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महात्मा गाँधी और उनके साथी दांडी यात्रा पर महात्मा गाँधी और उनके साथी दांडी यात्रा पर 

नमक यात्रा के 90 वर्षों बाद क्या गाँधी का सिद्धांत प्रासंगिक

अहिंसात्मक प्रदर्शन करते हुए सन् 1930 में महात्मा गाँधी की 24 दिनों की नमक यात्रा, 1947 में ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी के लिए मील का पत्थर था।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

भारत, बृहस्पतिवार, 19 मार्च 2020 (वीएन)˸ महात्मा गाँधी की नमक यात्रा या नमक सत्याग्रह की, इन दिनों 90वीं वर्षगाँठ मनायी जा रही है। इस यात्रा को दांडी यात्रा के नाम से भी जाना जाता है जिसमें अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम से दांडी तक की यात्रा की गयी थी।

384 किलोमीटर की दूरी 24 दिनों में (12 मार्च से 6 अप्रैल 1930) तय की गई यह यात्रा, सन् 1882 में ब्रिटिश शासन द्वारा लागू नमक कानून का अहिंसक रूप से उलंघन था, जिन्होंने नमक के निर्माण और बिक्री पर एकाधिकार का प्रयोग करने के अलावा, इसपर भारी कर भी लगाया था। नमक सत्याग्रह में महात्मा गाँधी और 80 अन्य लोगों ने भाग लेकर अंग्रेजों के नमक कानून को भंग किया था।   

गांधी के नमक सत्याग्रह के सिद्धांत का अमेरिकी कार्यकर्ताओं, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, जेम्स बेवेल और अन्यों पर 1960 के दशक में, अफ्रीकी अमेरिकियों और अन्य अल्पसंख्यक समूहों के नागरिक अधिकारों के लिए, नागरिक अधिकार आंदोलन के दौरान एक महत्वपूर्ण प्रभाव था।

महात्मा गाँधी एवं उनके साथियों ने नमक कानून तोड़ते हुए समुद्र से पानी लेकर अपने हाथों से नमक बनाया था और सभी भारतीयों से ऐसा ही करने का आह्वान किया।  

रोम के परमधर्मपीठीय सालेशियन विश्व विद्यालय के प्रोफेसर फादर पीटर गोंजाल्स ने कहा कि नमक यात्रा के 90 वर्षों बाद आज भी महात्मा गाँधी के सिद्धांत प्रासंगिक हैं।  

वाटिकन के संचार विभाग में कार्यरत फादर गोंजाल्स के अनुसार आज विश्व के कई जगहों में गांधीजी के सिद्धांत के अनुरूप, शांतिपूर्ण एवं अहिंसात्मक प्रदर्शन किये जाते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार गाँधीजी के सविनय अवज्ञा सिद्धांत के अनुरूप प्रदर्शन एवं कानून उलंघन के द्वारा विश्व के करीब 60 देशों ने तानाशाहों और अधिनायकवादी शासन से अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की है।

 

19 March 2020, 16:17