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भारत के विद्यार्थी प्रार्थना करते हुए भारत के विद्यार्थी प्रार्थना करते हुए   (ANSA)

ख्रीस्तीय स्कूलों पर उच्च न्यायालय की टिप्पणी का विरोध

मद्रास उच्च न्यायालय ने ख्रीस्तीय मिशनरियों पर जबरन धर्मांतरण का आरोप लगाया है। ख्रीस्तीय कॉलेज के शिक्षक पर 34 महिला छात्रों के उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। तमिलनाडु के धर्माध्यक्ष के लिए, इस तरह के आरोप सांप्रदायिकता के माहौल में खेदजनक है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

मुम्बई, बुधवार, 21 अगस्त 2019 (रेई)˸ मद्रास उच्च न्यायालय ने ख्रीस्तीय स्कूलों में छात्रों पर जबरन धर्मांतरण और यौन शोषण का गंभीर खतरा बतलाया है। तमिलनाडु के काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के अध्यक्ष मोनसिन्योर अंतोनी पाप्पुस्वामी ने इन आरोपों को झूठा कहा है।    

उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी शुक्रवार को उस समय आयी जब मद्रास ख्रीस्तीय कॉलेज में सहायक प्रोफेसर सामुएल टेनिसन से जुड़ी एक सुनवाई की गयी। अदालत में जूलोजी विभाग के तृतीया वर्ष की 34 छात्राओं पर यौन उत्पीड़न का आरोप दर्ज किया गया था। कथित उत्पीड़न मैसूर, बेंगलुरु (बैंगलोर) और कूर्ग की शैक्षणिक यात्रा के दौरान पिछले जनवरी को हुआ था।

न्यायमूर्ति एस. वैद्यनाथन ने कहा था कि "विद्यार्थियों के अभिभावकों में एक आम भावना है, खासकर, छात्राओं के लिए कि ख्रीस्तीय संस्थाओं में सह-शिक्षा अध्ययन, उनके बच्चों के भविष्य के लिए अत्यधिक असुरक्षित है।"

उन्होंने कहा था कि "वर्तमान समय में अन्य धर्मों के लोगों को ख्रीस्तीय धर्म में अनिवार्य रूप से धर्मांतरण कराने में उनके खिलाफ कई आरोप हैं। यद्यपि वे अच्छी शिक्षा देते हैं तथापि उनकी नैतिकता का प्रचार एक मिलियन डॉलर का सवाल होगा।"

हालांकि, मोनसिन्योर पाप्पुस्वामी ने न्यायमूर्ति एस. वैद्यनाथन की इन दोनों टिप्पणियों को खेदजनक बतलाया है। उन्होंने कहा है कि "उच्च न्यायालय से आने वाले इस तरह के विचार में आम जनता के सामने हमारी संस्था की ख्याति को क्षति पहुँचाने की  कोशिश है।"  

धर्माध्यक्ष ने गौर किया कि कलीसिया के धर्मगुरू अदालत के मामले में शायद ही कभी बोलते हैं। फिर भी वे इस परिस्थिति में बोलने के लिए अपने आप को बाध्य महसूस करते हैं क्योंकि इस तरह के विचार लोगों की राय में बदलाव लायेंगे, विशेषकर, सांप्रदायिक आरोप के माहौल में जो इन दिनों देश में बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के प्रति पूर्ण सम्मान के साथ उनके द्वारा ख्रीस्तीय संस्थाओं पर की गयी दो टिप्पणियों पर वे अपना विचार व्यक्त करना चाहते हैं।      

उन्होंने कहा, पहला कि प्रोफेसर टेनिसन की जाँच धर्मांतरण से संबंधित कोई सवाल नहीं है इसलिए, धर्मांतरण पर उक्त अवलोकन अनुचित है। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है तथा प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता, उसके अभ्यास और प्रचार  की गारंटी देता है। (अनुच्छेद. 25(1))

उन्होंने कहा कि जबरन धर्मांतरण परस्पर-विरोधी है। एक ख्रीस्तीय के रूप में हम जबरन धर्मांतरण पर विश्वास नहीं करते हैं। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और मानते हैं कि सभी धर्मों में सच्चाई के बीज होते हैं। साथ ही साथ, विवेक और व्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से पवित्र है, जो उनकी मानवीय गरिमा में निहित है।

सबूत की कमी को देखते हुए मोनसिन्योर पाप्पुस्वामी ने सह-शिक्षा में असुरक्षा की धारणा पर दूसरा सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि ख्रीस्तीय समुदाय सदियों से भारत में शिक्षा से जुड़ी है तथा सिर्फ तमिलनाडु राज्य 5,000 से अधिक ख्रीस्तीय स्कूलों का घर है।

धर्माध्यक्ष के अनुसार, इन संस्थाओं में, जाति और धर्म का भेदभाव किये बिना, राष्ट्र-निर्माण के लिए धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान किये जा रहे हैं। उनके पास 300 वर्षों का इतिहास है, जिसमें उन्होंने लाखों नागरिकों और परिवारों के जीवन में योगदान दिया है, विशेषकर, हाशिए पर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए।

भारतीय ख्रीस्तियों की वैश्विक परिषद के अध्यक्ष साजन के जॉर्ज ने इस मुद्दे पर बोलते हुए गौर किया कि भारतीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद स्वयं ने कई अवसरों पर ख्रीस्तीय शिक्षा के महत्व पर जोर दिया है।

राष्ट्रपति कोविंद ने कहा है कि मिशनरी संस्थाएँ छात्रवृत्ति और शैक्षणिक उत्कृष्टता के प्रतीक हैं।

उन्होंने कहा है कि वास्तव में ख्रीस्तीय समुदाय जिनका इतिहास 2000 सालों पुराना है और जिसने हमारी मिश्रित संस्कृति को बहुत अधिक योगदान दिया है- शिक्षा के लिए एक विशेष भूमिका निभाई है।

21 August 2019, 16:33