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गरीब आदिवासी लोगों की मदद करते राँची के धर्माध्यक्ष गरीब आदिवासी लोगों की मदद करते राँची के धर्माध्यक्ष 

झारखंड के धर्माध्यक्षों द्वारा सरना कोड की मांग

भारत के काथलिक धर्माध्यक्षों ने अगले वर्ष की जनगणना में सरना कोड की मांग की है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

काथलिक धर्माध्यक्षों ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेंन से अपील की है कि सरना या आदिवासी धर्म को मान्यता एवं पहचान दी जाए। 19 सितम्बर के पत्र में राँची महाधर्मप्रांत के धर्माध्यक्षों ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि संविधान के तहत आदिवासी लोगों को विशेष दर्जा दिया गया था।

राँची के महाधर्माध्यक्ष फेलिक्स टोप्पो द्वारा प्रेषित पत्र में "भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25,29 और 342 में आदिवासी समुदाय के अधिकार, उनकी भाषा, धर्म, संस्कृति और अलग पहचान की गारांटी दी गई है। अतः उन्हें अलग सरना कोड दिया जाना चाहिए।"  

उन्होंने कहा है, "हम झारखंड सरकार से मांग करते हैं कि चल रहे विधानसभा सत्र में, आदिवासियों की पहचान की रक्षा को लेकर एक विधेयक पास किया जाए तथा 2021 में सरना कोड को जनगणना में शामिल करने के लिए प्रस्ताव पारित कर संघीय सरकार को भेजा जाए।"

धर्माध्यक्षों ने झारखंड सरकार से यह भी अपील की है कि जब तक संघीय सरकार सरना संहिता को मान्यता नहीं देती, तब तक राज्य में नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को लागू नहीं करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। इस बीच झारखंड की राजधानी राँची में 20 सितम्बर को एक रैली निकाली गई थी जिसमें आदिवासियों के अधिकारों की मांग की गई।

राँची में केंद्रीय सरना समिति के महासचिव संतोष तिरकी ने ऊका समाचार से कहा, "हम सरना कोड के लिए अंदोलन कर रहे हैं और हमारे लोग गाँव जाकर इस आंदोलन के महत्व की जानकारी दे रहे हैं।  

उन्होंने कहा, "भारत में सरना धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या करीब 150 मिलियन है और हम कई सालों से सरना धर्म के पहचान की मांग कर रहे हैं। कई राजनीतिक नेताओं ने चुनाव अभियान के दौरान इसको पूरा करने का वादा किया किन्तु बाद में वे भूल गये।"

झारखंड के आदिवासी सलाहकार समिति के सदस्य रतन तिरकी ने उका समाचार को बतलाया कि 2021 में जनगणना होने पर सरना कोड लोगों को आदिवासी लोगों के रूप में पंजीकृत करने में सक्षम करेगा और आदिवासी पहचान, भाषा और संस्कृति के संरक्षण की गारंटी भी देगा।

उन्होंने कहा कि सरना आदिवासी प्रकृति की पूजा करते हैं। वे जंगल, पर्वत और नदी का सम्मान करते हैं वे किसी धार्मिक समुदाय से ताल्लुक नहीं रखते। वे 1990 के दशक से ही अलग कोड की मांग कर रहे हैं।  

1951 की जनगणना में "जनजाति" के लिए नौवां कोलम शामिल था, जिसे बाद में हटा दिया गया। इसको हटाये जाने के कारण, आदिवासी आबादी ने विभिन्न धर्मों को अपना लिया, जिससे समुदाय को बड़ा नुकसान हुआ। 1951 के बाद हिन्दू, मुस्लिम, सक्ख, ईसाई, जैन और बौद्ध के बाद जिसमें अन्य लिखा हुआ था जिसको 2011 में हटा दिया गया।

हिन्दू समर्थक भारतीय जनता दल की संघीय सरकार तथा इसके हिंदू राष्ट्रवादी विंग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आदिवासी लोगों को हिंदुओं के रूप में पंजीकृत करना चाहता है।  

झारखंड में कुल 33 मिलियन आबादी में से करीब 1.4 मिलियन लोग ख्रीस्तीय है जिनमें से अधिकांश आदिवासी हैं।

22 September 2020, 14:28