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रोम के लुम्सा विश्वविद्यालयीन छात्रों को सम्बोधित करते  सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 14.11.2019 रोम के लुम्सा विश्वविद्यालयीन छात्रों को सम्बोधित करते सन्त पापा फ्राँसिस, तस्वीरः 14.11.2019  (AFP or licensors)

"शिक्षा: वैश्विक संविदा" संगोष्ठी के प्रतिभागियों को सन्त पापा

वाटिकन में सामाजिक विज्ञान सम्बन्धी परमधर्मपीठीय अकादमी के तत्वाधान में "शिक्षा: वैश्विक संविदा", शीर्षक से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के प्रतिभागियों को सन्त पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार को सम्बोधित किया।

जूलयट जेनेवीव क्रिस्टफर-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, शुक्रवार, 7 फरवरी 2020 (रेई,वाटिकन रेडियो): वाटिकन में सामाजिक विज्ञान सम्बन्धी परमधर्मपीठीय अकादमी के तत्वाधान में "शिक्षा: वैश्विक संविदा", शीर्षक से आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के प्रतिभागियों को सन्त पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार को सम्बोधित किया।  

सन्त पापा फाँसिस ने कहा कि शिक्षा विषय पर मनन-चिन्तन करना अनिवार्य है, ताकि मानवीय रिश्तों की संरचना को मज़बूत करने के लिये सक्षम व्यक्तियों को प्रशिक्षण दिया जा सके और साथ ही विश्व को और अधिक भ्रातृत्वपूर्ण बनाने का उद्देश्य प्राप्त करने के लिये हम सब एकजुट हो सकें।  

एकीकृत और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

सन्त पापा ने कहा, "एकीकृत और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा स्नातकीय उपाधि के लिए निर्धारित मानक, वैश्विक चुनौती का प्रतिनिधित्व करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ एवं अन्य संस्थाओं द्वारा रखे गये लक्ष्यों के बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में समानता का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका है। निर्धनता,  भेदभाव,  जलवायु परिवर्तन, विश्व स्तर पर व्यापत उदासीनता तथा मानव व्यक्तियों का शोषण आदि सभी तत्व लाखों बच्चों के उत्थान को रोक रहे हैं।"

शिक्षा से स्वतंत्रता और ज़िम्मेदारी

सन्त पापा ने कहा, "हालांकि, आज प्राथमिक शिक्षा को विश्वव्यापी स्तर पर उपलभ्य बना दिया गया है तथा लिंगभेद की खाई को सकरा कर दिया गया है तथापि, प्रत्येक पीढ़ी का दायित्व है कि वह इस तथ्य पर विचार करे कि उसे किस प्रकार की शिक्षा का प्रसार करना है।"

सन्त पापा ने कहा कि शिक्षा ही व्यक्तियों को स्वतंत्र बनाती तथा ज़िम्मेदार एवं जवाबदेह इन्सान बनने में उनकी मदद करती है।         

उन्होंने कहा, "शिक्षा केवल अवधारणाओं के प्रसार का विषय ही नहीं है, अपितु यह वह उद्यम है जिसमें परिवार, स्कूल तथा सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संस्थानों के सहयोग की मांग की जाती है। शिक्षा प्रदान करने का अर्थ है, मस्तिष्क की भाषा को हृदय की भाषा से जोड़ने में सक्षम होना। ऐसा कर ही छात्रों को सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों की शिक्षा दी जा सकेगी तथा वे भ्रातृत्व, न्याय एवं शांति पर आधारित समाज के निर्माण में सफल बन सकेंगे। ऐसा कर ही हमारे स्कूल भावी पीढ़ियों के सशक्तिकरण के आवश्यक वाहन बन सकेंगे।"

सन्त पापा ने कहा कि आज विश्व के समक्ष प्रस्तुत गम्भीर चुनौतियों के मद्देनज़र शिक्षकों एवं शैक्षणिक संस्थानों को एक नवीन शिक्षा संविदा के निर्माण की आवश्यकता है, जिसके लिये यह अपरिहार्य है कि युवा छात्र, अन्यों की संस्कृतियों एवं परम्पराओं की तुलना में, अपनी संस्कृतियों एवं परम्पराओं के महत्व को भलीभाँति समझें ताकि साक्षात्कार द्वारा सबके बीच परस्पर समझदारी, सम्वाद एवं सहिष्णुता को प्रोत्साहन मिल सके।  

              

07 February 2020, 11:32