खोज

Vatican News
पवित्र तृत्वमय ईश्वर पवित्र तृत्वमय ईश्वर  (Editrice Dei Merangoli )

त्रिएक ईश्वर का रहस्य कला द्वारा प्रस्तुत

त्रिएक ईश्वर के रहस्य को कला द्वारा प्रस्तुत करना, ख्रीस्तीय धर्म की पहली शताब्दी से आज तक एक चुनौती है कि इस अदृश्य को किस तरह चेहरा प्रदान किया जाए।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शनिवार, 29 मई 2021 (वीएनएस)- काथलिक कलीसिया पेंतेकोस्त महापर्व के बाद इस रविवार को त्रिएक ईश्वर (पवित्र तृत्वमय ईश्वर) का महापर्व मनायेगी।

पवित्र तृत्वमय ईश्वर ख्रीस्तीय धर्म की पहली शताब्दी से ही कई कलाकारों के लिए यह आकर्षण का केंद्र रहा है।

पोंटिफिकल लातेरन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं "ला त्रिनिता नेल्ल आरते" के लेखक मारियो दा बेल्लो ने वाटिकन न्यूज को बतलाया, "रोम के विया लातिना स्थित कटाकोम्ब में, चौथी शताब्दी की पहली तस्वीर है। तस्वीर में तीन दूत या राहगीर हैं जो अब्राहम को दिखाई दिए थे। कलीसिया के धर्माचार्य इसमें तृत्वमय ईश्वर का स्वरूप देखते हैं।" कला के पूरे इतिहास में पवित्र तृत्वमय ईश्वर की छवि एक वयोवृद्ध पिता, एक युवा पुत्र और कपोत के रूप में पवित्र आत्मा को दर्शाया गया है। ये तीनों आकृतियाँ ख्रीस्त के बपतिस्मा, उनके रूपांतरण और माता मरियम को रानी का मुकूट प्रदान किये जाने के समय भी प्रकट होते हैं।

इटली में आत्री स्थित महागिरजाघर में तीन सिरों वाले एक व्यक्ति का चित्र है जो दुर्लभ है। सत्रहवीं शताब्दी में, पोप पॉल 5वें ने इस छवि को यह कह कर मना कर दिया कि यह "मूर्तिपूजकों के देवताओं की छवियों के बहुत करीब।"

"महिमा के सिंहासन" के दृश्य का प्रचार किया जा सकता है, जिसमें पिता दुनिया को क्रूस पर चढ़ाए गए मसीह की ओर दिखाते हैं, जबकि पवित्र आत्मा कपोल के रूप में आकाश में उड़ता हुई दिखाई देते हैं।

इताली चित्रकार मासाचो ने संत मरिया नोवेल्ला में इसका एक उत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में बनाये गये धर्मशिक्षा के लिए आकर्षक एवं आध्यात्मिक प्रकृति के इस तस्वीर को सत्रहवीं शताब्दी में पवित्र तृत्वमय ईश्वर को दर्शाने के रूप में परिणत कर दिया गया था।

किताब के लेखक ने रोम के पियत्रो दा कोरतोना या बाचिचो के द्वारा भित्तीचित्र का हवला देते हुए कहा है कि मिलान में संत जेम्स और जॉन के गिरजाघर में इवान रूपनिक द्वारा चित्रित रूपांतरण के दिन के चित्र को आज भी देखा जाता है। भाषा हमेशा आलंकारिक होती है, लेकिन हमें अतीत से जुड़ी प्रतिमा के पुनरुद्धार का सामना नहीं करना पड़ रहा है क्योंकि बीजान्टिन परंपरा को आधुनिक रूपों में भी याद की जाती है।

 

29 May 2021, 13:40