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कार्डिनल ऑस्वल्ड ग्रेसियस कार्डिनल ऑस्वल्ड ग्रेसियस 

बहुधार्मिक समाज में शांति के लिए शिक्षा

अंतरधार्मिक वार्ता हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति एवं कलीसियाओं की विश्व परिषद ने एक संयुक्त पत्र प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, "बहुधार्मिक समाज में शांति के लिए शिक्षा ˸ कलीसियाई दृष्टिकोण"। कार्डिनल ऑस्वल्ड ग्रेसियस ने महाराष्ट्र में इसे युवा, खेल एवं शिक्षा के संचालकों के लिए प्रस्तुत किया। जिसमें गहरे आत्मज्ञान, दूसरों के प्रति खुला, संचार संसाधनों के सावधानी पूर्वक प्रयोग एवं व्यक्तिगत आध्यात्मिक विकास के साथ शांति के लिए शिक्षा पर जोर दिया गया है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

मुम्बई, शनिवार, 3 अगस्त 2019 (रेई)˸ "शांति निर्माण में शिक्षा की एक बड़ी भूमिका है जब हम बहु-सांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज में जीते हैं।" उक्त बात मुम्बई में संत अंद्रेयस कॉलेज के रेक्टर फादर माजी मुरजेल्लो ने एशियान्यूज से कही। 

ख्रीस्तीय स्कूलों और अन्य अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती चरमपंथी घटनाएं शांति के लिए शैक्षिक प्रयासों को और भी जरूरी बताती हैं। यही कारण है कि "एडूफोकस" (स्कूल मैगजीन) के जुलाई अंक में अंतरधार्मिक वार्ता हेतु गठित परमधरमपीठीय समिति एवं कलीसियाओं की विश्व परिषद द्वारा संयुक्त रूप से जारी एक पत्र पर प्रकाश डाला गया है।

ख्रीस्तियों के अनुसार शिक्षा पर ईशशास्त्रीय चिंतन के बाद लेख में, शांति स्थापित करने हेतु शिक्षा के विभिन्न चरणों के बारे बतलाया गया है। इस दस्तावेज का उद्देश्य है ख्रीस्तियों के बीच जागरूकता लाना और यह भी उम्मीद की गयी है कि इससे दूसरे धर्म के लोगों को भी प्रेरणा मिल सकती है।

एडूफोकस में अंतरधार्मिक वार्ता हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति के सचिव मोनसिन्योर इन्दूनिल के कोदिथूवाक के संदेश को भी शामिल किया गया है जिन्होंने कहा है, "हम एक टूटे हुए समाज में जीते हैं जिसमें जाति, धर्म और अन्य चीजों ने नाम पर हिंसा एवं तनाव के कारण घाव हो गये हैं। चूँकि बच्चे इन तनावों का प्रहार सहते हैं यह अति आवश्यक है कि उनके घावों को चंगा किया जाए, ताकि उन्हें एक शांतिमय भविष्य प्रदान किया जा सके। हम मानते हैं कि स्कूल ही आने वाले कल के नागरिकों को विकसित करने वाली संस्था है। समावेशी शिक्षा ही एक समावेशी समाज को आकार देती है।

मोनसिन्योर ने संत पापा फ्राँसिस द्वारा शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिये जाने की भी याद की है। अबूधाबी के अपने भाषण में संत पापा ने कहा था कि शिक्षा का अर्थ है "निकालना, निचोड़ना, आत्मा के अनमोल संसाधनों को प्रकाश में लाना।" उन्होंने कहा था कि आपस में संबंध जोड़ने में भी शिक्षा है।  

एक प्राचीन कहावत – "अपने आप को जानें", उसमें हमें जोड़ना चाहिए कि अपने भाई-बहनों को भी जानें। उनके इतिहास, उनकी संस्कृति और उनके विश्वास को क्योंकि दूसरों के बिना सच्चा आत्मज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। मानव-प्राणी के रूप में और उससे भी बढ़कर भाई-बहन के रूप में, आइये हम एक-दूसरे को याद दिलायें कि कोई भी मनुष्य हमसे अजनबी नहीं रह सकता। भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि हम खुली पहचान बना सकें और कठोर बनने के प्रलोभन पर काबू पाने में सक्षम हो सकें। संस्कृतियों को बढ़ावा दें, घृणा को कम करें तथा सभ्यता एवं संस्कृति में बढ़ें। शिक्षा और हिंसा दोनों विपरीत दिशा में हैं।

03 August 2019, 17:52