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नाज़रेथ गृह की संस्थापिका सिस्टर स्टान तेरेसा मुमुनी नाज़रेथ गृह की संस्थापिका सिस्टर स्टान तेरेसा मुमुनी  

घाना के "मनहूस बच्चों" के लिए आशा की एक किरण

घाना के येंदी में ईश्वर के बच्चों के लिए नाज़रेथ गृह की संस्थापिका सिस्टर स्टान तेरेसा मुमुनी ने विकृति के साथ पैदा हुए "मनहूस बच्चों" की देखभाल के लिए अपने जुनून को साझा किया, जो सांस्कृतिक विश्वासों के कारण हिंसा का शिकार भी होते हैं।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

घाना, सोमवार 20 जुलाई 2020 (वाटिकन न्यूज) : घाना के कुछ ग्रामीण हिस्सों में, शारीरिक विकृति के साथ पैदा होने वाले बच्चों को "मनहूस" माना जाता है। सांस्कृतिक प्रथाओं के कारण उनमें से कई को कहीं बाहर छोड़ दिया जाता है और कुछ मामलों में उन्हें मार दिया जाता है, क्योंकि उन्हें समुदाय के लिए बुरे भाग्य लाने वाला माना जाता है।

 ‘मरियन सिस्टर्स ऑफ यूखरिस्टिक लव (एमएएसईएल) धर्मसंघ की घाना निवासी सिस्टर स्टेन तेरेसा मुमुनी इन अस्वीकृत बच्चों के लिए आशा की किरण बन गई हैं। उसने उत्तरी घाना के येंडी धर्मप्रांत में, अनाथालय (नाज़रेथ होम फॉर गॉड्स चिल्ड्रन) की स्थापना की, जहाँ किसी भी धर्म, वर्ग या जातीय पृष्ठभूमि से आये अपंग बच्चों का स्वागत और पूरी तरह से देखभाल की जाती है।  

वाटिकन न्यूज के साथ एक साक्षात्कार में, सिस्टर मुमुनी ने बच्चों के लिए अपने जुनून, ईश्वर के लिए अपने प्यार और सांस्कृतिक बदलाव लाने के उनके महत्वपूर्ण कार्य का वर्णन किया।

 ईश्वर की योजना

सिस्टर मुमुनी ने कहा कि वह "मनहूस बच्चों" की देखभाल करने के लिए प्रेरित हुईं, क्योंकि इसी से उन्हें ईश्वर का आह्वान महसूस हुआ। उसने बताया कि 1994 में धर्मबहन बनने के बाद भी, उसे लगता था कि ईश्वर उससे कुछ और कराना चाहते हैं। वेंडी में विकृति के साथ पैदा हुए बच्चों की दुर्दशा के बारे में सुना और देखा। , उसने खुद को बच्चों की सेवा में समर्पित करने का फैसला किया। बच्चों की सेवा में उसने अपने लिए ईश्वर की योजना को पहचाना।

"मनहूस बच्चे"

सिस्टर मुमुनी ने बताया कि विकृति के साथ पैदा हुए बच्चों के खिलाफ हिंसा का अभ्यास कई साल पहले येंदी में हुआ था। आदिवासी - ईसाई, मुस्लिम और पारंपरिक उपासकों का मिश्रण - अभी भी कुछ अनुष्ठान और सांस्कृतिक प्रथाओं से दृढ़ता से प्रभावित हैं उनका मानना है कि विकृति वाले लोगों में बुरी आत्मा है और वे अपने क्षेत्र में, गाँव में किसी भी दुर्भाग्य के लिए जिम्मेदार हैं।

उन्होंने कहा कि बच्चों और यहां तक ​​कि विकलांग लोगों जैसे कि बहरे, गूंगे, लंगड़े, मिर्गी के मरीजों को हिंसा का शिकार होना पड़ता है।, सिस्टर मुमुनी ने कहा कि परिस्थिति को देखते हुए उसे लगा कि इन लोगों को ईश्वर की जरुरत है,  इन बच्चों को समाज की बुरी प्रथाओं से बचाने की जरूरत है।

चुनौतियां

सिस्टर मुमुनी ने बताया कि बच्चों के देखभाल की प्रारंभिक चुनौतियों में से एक था आवास। उसने समुदाय के मुस्लिम नेता के मिट्टी के घर को किराए पर लिया। इसे पुनर्निर्मित करने के बाद आखिरकार बच्चों के लिए रहने लायक घर बना।

घाना में पीने के पानी की बहुत किल्लत है। सिस्टर मुमुनी ने कहा कि येंडी के क्षेत्र में अभी भी पानी को लेकर काफी मुश्किलें हैं। उन्हें अक्सर दैनिक उपयोग के लिए भी पानी खरीदना पड़ता है।

उन्होंने कहा, " बहुधा मुझे बहुत दूर से पानी अपने सिर पर ढोना पड़ता है। खुद के लिए और बच्चों के पीने के लिए, स्नान करने और पकाने के लिए पानी की जरुरत है।

शुरुआती दिनों की एक और कठिनाई की याद करते हुए बताती हैं कि उन्हें धार्मिक जीवन की माँगों को पूरा करने के अलावा बच्चों की देखभाल भी स्वयं करना था, उसे मदद करने वाले कोई नहीं थे। परंतु अब उसके धर्मसमाज की अन्य बहनें मदद करने आ गई हैं। क्योंकि समाज इन्हें स्वीकार नहीं करता, अतः इन बच्चों के लिए अलग स्कूल की जरुरत है। उनके स्वास्थ्य देखभाल के लिए स्वास्थ्य केंद्र की जरुरत है।

 उन्होंने बताया कि अभी भी स्थानीय लोग उनसे खुलकर नहीं मिलते हैं। पर जबकभी उसे अवसर मिलता है वे लोगों को बताती हैं कि ये बच्चे मनहूस नहीं हैं और न ही किसी तरह की बुरी आत्मा इनमें है। वे हमारी तरह ईश्वर के बच्चे हैं। उन्हें भी प्यार और अपनापन दिखाने की जरुरत है।

20 July 2020, 13:09