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 विश्व शरणार्थी दिवस के दिन भारत  में शरण लिये हुए शरणार्थी विश्व शरणार्थी दिवस के दिन भारत में शरण लिये हुए शरणार्थी  (REUTERS)

भारत में शरणार्थी और मेज़बान समुदाय पर तालाबन्दी की मार

भारत में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (यूएनएचसीआर) के साथ पंजीकृत 40 हज़ार 276 शरणार्थियों में से ज़्यादातर पहले ही जीवनयापन के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन कोरोनावायरस महामारी के कारण उनकी ज़िन्दगी और बिखर गई है।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

नई दिल्ली, शनिवार 4 जुलाई 2020 (यूएन न्यूज) : 2013 में म्याँमार से भारत आए रोहिंग्या शरणार्थी, 44 वर्षीय निज़ामुद्दीन लिन अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ राजधानी नई दिल्ली में एक ग़ैर-लाभकारी क़ानूनी सहायता संगठन के लिए अनुवाद का काम करके जीवनयापन कर रहे थे। इससे वो अपने परिवार की गुज़र-बसर लायक आय अर्जित कर लेते थे, लेकिन तीन महीने पहले कोविड महामारी के कारण भारत में देशव्यापी बन्द होने से हालात बदल गए।

अब, वो पेट भरने के लिए स्थानीय किराना दुकानों पर माल उठाने-लादने के लिए मजबूर है। उन्होंने बताया, "मैं बड़ी मुश्किल से गुज़ारे लायक आमदनी कमा पाता हूँ, मेरे पास जो भी छोटी-मोटी नौकरियाँ थीं वो ख़त्म हो गई हैं।"

बेरोज़गारी से परेशान

भारत में इस महीने के शुरू में लॉकडाउन खुलना शुरू हो गया था, लेकिन हाल ही में कोविड-19 के संक्रमण के नए मामलों में वृद्धि हुई है। स्थिति ये है कि देश के अनौपचारिक क्षेत्र में दैनिक मज़दूरी करने वाले अधिकांश शरणार्थियों के पास अब भी कोई काम नहीं है।

निज़ामुद्दीन मानते हैं कि उनकी स्थिति रोहिंग्या समुदाय के अनेक अन्य लोगों की तुलना में फिर भी बेहतर है. अपने परिवार की गुज़र-बसर के लिए वो म्याँमार का अपना घर बेचकर कुछ धन ले आए थे। लेकिन दूसरे शरणार्थियों के पास इस तरह की कोई बचत नहीं है और वो संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों, स्थानीय ग़ैर सरकारी संगठनों और भारत सरकार की सहायता पर अब पहले से कहीं अधिक निर्भर हैं।

राहत के लिए धन की ज़रूरत

भारत में यूएनएचसीआर के साथ पंजीकृत शरणार्थियों में से अधिकतर, म्याँमार से ज़्यादातर रोहिंग्या लोग और अफ़ग़ानिस्तान से हैं और कुछ छोटे समूह यमन, सीरिया, सोमालिया और अन्य अफ्रीकी देशों से आते हैं।

तालाबन्दी की शुरुआत में भोजन जुटाना पहली और सबसे बड़ी ज़रूरत थी। शरणार्थी एजेंसी ने अपने स्थानीय साझेदारों के साथ मिलकर अप्रैल और मई महीनों के बीच लगभग 9 हज़ार शरणार्थी परिवारों को खाद्य पैकेज मुहैया कराए, जबकि अन्य 3 हज़ार 200 परिवारों को स्थानीय अधिकारियों और ग़ैर सरकारी संगठनों ने भोजन मुहैय्या कराया।

इस संकट ने न केवल शरणार्थियों को प्रभावित किया है, बल्कि उनके मेज़बान समुदाय पर भी काफ़ी असर डाला है। यूएन शरणार्थी एजेंसी ने यथा सम्भव खाद्य और साबुन बाँटकर स्थानीय लोगों की मदद की।

भारत में यूएनएचसीआर के बाहरी सम्बन्धों के सहायक अधिकारी किरी अत्री ने कहा, "ज़रूरतें बहुत बड़ी हैं, लेकिन हमारे पास और अधिक मदद करने के लिए धनराशि नहीं है। जीवन रक्षक गतिविधियाँ जारी रखने व कमज़ोर तबके के शरणार्थियों और मेज़बान समुदायों को भोजन, राशन, नक़दी की सहायता और महिलाओं व लड़कियों के लिए सैनिटरी नैपकिन जैसी ज़रूरतों के लिए तत्काल धन की आवश्यकता है।"

किरी अत्री ने कहा कि मानसून और डेंगू का मौसम आने के साथ ही भीड़भाड़ वाली झुग्गी-बस्तियों में रहने वालों को भी अपने घरों की मरम्मत, मच्छरदानी और अन्य आवश्यक सहायता की आवश्यकता होगी।

रहने-खाने की बढ़ती समस्या

विश्व बैंक का अनुमान है कि कोरोनावायरस महामारी दुनिया भर में 7 करोड़ 10 लाख लोगों को अत्यधिक ग़रीबी में धकेल देगी। वैश्विक स्तर पर, वर्ष के अन्त तक तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना करने वाले लोगों की संख्या दोगुनी होने की सम्भावना है।

भोजन के अलावा, भारत में अनेक शरणार्थियों के लिए सबसे बड़ी चिन्ता ये है कि वो अपने घरों का किराया कैसे अदा करें और घर से निकाले जाने के डर में जी रहे हैं।

यूएन शरणार्थी एजेंसी की एसोसिएट प्रोटेक्शन ऑफिसर सेलिन मैथ्यू ने बताया कि "ज़्यादातर लोगों के पास अब कोई रुपया बाकी नहीं रहा। मकान मालिकों से बात करके उनहोंने उनके लिए कुछ समय की मोहतल ले ली है, लेकिन अब स्थिति ऐसी हो चली है कि मकान मालिक ख़ुद अपने गुज़र-बसर के लिये किराए पर निर्भर हो गए हैं।" उन्होंने कहा कि विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से आने वाली मदद भी अब बन्द होती जा रही है।

04 July 2020, 14:27