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दलित मुक्ति रविवार दलित मुक्ति रविवार 

भारत के ख्रीस्तियों ने दलित मुक्ति रविवार मनाया

कलीसिया, समाज और देश में दलित ख्रीस्तियों के साथ भेदभाव जारी है। भारत के काथलिक, प्रोटेस्टंट और ऑर्थोडॉक्स ख्रीस्तियों ने दलित स्वतंत्रता रविवार मनाते हुए दलित ख्रीस्तियों के लिए न्याय, अधिकार और प्रतिष्ठा की मांग की।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

भारत, मंगलवार, 10 नवम्बर 2020 (ऊकान) – भारत के ख्रीस्तियों ने दलित ख्रीस्तियों के प्रति एकात्मता एवं सामीप्य व्यक्त करते हुए 8 नवम्बर को दलित स्वतंत्रता रविवार मनाया। 2017 से भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अनुसूचित जाति-पिछड़ा वर्ग हेतु कार्यालय एवं कलीसियाओं की भारतीय परिषद (प्रोटेस्टंट और ऑर्थोडॉक्स कलीसियाएँ) नवम्बर माह के दूसरे रविवार को दलित स्वतंत्रता रविवार मनाने के लिए एक साथ आते हैं। 

सरकारी आंकड़े अनुसार भारत के 1.2 बिलियन आबादी में से 201 मिलियन लोग सामाजिक रूप से वंचित समुदायों में आते हैं। भारत के 25 मिलियन ईसाइयों में से करीब 60 प्रतिशत दलित या आदिवासी मूल के हैं। अधिकांश दलित ख्रीस्तीय दक्षिणी राज्यों, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में हैं।

दलित महिलाओं पर ध्यान

8 नवम्बर के इस दिवस की विषयवस्तु थी, "चुनौतिपूर्ण जाति: दलित महिलाओं की गरिमा को प्रभावित करना।"

एस सी ̸ बी सी के लिए सीबीसीआई के अध्यक्ष, बरहमपुर के धर्माध्यक्ष सरत चंद्र नायक ने कहा, "यह भूमि जहाँ नारी देवियों की पूजा शक्ति, विद्या और धन के रूप में की जाती है, महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित जगह बन गयी है। तथ्य दिखलाते हैं कि दलित महिलाएँ, दलित पुरूषों की अपेक्षा अधिक दुःख सहती हैं।"  

उन्होंने कहा कि हाल के महीनों में कई दलित महिलाएँ हमले की शिकार हुई हैं और क्रूर तरीके से मार डाली गई हैं। उन्होंने खेद प्रकट करते हुए कहा कि अक्सर दलित पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाता है, जबकि अपराधी, राजनीतिक संरक्षक में, कानून के साथ हेरफेर करते हुए मुक्त रूप से घूमते हैं।"

मानसिकता और हृदय में परिवर्तन

धर्माध्यक्ष नायक ने गौर किया कि दलितों के खिलाफ हिंसा अक्सर जाति के पूर्वाग्रह के आधार पर होता है। अपराधियों दलित महिलाओं को प्रयोग करने और फेंके जाने वाली वस्तु की तरह देखते हैं। जब तक मानसिकता और हृदय में परिवर्तन नहीं होगा, भेदभाव एवं हाशिये के लोगों के विरूद्ध अपराध होते रहेंगे। उन्होंने कहा कि बदलाव तभी संभव है जब "हर परिवार सचेत और व्यवहारिक रूप से परिवारों में समान रूप से सम्मान एवं हर व्यक्ति के अधिकार को प्रोत्साहित किया जाए।"

उन्होंने खेद प्रकट किया कि भारत में, बुद्धिजावी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, नागरिक समाज के सदस्य और निष्पक्ष मीडिया, रणनीतिक रूप से खामोश कर दिये जाते हैं जबकि दूसरे, इस समय की सत्ता एवं विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के गुलाम बन जाते हैं।  

दलित मुक्ति रविवार एक ऐसा अवसर है जब पूरा ख्रीस्तीय समुदाय, दलित भाई बहनों खासकर, ख्रीस्तियों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को नवीकृत करते हैं।

तीन तरह से भेदभाव

सीबीसीआई के एस सी ̸ बी सी कार्यालय के अनुसार दलित ख्रीस्तीय तीन बार भेदभाव के शिकार होते हैं, अर्थात् कलीसिया में, समाज में और देश के द्वारा। दलितों ने सम्मान के साथ बेहतर जिंदगी की उम्मीद से ख्रीस्तीयता को अपनाया किन्तु कलीसिया के अंदर भी अख्रीस्तीय और भेदभाव पूर्ण व्यवहार जारी है।  

10 November 2020, 15:33