संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  (AFP or licensors)

पोप फ्राँसिस ने पाँच कार्डिनलों द्वारा प्रस्तुत संदेह का जवाब दिया

विश्वास के सिद्धांत के लिए गठित परमधर्मपीठीय विभाग ने “संदेह” (सवालों) पर संत पापा के जवाब को प्रकाशित किया है जिसको पाँच कार्डिनलों ने प्रस्तुत किया था। सवाल, दिव्य प्रकाशना की व्याख्या, समलैंगिक जोड़ों को शादी आशीष दिये जाने, कलीसिया के एक संवैधानिक आयाम के रूप में धर्मसभा, महिलाओं के पुरोहित अभिषेक और पापस्वीकार संस्कार में पश्चाताप एक आवश्यक शर्त से संबंधित हैं।

वाटिकन न्यूज

संत पापा ने पाँच संदेहों (सवालों) का जवाब दिया है जिसको पिछली जुलाई में कार्डिनल वाल्टर ब्रानडमुल्लर और रेमंड लेओ बुर्क ने भेजा था जिसका समर्थन तीन अन्य कार्डिनल जुवन संदोवाल इनिग्वेज, कार्डिनल रोबर्ट सराह और कार्डिनल जोसेफ जेन जे कियुन ने किया था।

सवाल इटालियन में है जिसका उत्तर संत पापा ने स्पानी में दिया है जिसे सोमवार को विश्वास के सिद्धांत के लिए स्थापित विभाग की वेबसाईट पर प्रकाशित किया गया।

नीचे संदेह के जवाब का हिन्दी अनुवाद दिया जा रहा है :

कई कार्डिनलों द्वारा प्रस्तुत संदेह पर पोप फ्राँसिस का जवाब

प्रिय भाइयों,

हालाँकि मेरा मानना है कि सीधे तौर पर मुझसे पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देना हमेशा विवेकपूर्ण नहीं होता है, और उन सभी का उत्तर देना असंभव है, इस मामले में, धर्मसभा की निकटता को देखते हुए, मैंने ऐसा करना उचित समझा है।

1. संदेह, इस दावे के संबंध में है कि क्या ईश्वरीय प्रकाशना की वर्तमान सांस्कृतिक और मानवशास्त्रीय परिवर्तनों के आधार पर पुनर्व्याख्या की जा सकती है।

कुछ धर्माध्यक्षों के बयानों के बाद, जिन्हें न तो सही किया गया है और न ही वापस लिया गया है, हम पूछते हैं कि क्या हमारे समय के सांस्कृतिक परिवर्तनों और इन परिवर्तनों से मिले नई मानवशास्त्रीय दृष्टि के अनुसार कलीसिया में ईश्वरीय प्रकाशना की पुनर्व्याख्या की जानी चाहिए। अथवा, इसके विपरीत, ईश्वरीय प्रकाशना हमेशा के लिए बंधनकारी, अपरिवर्तनीय है और इसलिए द्वितीय वाटिकन महासभा के आदेश अनुसार, इसका खंडन नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें कहा गया है कि "विश्वास की आज्ञाकारिता" प्रकाशना करनेवाले ईश्वर को दी जानी चाहिए, (देई वेरबुम 5); कि सभी राष्ट्रों के उद्धार के लिए जो प्रकट किया गया है उसे "हमेशा के लिए संपूर्ण और जीवित" रहना है, और "सभी पीढ़ियों को सौंप दिया जाना है" (7), और समझ में प्रगति का मतलब चीजों और शब्दों की सच्चाई में बदलाव नहीं है क्योंकि विश्वास "एक बार और सभी के लिए सौंपा गया है।" (8),

और कलीसिया की धर्मशिक्षा ईश वचन से ऊपर नहीं है बल्कि सिर्फ वही सिखाती है जो उसे हस्तांतरित किया गया है।(10)

पहला संदेह का जवाब

क) उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप "पुनर्व्याख्या" शब्द को क्या अर्थ देते हैं। यदि इसे "बेहतर व्याख्या" के रूप में समझा जाता है, तो अभिव्यक्ति मान्य है। इस अर्थ में, द्वितीय वाटिकन महासभा ने पुष्टि की कि यह आवश्यक है कि व्याख्याताओं के काम से - और मैं धर्मशास्त्रियों को जोड़ूंगा - "कलीसिया का निर्णय परिपक्व हो।"(द्वितीय वाटिकन महासभा, डॉगमैटिक संविधान देई वेरबुम,12)

ख) इसलिए, जबकि यह सच है कि ईश्वरीय प्रकाशना अपरिवर्तनीय है और हमेशा बाध्यकारी है, तो कलीसिया को विनम्र होना चाहिए और यह पहचानना चाहिए कि वह कभी भी अपनी अथाह समृद्धि को समाप्त न करे और उसे अपनी समझ में बढ़ने की जरूरत है।

ग) नतीजतन, वह अपनी धर्मशिक्षा में खुद की पुष्टि की गई बातों की समझ में भी परिपक्व हो गई है।

घ) इतिहास में सांस्कृतिक परिवर्तन और नई चुनौतियाँ प्रकाशना को संशोधित नहीं करती हैं, लेकिन हमें इसकी प्रचुर समृद्धि के कुछ पहलुओं को बेहतर ढंग से व्यक्त करने के लिए प्रेरित करती हैं।

ड.) यह अपरिहार्य है कि इससे धर्मशिक्षा के कुछ पिछले बयानों की बेहतर अभिव्यक्ति हो सकती है, और वास्तव में, पूरे इतिहास में यही स्थिति रही है।

च) एक ओर, यह सच है कि धर्मशिक्षा ईश्वर के वचन से श्रेष्ठ नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि धर्मग्रंथ और परंपरा की गवाही दोनों को, सांस्कृतिक परिस्थिति से उनके चिरस्थायी तत्व को अलग करने के लिए व्याख्या की आवश्यकता होती है। यह स्पष्ट है, उदाहरण के लिए, बाइबिल के ग्रंथों (जैसे निर्गमन 21:20-21) और कुछ धर्मशिक्षाओं, जिसमें गुलामी बर्दाश्त की गई है। (पोप निकोलास V, बुल डम डाईवरसेस, 1452) मानव व्यक्ति की अविभाज्य गरिमा के शाश्वत सत्य के साथ इसके घनिष्ठ संबंध को देखते हुए यह कोई मामूली मुद्दा नहीं है। इन ग्रंथों की व्याख्या की आवश्यकता है। यही बात नए नियम में महिलाओं के संबंध में कुछ विचारों (1 कुरिन्थियों 11:3-10; 1 तीमुथियुस 2:11-14) और पवित्रशास्त्र के अन्य ग्रंथों और परंपरा के साक्ष्यों पर भी लागू होती है जिन्हें आज भौतिक रूप से दोहराया नहीं जा सकता है। इस बात पर जोर देना महत्वपूर्ण है कि "मुक्ति को सभी के लिए" प्रकट किया गया है वह बदल नहीं सकता (द्वितीय वाटिकन काउंसिल, हठधर्मी संविधान देई वर्बम, 7)। इसलिए, कलीसिया को लगातार इस बात पर विचार करना चाहिए कि मुक्ति के लिए क्या आवश्यक है और क्या इस लक्ष्य से गौण या कम सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। इस संबंध में, मैं याद दिलाना चाहूंगा कि संत थॉमस एक्विनास ने क्या पुष्टि दी थी: "जितना अधिक कोई विस्तार के मामलों में उतरता है, उतनी ही अधिक बार हमें दोषों का सामना करना पड़ता है" (सुम्मा थियोलॉजी I/II क्यू. 94, कला. 4)। अंत में, किसी सत्य के एक भी सूत्रीकरण को कभी भी पर्याप्त रूप से नहीं समझा जा सकता है यदि इसे संपूर्ण रहस्योद्घाटन के समृद्ध और सामंजस्यपूर्ण संदर्भ से अलग करके प्रस्तुत किया जाता है। "सत्यों के पदानुक्रम" का तात्पर्य उनमें से प्रत्येक को केंद्रीय सत्यों और कलीसिया की संपूर्ण शिक्षा के साथ उचित संबंध में रखना भी है। यह अंततः एक ही सिद्धांत को प्रस्तुत करने के विभिन्न तरीकों को जन्म दे सकता है, भले ही "उन लोगों के लिए जो सभी के द्वारा संरक्षित सिद्धांत के एक अखंड निकाय की इच्छा रखते हैं और बारीकियों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते, यह अवांछनीय लग सकता है और भ्रम पैदा कर सकता है। लेकिन वास्तव में इस तरह की विविधता सुसमाचार की अटूट संपदा के विभिन्न पहलुओं को सामने लाने और विकसित करने का काम करती है" (इवेंजेली गौदियुम, 40)। प्रत्येक धार्मिक धारा के अपने जोखिम हैं, लेकिन इसके अवसर भी हैं।

2. ड्यूबियम (संदेह) इस संबंध में कि क्या समलैंगिक संबंध की व्यापक प्रथा को शादी आशीष देना प्रकाशना और धर्मशिक्षा (सीसीसी 2357) के अनुसार है।

दिव्य प्रकाशना के अनुसार, पवित्र धर्मग्रंथ में प्रमाणित, जिसे कलीसिया सिखाती है, "इसे श्रद्धापूर्वक सुनना, ईमानदारी से इसकी रक्षा करना और ईश्वर के आदेश के अनुसार और पवित्र आत्मा की मदद से इसे ईमानदारी से समझाना" (देई वेरबुम, 10), "शुरु में," ईश्वर ने मानव जाति को अपने प्रतिरूप में बनाया, उन्होंने उन्हें ईश्वर की छवि में बनाया; उन्हें नर और मादा बनाया, और उन्हें फलने-फूलने का आशीर्वाद दिया (उत्पत्ति 1:27-28) और इसलिए, प्रेरित संत पौलुस सिखाते हैं कि यौन अंतर को नकारना सृष्टिकर्ता को नकारने का परिणाम है (रोमियों 1:24-32)।

हम पूछते हैं: क्या कलीसिया इस "सिद्धांत" से विचलित हो सकती है, वेरितातिस स्प्लेंडर, 103 में सिखाई गई बातों के विपरीत, क्या इसे एक आदर्श मात्र मान सकती है, और "संभावित अच्छाई" के रूप में उद्देश्यपूर्ण रूप से पापपूर्ण स्थितियों को स्वीकार कर सकती है, जैसे कि समलैंगिक संबंध, प्रकाशना के धर्मसिद्धांत से विचलित हुए बिना?

दूसरे संदेह पर संत पापा का जवाब

क)    कलीसिया में विवाह के बारे में बहुत स्पष्ट समझ है: एक पुरुष और एक महिला के बीच एक विशिष्ट, स्थिर और अविभाज्य मिलन, जो स्वाभाविक रूप से प्रजनन के लिए खुला है। केवल इस मिलन को "विवाह" कहा जा सकता है। मिलन के अन्य रूपों को केवल "आंशिक और सदृश्य" (अमोरिस लेटिटिया 292) के रूप में माना जा सकता है, इसलिए उन्हें सख्ती से "विवाह" नहीं कहा जा सकता।

ख)   यह सिर्फ नामों की बात नहीं है, बल्कि जिस वास्तविकता को हम विवाह कहते हैं, उसका एक अनूठा आवश्यक संविधान है जिसके लिए एक विशिष्ट नाम की आवश्यकता होती है, जो अन्य वास्तविकताओं पर लागू नहीं होती है। यह निस्संदेह एक मात्र "आदर्श" से कहीं बढ़कर है।

ग)    इसी कारण से, कलीसिया किसी भी प्रकार के संस्कार या रीति से बचती है जो इस दृढ़ विश्वास का खंडन करते और सुझाव देती है कि जो विवाह नहीं है उसे विवाह के रूप में मान्यता देने से बचे।

घ)    हालाँकि, लोगों के साथ हमारे संबंधों में, हमें प्रेरितिक उदारता को नहीं खोना चाहिए, जिसे हमारे सभी निर्णयों और दृष्टिकोणों में व्याप्त होना चाहिए। वस्तुनिष्ठ सत्य की रक्षा ही इस परोपकार की एकमात्र अभिव्यक्ति नहीं है; इसमें दया, धैर्य, समझ, कोमलता और प्रोत्साहन भी शामिल है। इसलिए, हम ऐसे न्यायाधीश नहीं हो सकते जो केवल इनकार करते हैं, अस्वीकार करते हैं और बहिष्कृत करते हैं।

ङ)     इसलिए, प्रेरितिक विवेक को पर्याप्त रूप से यह समझना चाहिए कि क्या लोगों द्वारा अनुरोध किये गये आशीर्वाद के ऐसे रूप हैं, जो विवाह की गलत अवधारणा को व्यक्त नहीं करते। क्योंकि जब किसी आशीर्वाद का अनुरोध किया जाता है, तो यह ईश्वर से मदद की याचना, बेहतर जीवन जीने की प्रार्थना, एक पिता पर भरोसा व्यक्त करना होता है जो हमें बेहतर जीवन जीने में मदद कर सकता है।

च)    दूसरी ओर, हालांकि ऐसी स्थितियाँ हैं जो वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण से नैतिक रूप से स्वीकार्य नहीं हैं, उसी प्रेरितिक उदारता के लिए हमें अन्य लोगों के साथ केवल "पापी" के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए, जिनके अपराध या जिम्मेदारी को व्यक्तिपरक जवाबदेही को प्रभावित करनेवाले विभिन्न कारकों द्वारा कम किया जा सकता है। (संत जॉन पॉल द्वितीय, रिकोनचिलियातो एत पेनितेंसिया, 17)।

छ)   निर्णय जो किसी खास परिस्थिति में प्रेरितिक विवेक के हिस्से के रूप में लिये जाते हैं, उन्हें नियम नहीं बनाना चाहिए। अर्थात्, यह किसी धर्मप्रांत, धर्माध्यक्षीय सम्मेलन, या किसी अन्य कलीसियाई संरचना के सभी प्रकार के मामलों के लिए प्रक्रियाओं या अनुष्ठानों को लगातार और आधिकारिक रूप से सक्षम करना उपयुक्त नहीं है, क्योंकि हर चीज जो "विशेष परिस्थितियों में व्यवहारिक समझ का हिस्सा है" एक नियम के स्तर तक ऊंचा नहीं किया जा सकता" क्योंकि इससे "असहनीय धर्मसंकट को बढ़ावा मिलेगा" (अमोरिस लेतित्सिया, 304)। कलीसियाई कानून हर चीज को कवर नहीं करना चाहिए और न ही कर सकता है, न ही धर्माध्यक्षीय सम्मेलन को अपने विभिन्न दस्तावेजों और नवाचारों के साथ ऐसा करने का दावा करना चाहिए, क्योंकि कलीसिया का जीवन मानक चैनलों के अलावा कई चैनलों के माध्यम से आगे बढ़ता है।

3.संदेह इस संबंध में कि धर्मसभा एक "कलीसिया का संवैधानिक आयाम" है (प्रेरितिक संविधान एपिस्कोपलिस कम्युनियो, 6), इस तरह कि कलीसिया स्वभाव से ही सिनॉडल (सहकारी) है।

चूँकि धर्माध्यक्षों की धर्मसभा धर्माध्यक्षमंडल (कॉलेज) का प्रतिनिधित्व नहीं करती, बल्कि केवल पोप का एक सलाहकार निकाय है, क्योंकि धर्माध्यक्ष, जो विश्वास के गवाह हैं, सच्चाई की अपनी स्वीकारोक्ति नहीं सौंप सकते, यह पूछा जाता है कि क्या धर्मसभा इसके संस्थापक द्वारा वांछित इसकी संवैधानिक संरचना को विकृत किए बिना कलीसिया के स्थायी शासन का सर्वोच्च नियामक मानदंड हो सकती है, जिससे कलीसिया के सर्वोच्च और पूर्ण अधिकार का प्रयोग पोप द्वारा अपने कार्यालय के आधार पर और धर्माध्यक्षमंडल द्वारा उनके प्रमुख, रोमी परमधर्माध्यक्ष के साथ किया जा सकता है। (लुमेन जेनसियुम, 22).

तीसरे संदेह पर पोप फ्राँसिस का उत्तर

क) यद्यपि आप स्वीकार करते हैं कि कलीसिया के सर्वोच्च और पूर्ण अधिकार का प्रयोग पोप अपने कार्यालय के आधार पर और धर्माध्यक्षों की मंडली अपने प्रमुख, रोमी परमधर्माध्यक्ष (द्वितीय वाटिकन महासभा, डॉगमैटिक संविधान लुमेन जेंसियुम, 22) के साथ कर सकता है।  इन्हीं प्रश्नों के साथ, आप भाग लेने, स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त करने और सहयोग करने की अपनी आवश्यकता को प्रकट करते हैं, जिसमें मेरी प्रेरिताई में "सिनॉडालिटी" (सहकारिता) के एक रूप का अनुरोध है।

ख) कलीसिया एक "मिशनरी समन्वय का रहस्य" है, लेकिन यह समन्वय केवल भावनात्मक या अलौकिक नहीं है; इसका तात्पर्य निश्चित रूप से वास्तविक भागीदारी से है। न केवल पदानुक्रम (धर्माधिकारी) बल्कि ईश्वर की समस्त प्रजा, विभिन्न तरीकों से और विभिन्न स्तरों पर अपनी आवाज सुना सकते हैं और कलीसिया की यात्रा का हिस्सा महसूस कर सकते हैं। इस अर्थ में, हम कह सकते हैं कि सहकारिता एक शैली और गतिशीलता के रूप में, कलीसिया के जीवन का एक आवश्यक आयाम है। इस बिंदु पर, संत जॉन पॉल द्वितीय ने नोवो मिलेनियो इनुंते में बहुत सुंदर बात कहीं हैं।

ग) इसे सभी के लिए एक नियम और अनिवार्य मार्ग में बदलते हुए, एक समूह को आकर्षित करनेवाली किसी विशेष धर्मसभा पद्धति को अपवित्र करना या थोपना बिल्कुल दूसरी बात है, क्योंकि यह केवल स्थानीय कलीसियाओं और सार्वभौमिक कलीसिया की विविध समृद्धि की विभिन्न विशेषताओं की अनदेखी करते हुए, धर्मसभा की यात्रा को "अवरुद्ध" कर देगा।

4. संदेह इस संबंध में कि, इस सिद्धांत के लिए धर्माध्यक्षों और ईशशास्त्रियों का समर्थन कि "कलीसिया का ईशशास्त्र बदल गया है,"और इसलिए महिलाओं को पुरोहित अभिषेक दिया जा सकता है।

कुछ धर्माध्यक्षों के बयानों के बाद, जिन्हें न तो सही किया गया है और न ही वापस लिया गया है, यह दावा करते हैं कि वाटिकन द्वितीय महासभा के साथ, कलीसिया का ईशशास्त्र और ख्रीस्तयाग का अर्थ बदल गया है, यह पूछा जाता है कि क्या द्वितीय वाटिकन महासभा का आदेश अभी भी मान्य है, जिसमें कहा गया है कि विश्वासियों का आम पुरोहितत्व और प्रेरितिक पुरोहितत्व अनिवार्य रूप से भिन्न होता है, न कि केवल डिग्री में (लुमेन जेंटियम, 10), और पुरोहित, "मिस्सा बलिदान चढ़ाने और पापों को क्षमा करने के आदेश की पवित्र शक्ति" (प्रेस्बितेरोरूम ऑर्डिनिस, 2) द्वारा, मध्यस्थ ख्रीस्त के नाम एवं उनके स्थान पर कार्य करते हैं, जिसके माध्यम से विश्वासियों का आध्यात्मिक बलिदान परिपूर्ण होता है? यह भी पूछा जाता है कि क्या संत जॉन पॉल द्वितीय के प्रेरितिक पत्र ऑर्डिनासियो सचेरदोतालिस की शिक्षा अभी भी वैध है, जो महिलाओं को पुरोहित अभिषेक प्रदान करने की असंभवता को निश्चित रूप से सत्य मानने की शिक्षा देती है, जिससे यह शिक्षा अब परिवर्तन के अधीन या धर्माध्यक्षों अथवा ईशशास्त्रियों के लिए खुली चर्चा नहीं रह गई है।

चौथे संदेह पर संत पापा का जवाब

 

क) “विश्वासियों की आम पुरोहित्व और प्रेरितिक पुरोहित्व मूलतः भिन्न हैं” (द्वितीय वाटिकन महासभा, डॉगमैटिक संविधान लुमेनजेंसियुम,10) इनके स्तर पर अंतर नहीं है, जिसका तात्पर्य है विश्वासियों की आम पुरोहिताई को "द्वितीय श्रेणी" या कम मूल्य ("निचले ग्रेड") के रूप में देखना। पुरोहिताई के दोनों रूप एक दूसरे को आलोकित करते और समर्थन देते हैं।     

ख) जब संत जॉन पॉल द्वितीय ने कहा कि हमें महिलाओं को पुरोहित अभिषेक प्रदान करने की असंभवता की "निश्चित रूप से" पुष्टि करनी चाहिए, तो वे किसी तरह से महिलाओं को बदनाम नहीं कर रहे थे और पुरुषों को सर्वोच्च शक्ति नहीं दे रहे थे। संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने अन्य बातों की भी पुष्टि की है। उदाहरण के लिए, जब हम पुरोहिताई के अधिकार की बात करते हैं, तब हम कार्य के दायरे में हैं, गरिमा और पवित्रता के दायरे में नहीं" (संत पापा जॉन पॉल द्वितीय, ख्रीस्तीफिदेलेस लाईची, 51) ऐसे शब्द जिन्हें हमने पर्याप्त रूप से नहीं अपनाया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से माना कि जब पुरोहित पवित्र मिस्सा की अध्यक्षता करते हैं, जो "दूसरे व्यक्ति पर श्रेष्ठता का कार्य नहीं है" (संत पापा जॉन पॉल द्वितीय, ख्रीस्तीफिदेलेस लाइची, नोट 190; विश्वास के सिद्धांत के लिए गठित धर्मसंघ, घोषणा इंटर इनसिन्योरेस, VI)। उन्होंने यह भी कहा कि यदि पुरोहिती कार्य "पदानुक्रमित" है, तो इसे वर्चस्व के एक रूप में नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि "पूरी तरह से ख्रीस्त के सदस्यों की पवित्रता के लिए आदेश के रूप में लिया जाना है" (संत जॉन पॉल द्वितीय, मुलिएरिस डिग्नितातेम, 27)। यदि इसे नहीं समझा जाता है, और इन अंतरों से व्यवहारिक परिणाम नहीं निकाले जाते हैं, तो यह स्वीकार करना मुश्किल होगा कि पुरोहिताई केवल पुरुषों के लिए आरक्षित है, और हम महिलाओं के अधिकारों या कलीसिया के नेतृत्व में विभिन्न तरीकों से उनकी भागीदारी की आवश्यकता को पहचानने में असमर्थ होंगे।

ग) दूसरी ओर, दृढ़ होने के लिए, आइए हम यह पहचानें कि "निश्चित कथन" की सटीक प्रकृति पर एक स्पष्ट और आधिकारिक धर्मसिद्धांत अभी तक पूरी तरह से विकसित नहीं हुआ है। यह कोई डोगमैटिक परिभाषा नहीं है, फिर भी इसका पालन सभी को करना चाहिए। कोई भी सार्वजनिक रूप से इसका खंडन नहीं कर सकता और फिर भी यह अध्ययन का विषय हो सकता है, जैसा कि एंग्लिकन कम्युनियन में अभिषेक की वैधता के मामले में है।

5. संदेह इस दावे के संबंध में कि "क्षमा एक मानव अधिकार है" और सभी को हमेशा दोषमुक्त करने के कर्तव्य पर संत पापा जोर देते हैं, कि पश्चाताप पापस्वीकार संस्कार में क्षमा पाने के लिए एक आवश्यक शर्त नहीं है।

यह पूछा जाता है कि क्या ट्रेंट काउंसिल की शिक्षा, जो कहती है कि पापी का पश्चाताप, जिसमें दोबारा पाप न करने के उद्देश्य से किए गए पाप से घृणा करना शामिल है, क्या पापस्वीकार संस्कार की वैधता के लिए आवश्यक है, यह अभी भी लागू है, इतना कि जब यह स्पष्ट हो जाए कि शर्त पूरी नहीं हुई है तो पुरोहित को दोषमुक्ति स्थगित कर देना चाहिए।

पाँचवें संदेह पर संत पापा का जवाब

क)    पाप मुक्ति की वैधता के लिए पश्चाताप आवश्यक है और इसका तात्पर्य पाप न करने का संकल्प है। लेकिन यहां कोई गणित नहीं है, और एक बार फिर मुझे आपको याद दिलाना होगा कि पापस्वीकार संस्कार सुनने का स्थल कोई सीमा शुल्क घर नहीं है। हम स्वामी नहीं हैं बल्कि उन संस्कारों के विनम्र प्रबंधक हैं जो विश्वासियों की मदद करते हैं क्योंकि ईश्वर के ये उपहार, सुरक्षित किए जानेवाले अवशेषों से अधिक, लोगों के जीवन के लिए पवित्र आत्मा की सहायता हैं।

ख)   पश्चाताप व्यक्त करने के कई तरीके हैं। अक्सर, जिन लोगों का आत्मसम्मान बहुत आहत होता है, उनके लिए खुद को दोषी घोषित करना एक क्रूर पीड़ा है, लेकिन पापस्वीकार संस्कार हेतु जाने का कार्य ही पश्चाताप और ईश्वरीय मदद मांगने की एक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।

ग)    मैं यह भी याद दिलाना चाहता हूँ कि "कभी-कभी हमें प्रेरितिक देखभाल में ईश्वर के बिना शर्त प्यार के लिए जगह बनाना मुश्किल लगता है" (अमोरिस लेतित्सिया, 311), लेकिन हमें ऐसा करना सीखना चाहिए। संत जॉन पॉल द्वितीय का अनुसरण करते हुए, मैं इस बात पर कायम हूँ कि हमें विश्वासियों से सुधार के अत्यधिक सटीक और निश्चित संकल्पों की मांग नहीं करनी चाहिए, जो अंततः अमूर्त या आत्ममुग्ध हो जाते हैं, लेकिन यहां तक कि पुनः पाप में गिरने की भविष्यवाणी भी "उद्देश्य की प्रामाणिकता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती" (संत पापा जॉन पॉल द्वितीय, लेटर टू कार्डिनल विलियम डब्ल्यू. बॉम और एपोस्टोलिक पेनिटेंटरी के वार्षिक पाठ्यक्रम में प्रतिभागी, 22 मार्च, 1996,5)

घ) अंत में, यह स्पष्ट होना चाहिए कि आमतौर पर पापस्वीकार से जुड़ी सभी शर्तें उन परिस्थितियों में लागू नहीं होतीं, जब कोई व्यक्ति अत्यधिक पीड़ा की स्थिति में हो, या बहुत सीमित मानसिक और मनोवैज्ञानिक क्षमताओं के साथ हो।

 

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03 October 2023, 17:56