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इम्फाल के महाधर्माध्यक्ष दोमनिक इम्फाल के महाधर्माध्यक्ष दोमनिक  

इम्फाल महाधर्मप्रांत ˸ ग्रहण करनेवाली कलीसिया से मिशनरी कलीसिया

इम्फाल भारत की उत्तरी पूर्वी भाग में चीन, म्यानमार, बंगलादेश, नेपाल और भूटान की सीमा पर स्थित है। इम्फाल के महाधर्माध्यक्ष दोमनिक लुमको जो मणिपूर की कलीसिया के प्रमुख हैं उन्होंने वाटिकन न्यूज को अपने महाधर्मप्रांत के बारे बतलाया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

भारत, मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019 (वीएन) ˸ भारत के उत्तर पूर्व स्थित सात राज्यों, अरूणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपूर, मेजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा को सात बहन राज्यों के रूप में जाना जाता है। इन राज्यों में ईसाईयों खासकर, प्रोटेस्टंट ख्रीस्तियों की संख्या काफी है। मणिपूर की कुल आबादी 2.85 मिलियन है जिनमें से अधिकतर जातीय और आदिवासी लोग हैं जो हिन्दू धर्म मानते हैं। यहाँ ख्रीस्तियों की संख्या 41 प्रतिशत है जिसमें काथलिकों की संख्या केवल 98,000 है।

इम्फाल के महाधर्माध्यक्ष दोमनिक कुछ ही दिनों पूर्व "अद लिमिना" मुलाकात (हर पाँच वर्ष में धर्माध्यक्षों की संत पापा से मुलाकात) हेतु रोम आये थे। उन्होंने वाटिकन न्यूज को कई जानकारियाँ दीं।

सात बहन राज्यों में कलीसिया

महाधर्माध्यक्ष दोमनिक ने कहा कि सुदूर क्षेत्र में होने और गरीबी के बावजूद, उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लोगों ने ख्रीस्त को स्वीकारा है। आज कलीसिया में उस क्षेत्र के कई धर्माध्यक्ष हुए हैं जो दूसरे धर्मप्रांतों में अपने पुरोहितों को मिशनरी के रूप में भेज रहे हैं। असम को छोड़ बाकी सभी क्षेत्रों में बहुत अधिक आर्थिक समस्या है। भौगोलिक रूप से सुदूर उन क्षेत्रों में कोई भी उद्योग नहीं है।

उत्तर पूर्वी क्षेत्र में काथलिक कलीसिया का आगमन 100 साल पहले हुआ है तथा वहाँ के आदिवासी एवं विभिन्न भाषाओं के लागों के द्वारा सुसमाचार को अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है। आज उन सात राज्यों में 15 धर्मप्रांत हैं और उनमें 50 स्थानीय धर्माध्यक्ष हैं।

मणिपूर की कलीसिया

मणिपूर की कलीसिया करीब 70 साल पुरानी है। वहाँ सबसे पहले डॉन बॉस्को के सलेशियन इताली मिशनरी आये थे किन्तु सन् 1960 के दशक में जब सरकार ने विदेशियों को भागने का आदेश दिया, तब वे दक्षिण भारत की ओर चले गये, विशेषकर, केरल राज्य की ओर और वहाँ कलीसिया का निर्माण किया। आज यदि मणिपूर की कलीसिया मजबूत है तो यह दक्षिण भारत के मिशनरियों के कारण सम्भव हुआ है।    

आरम्भ में काथलिक मिशनरी कभी-कभी, डिबरूगढ़, शिलोंग और अन्य स्थानों से आते - जाते रहते थे। जब इताली सलेशियन धर्माध्यक्ष ओरेस्ते मारेंगो डिबरूगढ़ के धर्माध्यक्ष थे, तब सन् 1951 में उन्होंने मणिपूर में दो पुरोहितों को स्थायी रूप से रहने के लिए भेजा। इसी मिशन की व्यवस्था के द्वारा मणिपूर में काथलिक कलीसिया की शुरूआत हुई। इसके बाद कलीसिया आगे बढ़ती गयी।

मणिपूर धर्मप्रांत की स्थापना सन् 1980 में की गयी जो 1995 में महाधर्मप्रांत बन गयी। इम्फाल के पहले महाधर्मप्रांत थे जोसेफ मित्ताथनी जो केरल के थे। 

 ग्रहण करने वाली कलीसिया से मिशनरी कलीसिया

महाधर्माध्यक्ष लुमोन ने कहा कि उन्होंने विश्वास को ग्रहण किया है और आज उनके कई युवा पुरोहित एवं धर्मसमाजी बनने के लिए आगे आ रहे हैं। वे सेवा करने के लिए दूसरे जगहों में जाने के लिए भी तैयार हैं। गुरूकुल छात्रों को पड़ोस के धर्मप्रांतों को भी अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

इस समय इम्फाल में पुरोहित एवं धर्मसमाजी बुलाहट हेतु 60 प्रतिशत स्थानीय लोगों की है। बुजूर्ग मिशनरियों का स्थान युवा धर्मसमाजी ले रहे हैं। फिर भी महाधर्माध्यक्ष ने कहा कि वे बाहर से आने वालों का भी स्वागत करते हैं।

युवाओं का पलायन

महाधर्माध्यक्ष ने कहा कि मणिपूर से दूसरे राज्यों की ओर पलायन एक बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि चूँकि मणिपूर में अवसर कम हैं अतः भारत के सभी बड़े शहरों में मणिपूर के युवाओं की संख्या काफी पायी जाती है। जो या तो अध्ययन करते अथवा नौकरी की तलाश कर रहे हैं।

शिक्षा

71 वर्षीय महाधर्माध्यक्ष के लिए इस समय शिक्षा की अति आवश्यकता है। आज उनकी 55 पल्लियों में और मिशन स्थानों में स्कूल खोले गये हैं जहाँ 15 साल से कम उम्र के करीब 70,000 विद्यार्थी पढ़ते हैं। सलेशियन पुरोहितों के द्वारा एक उत्तम कॉलेज चलाया जा रहा है, दो अन्य कॉलेज और नर्सिंग कॉलेज भी खोले गये हैं।

मणिपूर की कलीसिया युवाओं को शिक्षा एवं कौशल प्रदान करने की कोशिश कर रही है ताकि वे आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि वहाँ कोई तकनीकी शिक्षा नहीं दी जाती है क्योंकि वहाँ कोई उद्योग भी नहीं है जहाँ वे नौकरी कर सकें।

08 October 2019, 17:15