि उनका एक डर "यह है कि जलवायु परिवर्तन कोविद की तरह हमारे रहने वाले कमरों में चला आएगा, जिससे सभी प्रभावित होंगे।"

"मैं विशेष रूप से उन लोगों के बारे में सोच रहा हूँ जो उनकी उम्र 30 से 50 साल के बीच में हैं। वे अभी भी तनख्वाह से जी रहे हैं। वे अपने बच्चों को स्कूल भेजने की कोशिश कर रहे हैं।... और मैं सोच रहा हूँ कि अगले पांच, दस साल में बीमा कंपनियां दिवालिया हो जाएंगी, वे आपके घर का बीमा नहीं करा पाएंगी। जब मैं कहता हूँ कि यह हमारे रहने के कमरे में आने वाला है, याने बहुत से ऐसे लोग हैं जिनके पास अब आग और बाढ़ के कारण रहने के लिए कमरे नहीं हैं।”

क्रंदन को बदलना

प्रोफेसर रामनाथन कहते हैं कि हमारे पास चुनने के लिए विकल्प हैं, हम उस कहावत मेंढक की तरह बनना चुन सकते हैं जो कुछ भी नहीं करता है क्योंकि जिस पानी में वह डूबा हुआ है उसका तापमान तब तक बढ़ता है जब तक वह नष्ट नहीं हो जाता। “सौभाग्य से, हम उससे कहीं अधिक होशियार हैं। हम प्रतिक्रिया कर सकते हैं। अगर हम तैयार रहें तो हम अधिकांश आपदाओं से बच सकते हैं।"

प्रोफेसर रामनाथन अब यह नहीं मानते कि मौसम परिवर्तन चाल चल सकता है। "इस सब के लिए अभी बहुत देर हो चुकी है, मुझे यह कहते हुए खेद है। हमें मौसम के अनुकूल बनने के लिए एक बड़ी योजना की आवश्यकता है।” ठोस शब्दों में कहें तो इसका मतलब है कि किसानों को अपनी फसलों को नए मौसम के पैटर्न के अनुकूल बनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। "पहली बातयह है कि यह इस बात पर निर्भर करती है कि आप इस जलवायु हॉटस्पॉट में कहां हैं। क्या आप शुष्क क्षेत्र में सूख रहे हैं, या गीला क्षेत्र में गीला हो रहे है? यदि आप गीले में भींग रहे हैं, तो आपको यह पता लगाना होगा कि मिट्टी को कैसे फिर से भरना है क्योंकि बारिश सिर्फ इसे धो रही है।” कैलिफ़ोर्निया के सूखा क्षेत्र का एक उदाहरण लेते हुए, प्रोफेसर का कहते हैं कि वहां अब बादाम उगाना सुलभ नहीं है। वहाँ ऐसे फसलों को उगाने की जरुरत है जिन्हें कम पानी की जरुरत होती है।”

आज के "जलवायु संकेतों को देखते हुए, जलवायु पैटर्न को स्थानांतरित किया जा सकता है," इसके लिए "खाद्य जल के वैश्विक नियंत्रण" की आवश्यकता है। मैं अलग से भोजन पर चर्चा नहीं करूंगा। पानी और भोजन जीवित प्राणियों में ऑक्सीजन की तरह हैं।" इसके अलावा, छोटे पैमाने के किसानों की जरूरतों पर भी चर्चा करने की आवश्यकता है, "दक्षता न केवल उपज, दुनिया को खिलाने के मामले में, बल्कि इन तीन अरब मनुष्यों की भलाई के मामले में भी, जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन से आहत कर रहे हैं।"

संत पापा जॉन पॉल दवितीय के साथ प्रोफेसर रामनाथन
संत पापा जॉन पॉल दवितीय के साथ प्रोफेसर रामनाथन

संत पापा ने उन्हें 2004 में परमधर्मपीठीय विज्ञान अकादमी के सदस्य के रूप में नियुक्त किया था।

किसकी आवाज सुनी जाएगी?

दूसरा लक्ष्य "उत्सर्जन के वक्र को मोड़ना" है। प्रोफेसर रामनाथन स्वीकार करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के प्रति इस दृष्टिकोण का अत्यधिक राजनीतिकरण किया गया है। जब तक इसे राजनीतिक पैकेजिंग से अलग नहीं किया जाता है, तब तक यह लोगों को अलग करता रहेगा और विभाजन पैदा करता रहेगा।

“मैं देख रहा हूँ कि एकमात्र गैर-राजनीतिक मंच गिरजाघर, मंदिर, सिनॉगॉग, मस्जिद है। सभी लोग राजनीतिक पक्ष सुनते हैं। दुर्भाग्य से, मीडिया भी दोनों पक्षों में ध्रुवीकरण हो गया है। लोगों को तेजी से शिक्षित किया जाना है और विश्वास आधारित संगठन और नेता शून्य को भर सकते हैं। संत पापा फ्राँसिस ने इसकी शुरुआत लौदातो सी में की थी। हमने परमधर्मपीठीय अकादमी में कई बैठकें की हैं जहाँ विज्ञान, आस्था और नीति ने एक गठबंधन बनाया है और आप काथलिक सीधे गरीबों की नब्ज के संपर्क में हैं। यदि आप अन्य 50% में से 10% को मना सकते हैं, तो हमें बस इतना ही चाहिए। तब हम उचित नेताओं का चुनाव करेंगे जो कार्रवाई करेंगे।”

"मैं अपने सभी अंडे विश्वास की टोकरी में डाल रहा हूँ।"

संक्षिप्त परिचय: मूल रूप से भारत में चेन्नई के रहने वाले प्रो. रामनाथन ने भारत में अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर संयुक्त राज्य अमेरिका चले गए जहां उन्होंने न्यूयॉर्क के स्टेट यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वे वर्तमान में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय सान डिएगो में जलवायु स्थिरता में एडवर्ड ए. फ्रीमैन एंडोड के अध्यक्ष हैं। अक्टूबर 2004 में, संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें परमधर्मपीठीय विज्ञान अकादमी का शिक्षाविद नियुक्त किया।

 

 

27 October 2021, 15:38