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लूर्द की माता मारियम का तीर्थस्थल लूर्द की माता मारियम का तीर्थस्थल  (Vatican Media) कहानी

लूर्द में माता मरियम के दिव्यदर्शन

फ्राँस के लूर्द शहर में, गेव नदी के तट पर स्थित माता मरियम का तीर्थस्थान विश्व का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। सन् 1858 में यहाँ 14 वर्षीय बेर्नादेत सौबिरूस को धन्य कुँवारी मरियम ने 11 फरवरी से 16 जुलाई तक 18 बार दर्शन दिये थे। लूर्द की माता मरियम का पर्व 11 फरवरी को मनाया जाता है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

फ्राँस के लूर्द शहर में, गेव नदी के तट पर स्थित माता मरियम का तीर्थस्थान विश्व का एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। सन् 1858 में यहाँ 14 वर्षीय बेर्नादेत सौबिरूस को धन्य कुँवारी मरियम ने 18 बार दर्शन दिये थे। आरम्भ में बेर्नादेत उनका नाम नहीं जानती अतः उसे सुन्दर युवती कहकर पुकारती थी। बाद में उस सुन्दर युवती ने अपना नाम निष्कलंक गर्भागमन बतलाया। उन दर्शनों के बाद तीर्थयात्रियों की भीड़ वहाँ आने लगी। लोग विशेषकर अपने रोगों से चंगाई पाने के लिए यहाँ आते हैं। लूर्द की माता मरियम के तीर्थस्थान में अनेक लोगों को चंगाई मिली है जिनमें से 70 चमत्कारों की अधिकारिक रूप से पुष्टि की गयी है।

संत बेर्नादेत्त सौबिरूस

फ्राँस के लूर्द शहर में 7 जनवरी सन् 1844 को एक बालिका का जन्म हुआ जिसका नाम बेर्नादेत्त सौबिरूस था। बेर्नादेत का परिवार अत्यन्त गरीब था अतः उसे अपने भाई बहनों की देखभाल करनी पड़ती थी।

बेर्नादेत एक अच्छी लड़की थी किन्तु गरीबी के कारण स्कूल नहीं जा सकी। उसने सिर्फ गरीबों को पढ़ाये जाने स्कूल की शिक्षा प्राप्त की।

14 साल की उम्र में जब वह प्रथम परमप्रसाद की तैयारी कर रही थी तब उसके लिए प्रतिदिन का काम था जलावन की लकड़ी इकट्ठा करना। राखबुध के पहले सप्ताह बृहस्पतिवार को, शाम का भोजन करने के बाद बेर्नादेत की मां ने अपने बच्चों से कहा कि घर में जलावन लकड़ी समाप्त हो चुकी है।

माता मरियम का प्रथम दिव्यदर्शन

11 फरवरी सन् 1858 को बेर्नादेत अपनी बहन और एक सहेली के साथ लकड़ी चुनने, गेभ नदी की ओर गयी। उन्हें नदी के ठंढ़े जल को पार करना था। बेर्नादेत की बहन और उसकी सहेली जल्दी-जल्दी चल कर आगे बढ़ गयीं, किन्तु इस डर से कि उसे फिर दमा हो जाएगा बेर्नादेत नदी के किनार रूक गयी। जब नदी पार करने के लिए तट पर पहुँची तब अचानक आंधी चलने की आवाज सुनी, किन्तु देखा कि पेड़ नहीं हिल रहे थे। वह डर गयी और चुपचाप खड़ी रही। वह नदी के किनारे गोरोटो की ओर देखने लगी जहाँ एक गुफा था।

गुफा के द्वार पर गुलाब की झाड़ी दिखाई दी जो इतनी जोर से हिल रही थी मानो तेज हवा बह रही हो। ठीक उसी समय गोरोटो के अंदर से सुनहरा बादल निकला और उसके तुरन्त बाद एक श्वेत वस्त्र पहले अत्यन्त सुन्दर युवती दिखाई दी। बेर्नादेत ने इतनी सुन्दर लड़की कभी नहीं देखी थी। वह झाड़ी के निकट आकर उसे देखने लगी। युवती का कमरबंध नीले रंग का था और वह सिरावरण पहनी हुई थी। उसके हाथ में रोजरी थी और उसके पैरों तले पीला गुलाब था। बेर्नादेत ने आँख मलते हुए ठीक से देखने का प्रयास किया और सोचने लगी कि यह सुन्दर नारी कहाँ से आयी?  वह यहाँ क्या कर रही है?  सुन्दर युवती बेर्नादेत की ओर देखी और मुस्कुरायी। उसने बेर्नादेत से आगे बढ़ने का इशारा किया, मानो कोई माँ अपने बच्चे को पास आने के लिए कह रही हो।

बेर्नादेत ने रोजरी निकाली और घुटनी टेक कर प्रार्थना शुरू करने के लिए क्रूस का चिन्ह बनाना चाहा पर वह ऐसा नहीं कर सकती। उसके हाथ को मानो लकवा हो गया था। तब सुन्दर युवती ने क्रूस का चिन्ह बनया, उसके बाद बेर्नादेत भी क्रूस का चिन्ह बना ली। जब बेर्नादेत रोजरी प्रार्थना कर रही थी तब माता मरियम की दो उंगलियों के बीच रोजरी माला के दाने भी सरक रहे थे किन्तु मूँह से कोई आवाज नहीं सुनाई पड़ रहा था।      

जब प्रार्थना समाप्त हुई, तब युवती अंदर चली गयी और बादल गायब हो गया। बेर्नादेत की बहन और उसकी सहेली, उसे अपने साथ न देखकर परेशान थीं। उन्होंने पूछा, "तुम यहाँ क्या कर रही थी? क्या तुम नदी में खेल रही थी जब हम लकड़ियाँ इकट्ठा कर रहे थे? तब बेर्नादेत ने गोरोटो में दिव्यदर्शन के बारे उन्हें बतलाया किन्तु वे उसे मूर्ख कहकर उसकी बातों पर विश्वास नहीं किये।

बेर्नादेत के मन में सुन्दर युवती की तस्वीर उभरती रही। शाम को परिवार में संध्या प्रार्थना के समय बेर्नादेत परेशान थी और रोने लगी। जब उसकी मां ने पूछा कि क्या हुआ है, तब उसकी बहन ने पूरी घटना मां को बतलाया। बेर्नादेत की माँ ने उसे  काल्पनिक कहा और फिर गुफा की ओर जाने से मना किया।   

बेर्नादेत रात को भी नहीं सो सकी। सुन्दर युवती का चेहरा उसे बार-बार याद आता रहा। अपनी माँ की बातों को मानना उसके लिए मुश्किल लगने लगा क्योंकि उसे नहीं लग रहा था कि वह ठगी गयी थी। उसका दृढ़ विश्वास हिलने वाला नहीं था। वह उस सुन्दर नारी के बारे विस्तार से लोगों को बतलाने लगी। उसने कहा, "मैंने 16 या 17 साल की एक जवान लड़की को देखा है। वह सफेद वस्त्र पहनी हुई थी और कमर में नीले रंग का कमरबंद्ध था। सिर पर सफेद भेल पहनी हुई थी। भेल के बाहर उसका बाल हल्का सा दिखाई दे रहा था जो कमर के नीचे तक था। वह चप्पल नहीं पहनी थी किन्तु पैर कपड़े से ढका हुआ था और वहाँ गुलाब के फूल थे। वह अपने दाहिने हाथ में सफेद रोजरी ली हुई थी। रविवार को बेर्नादेत की माँ ने उसे वापस गोरोटो के पास जाने दिया।

माता मरियम का दूसरा दिव्यदर्शन

14 फरवरी 1858 को रविवार का दिन था। बेर्नादेत और दो लड़कियाँ साथ में पवित्र जल लेकर उसी स्थान की ओर गयीं, जहाँ बेर्नादेत को दिव्यदर्शन हुए थे। वहाँ पहुँचने पर बेर्नादेत को पुनः सुन्दर कुँवारी का दर्शन प्राप्त हुआ। बेर्नादेत ने पवित्र जल छिड़का और उस सुन्दर कुँवारी ने मुस्कुराया। बेर्नादेत ने बतलाया कि सुन्दर कुँवारी उनके इस कार्य से खुश हुई किन्तु उनसे कुछ नहीं कहा। अब इस घटना की चर्चा सभी ओर होने लगी थी।

तीसरा दिव्यदर्शन

लूर्द में माता मरियम का तीसरा दिव्यदर्शन 18 फरवरी 1858 को हुआ। उस दिन तीनों लड़कियाँ पहले मिस्सा के लिए गयी थीं उसके बाद वे गोरोटो गयीं। उनके साथ कुछ बड़े लोग भी गये जिनमें से एक ने अपने साथ आशीष की हुई मोमबत्ती ली, दूसरे ने पेन, पेपर और स्याही लिया ताकि वे जो कुछ भी कहेंगी उसे लिख सकें। सुन्दर युवती ने दर्शन दिया और बेर्नादेत ने पूछा आप कौन हैं और क्या चाहती हैं? सुन्दर युवती ने मुस्कुराया और बेर्नादेत से कहा, "मुझे इसकी जरूरत नहीं है कि मैं जो कहूँ उसे लिखा जाए। क्या तुम अगले 15 दिनों तक हर रोज यहाँ आ सकती हो?" उन्होंने इस आग्रह के लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं बतलाया। सुन्दर युवती ने बेर्नादेत से कहा कि उसके इस कार्य के लिए वे उसे इस दुनिया की खुशी की गारंटी नहीं देते किन्तु स्वर्ग में आनन्द उसका इंतजार कर रहा है।

चौथा दिव्यदर्शन

19 फरवरी को बेर्नादेत को माता मरियम का चौथा दिव्यदर्शन प्राप्त हुआ। इस समय बेर्नादेत के माता-पिता और उनकी चाची एवं गाँव के कुछ लोग भी उनके साथ गोरोटो के पास गये हुए थे। बेर्नादेत ने रोजरी माला विन्ती शुरू की और थोड़ी देर में ही वहाँ उपस्थित लोगों ने गौर किया कि उसका चेहरा दमक उठा।

पांचवाँ दिव्यदर्शन

पाँचवां दिव्यदर्शन 20 फरवरी 1858 को हुआ। इस दिव्यदर्शन में सुन्दर युवती ने बेर्नादेत को प्रार्थना करना सिखलाया। इस प्रार्थना को बेर्नादेत ने जीवनभर किया। उन्होंने उस प्रार्थना को किसी से प्रकट नहीं किया किन्तु जब वह प्रार्थना करती थी तब अपने साथ आशीष की हुई मोमबत्ती जलाती थी। अब तीर्थस्थान में लगातार मोमबत्ती जलाये जाते हैं।

छटवाँ दिव्यदर्शन

छटवाँ दिव्यदर्शन में सुन्दर युवती ने बेर्नादेत को पापियों के लिए प्रार्थना करने को कहा। यह दिव्यदर्शन रविवार 21 फरवरी 1858 को हुआ, उस समय से बेर्नादेत ने हमेशा पापियों के लिए प्रार्थना किया। उस दिन वहाँ सैंकड़ों लोग उपस्थित थे। जिनमें डॉ. डोजोउस भी थे जो लूर्द के शारीरिक चिकित्सक थे। उन्होंने भीड़ को बतलाया कि बेर्नादेत के शरीर में किसी तरह की असाधारण स्थिति नहीं पायी गयी। उस समय भी जब वह दिव्यदर्शन देख रही होती थी। उसकी नाड़ी सही चल रही थी, सांस सामान्य थी और किसी तरह की मानसिक उत्तेजना भी नहीं थी।

तब लोगों ने एक सभा बुलायी तथा दिव्यदर्शन पर अलग अलग विचार प्रस्तुत किये गये। कुछ लोगों ने बड़ी भीड़ जमा होने को खतरा बताया। उन्होंने बेर्नादेत को गोरोटो की ओर जाने से रोकने के लिए आधिकारिक आदेश जारी कराया। उसे भ्रमित करने के लिए दिव्यदर्शन की घटना के वर्णन में बदलाव लाने की कोशिश की गयी, किन्तु  बेर्नादेत ने कहा कि वह गोरोटो जाने के अपने वचन से इंकार नहीं कर सकती है क्योंकि ऐसा करने के लिए उसने उस सुन्दर युवती से प्रतिज्ञा की है। जब वह प्रयास विफल हो गया, तो पुलिस प्रमुख ने बेर्नादेत को रिहा कर दिया और उसके पिताजी से कहा कि वह उसे घर ले जाए और गारंटी दे कि आगे कोई गड़बड़ी नहीं होगी। परन्तु बेर्नादेत के अंतःकरण से जो आवाज आ रही थी वह पृथ्वी की किसी भी चेतावनी से अधिक प्रबल थी।

22 फरवरी को 1858 को सोमवार का दिन था। बेर्नादेत स्कूल से छुट्टी होने पर ग्रोटो गयी। पुलिस के दो जवानों ने उनका पीछा किया और साथ में भीड़ भी उसके पीछे जमा हो गयी। जब बेर्नादेत अपने नियमित स्थान पर घुटनी टेककर प्रार्थना कर रही थी तब पुलिस सम्मानपूर्वक खड़ी रही किन्तु जब वह उठी तो वे आगे बढ़े और उनसे पूछने लगे कि क्या वह अब भी कहना चाहती है कि उसने सुन्दर युवती का दर्शन किया है। बेर्नादेत ने कहा, "नहीं, मैंने इस बार कुछ नहीं देखा।" तब उसे घर जाने दिया गया किन्तु लोगों ने उनका मजाक किया और कहा कि सुन्दर युवती पुलिस से डर गयी और अब उसने कोई सुरक्षित स्थान पा लिया है।

सातवाँ दिव्यदर्शन  

बेर्नादेत को लूर्द में माता मरियम का 7वाँ दिव्यदर्शन, 23 फरवरी 1858 को हुआ। इस दिव्यदर्शन के दौरान करीब 200 लोग उपस्थित थे। बेर्नादेत का चेहरा दमक उठा। उपस्थित लोगों ने अपनी टोपी उतार दी और घुटनी टेकी। बेर्नादेत अत्यन्त गंभीर, फिर सुनने एवं प्रसन्नता की मुद्रा में दिखाई दी। वह बीच-बीच में झुक जाती थी। दिव्यदर्शन एक घंटे तक चला, जिसके अंत में बेर्नादेत घुटनों के बल गुलाब के फूल की ओर बढ़ी और उसने धरती को चूमा। पूछे जाने पर कि माता मरियम ने उनसे क्या कहा बेर्नादेत ने जवाब दिया कि माता मरियम ने उन्हें तीन रहस्यों को प्रकट किया है जिनको उन्होंने कभी किसी को प्रकट नहीं किया।

आठवाँ दिव्यदर्शन

8वां दिव्यदर्शन, 24 फरवरी 1858 को हुआ। इस दिव्यदर्शन में बेर्नादेत भीड़ की ओर मुड़ी, जहाँ करीब 400 लोग उपस्थित थे और तीन बार दोहराया –" पश्चताप, पश्चाताप, पश्चाताप।" ये कुँवारी मरियम के शब्द थे जिनको बेर्नादेत ने लोगों के लिए दोहराया था। माता मरियम चाहती थी कि लोग पश्चाताप करें। इसे मन-परिवर्तन के रूप में भी समझा जा सकता है। कलीसिया के अनुसार मन-परिवर्तन का अर्थ है अपना हृदय ईश्वर एवं अपने भाई-बहनों की ओर लगाना जैसा कि येसु ने हमें सिखलाया है।

नौवाँ दिव्यदर्शन

25 फरवरी 1858 को बेर्नादेत को माता मरियम का नवीं बार दिव्यदर्शन प्राप्त हुआ जिसमें उन्होंने बेर्नादेत से कहा, "झरने के जल को पीयो और अपने को धोओ।" बेर्नादेत विस्मित थी क्योंकि वहाँ मस्साबिल्ले में कोई झरना नहीं था। वह अपने पास के जमीन को कंकड़ से खोदने लगी। जैसे ही उसने ऐसा किया उसने महसूस किया कि नीचे की मिट्टी गीली है और देखते ही देखते वहाँ एक छोटा झरना बन गया। उसने अपने दोनों हथेलियों से पानी लेकर पीया और चेहरा धोया। दूसरे दिन छोटा गड्ढा लबालब भर गया था और पानी चट्टान से होकर बहने लगा था। तीसरे दिन यह एक सामान्य झरने का रूप ले लिया था। झरने के जल को पीने और धोने के इस कार्य द्वारा येसु के हृदय का रहस्य प्रकट होता है। एक सिपाही ने येसु के बगल को भाले से छोदा और तुरन्त वहां से खून और जल निकला। कीचड़ मनुष्यों के हृदय का प्रतीक है जो पाप द्वारा घायल है। फिर भी, हृदय की गहराई में ईश्वर का जीवन है जो झरने के रूप में हमें शुद्ध करता है।

 दसवाँ दिव्यदर्शन

10वाँ दिव्य दर्शन 27 फरवरी 1858 को हुआ जिसमें सुन्दर युवती ने बेर्नादेत से कहा कि वह पापियों की ओर से धरती को चूमें। उसने तत्काल ऐसा किया और भीड़ ने भी उनका अनुसरण किया।

ग्यारहवाँ दिव्यदर्शन

11वां दिव्यदर्शन –28 फरवरी 1858 को हुआ। उस सुबह को गोरोटो के पास करीब 2 हजार लोग जमा हुए थे। सुन्दर युवती या कुँवारी मरियम ने बेर्नादेत से कहा कि वह पल्ली पुरोहित से कहे कि गोरोटो के पास एक गिरजाघर का निर्माण किया जाए। कुँवारी मरियम की इच्छा थी कि वहाँ गोरोटो के पास एक गिरजाघर का निर्माण किया जाए। इसके द्वारा वे चाहती थीं कि हम अपने भाई-बहनों का साथ दें। जो भी तीर्थयात्री लूर्द आयें वे गिरजाघर में प्रभु से विश्राम पा सकें।  

बारहवाँ दिव्यदर्शन   

12वाँ दिव्य दर्शन –1 मार्च 1858 को हुआ। इस दिव्यदर्शन के दौरान माता मरियम ने बेर्नादेत्त ने कहा कि वह अपनी रोजरी से विन्ती नहीं कर रही है। यह वाक्य मरियम ने स्पष्ट शब्दों में कहा था। वास्तव में पौलिन के पुत्रों ने उस दिन पौलिन की रोजरी से गोरोटो के पास प्रार्थना करने का आग्रह किया था।

13वाँ दिव्यदर्शन

13वाँ दिव्यदर्शन, 2 मार्च 1858 को हुआ। उस दिन बेर्नादेत बड़े सबेरे ग्रोटो के पास पहुँची तथा माता मरियम के सामने रोजरी माला विन्ती की। प्रार्थना के दौरान माता मरियम भी प्रार्थना कर रही थीं, किन्तु वे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की महिमा हो, की प्रार्थना के अलावा बाकी समय मौन थी।

 14 दिव्यदर्शन, 3 मार्च 1858

इस दिव्य दर्शन के दौरान माता मरियम ने पुनः दुहराया कि उसकी इच्छा है कि वहाँ पुरोहित के द्वारा एक गिरजाघर का निर्माण किया जाए तथा इस गिरजाघर में लोग जुलूस करते हुए आएँ। बेर्नादेत पल्ली पुरोहित अब्बे पेरामल से बहुत डरती थी। उसके लिए पहली बार उनके पास जाना और गिरजाघर के निर्माण की बात करना कठिन काम था किन्तु दूसरी बार वह बड़े साहस के साथ वहाँ गयी और प्रोशेसन की बात कही। पल्ली पुरोहित ने बड़ी बेरूखाई से सुन्दर युवती के आदेश को इंकार कर दिया और कहा कि लूर्द की चंगाई रहस्यात्मक चीजों में नहीं है। यदि वह गिरजाघर चाहती है और यदि उसे इसका अधिकार है तो उसे अपनी पहचान को प्रकट करना चाहिए।

15वाँ दिव्यदर्शन

बेर्नादेत को कुँवारी मरियम का 15वाँ दिव्यदर्शन, 4 मार्च 1858 को हुआ। फ्राँस में अब तक सभी जान चुके थे कि 4 मार्च, कुँवारी मरियम द्वारा बेर्नादेत को 15 दिनों तक गोरोटो के पास बुलाने का अंतिम दिन था। उस दिन वहाँ करीब 20 हजार लोग उपस्थित थे। उनके साथ एक पूरी सैन्य चौकी भी पूरे यूनिफोर्म के साथ उपस्थित थी। जब बेर्नादेत दर्शनस्थल की ओर बढ़ी, उनके लिए रास्ता छोड़ दिया गया, सैनिक जो उनके साथ चल रहे थे उन्होंने उनके साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार किया।

दिव्यदर्शन के बाद बेर्नादेत ने जब भीड़ से कहा कि वह गोरोटो आना जारी रखेगी क्योंकि सुन्दर युवती ने विदाई के रूप में कुछ नहीं कहा है तब भीड़ निराश और मायूस थी। उन्होंने बेर्नादेत को अनोखी रोशनी में उनके हाव भाव को बदलते देखा था किन्तु उनकी उम्मीद पूरी नहीं हुई जो उस दिव्यदर्शन को देखना और आवाज को सुनना चाहते थे। उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम गुलाब फूल चमत्कारिक रूप से खिल जाएगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

16वाँ दिव्यदर्शन 25 मार्च 1858

16वां दिव्यदर्शन जो मरियम को मिले दूत सन्देश के पर्व के दिन हुआ सुन्दर कुँवारी ने अपना नाम बेर्नादेत को बतलाते हुए कहा, "मैं निष्कलंक गर्भागमन हूँ।" बेर्नादेत इसका अर्थ नहीं समझती थी किन्तु जो लोग इसका अर्थ समझते थे वे लूर्द की ओर दौड़े और वहाँ एक बड़ी भीड़ जमा हो गयी। इससे पहले इतनी भीड़ वहाँ कभी जमा नहीं हुई थी। वहाँ के एक स्थानीय अधिकारी बारोन मास्से ने आदेश दिया कि बेर्नादेत की जाँच तीन अन्य डॉक्टरों से की जाए। उन तीनों ने बेर्नादेत को शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ बताया।

17वां दिव्यदर्शन- 7 अप्रैल 1858

बेर्नादेत्त गोरोटो के पास मोमबत्ती जलाना कभी नहीं भूलती थी। जब से मरियम ने उसे ऐसा करने को कहा था तब से वह रोज ही अपने साथ मोमबत्ती लेकर आती थी। इस दिव्यदर्शन के दौरान प्रार्थना करते हुए अचेत अवस्था में उसने अपना हाथ जलती मोमबत्ती के ऊपर रख दिया था। लोगों ने देखा कि उसका हाथ लौ से जल रहा है। उन्होंने चिल्लाया किन्तु बेर्नादेत शांत बनी थी। वह करीब 15 मिनट तक लगातार प्रार्थना करती रही और उसका हाथ जलता रहा। अपनी प्रार्थना समाप्त कर वह चुपचाप प्रार्थना से उठीं। तब डॉक्टर डोज़ोरूस ने एक दूसरा मोमबत्ती लिया और उसे बिना बताये जलती मोमबती को उसके हाथ के करीब लाया। बेर्नादेत तुरन्त दर्द से चीख पड़ी। इस दिव्यदर्शन के कुछ ही देर बाद उस अधिकारी ने इस मामले को अपने हाथों लिया और गोरोटो बंद कर देने का आदेश दिया एवं वहाँ बने साधारण वेदी को तहस -नहस कर दिया।  

18वाँ दिव्यदर्शन,16 जुलाई 1858

बेर्नादेत अब चिंता मुक्त दिखाई देने लगी थी क्योंकि धीरे-धीरे वह भीड़ से दूर होने लगी थी। कई महीने बीत चुके थे। माऊण्ड कार्मेल की माता मरियम के पर्व के दिन परमप्रसाद लेने के बाद बेर्नादेत ने गोरोटो की ओर लौटने की तीव्र इच्छा महसूस की। चूँकि वहां अब भी घेरा लगा हुआ था, अपनी चाची के साथ वह उस पवित्र स्थान तक नहीं पहुँच सकी, जहाँ वह जाया करती थी, अतः वह दूर ही जमीन पर घुटनी टेक दी और माता मरियम ने उन्हें अंतिम बार दर्शन दिये। इस तरह विरोध एवं बाधाओं के बावजूद माता मरियम की भक्ति रूकी नहीं। यह दिनों दिन बढ़ती गयी।

लूर्द की माता मरियम का तीर्थस्थल

आज ग्रोटो के नजदीक एक तीन मंजिला महागिरजाघर का निर्माण किया गया है। इसके जमीन के निचले तह पर एक विशाल गिरजाघर है जिसमें करीब 7,000 लोग जमा हो सकते हैं। तीर्थस्थल के बगल में चमत्कारिक झरने के जल से रोगियों के स्नान के लिए भी स्थान तैयार किया गया है। कई बार यहाँ भी लोगों को चंगाई मिलती है।  

लूर्द के इस तीर्थस्थल पर हर साल करीब 3 मिलियन तीर्थयात्री आते हैं जिनमें से पाँच लाख बीमार लोग इस आशा से आते हैं कि उन्हें चंगाई मिले। लोगों का कहना है कि करीब 7000 लोगों को अब तक चंगाई मिल चुकी है जिनमें 70 चमत्कारों की आधिकारिक रूप से पुष्टि हो चुकी है। आधिकारिक रूप से पुष्टि के लिए विशेषज्ञों के एक दल द्वारा चंगाई पर गहन अध्ययन किया जाता है। 1947 में विशेषज्ञों के एक दल का गठन किया गया था, तब से यह दल बना हुआ है, जिसमें विभिन्न देशों के 25 डॉक्टर एवं प्रोफेसर शामिल हैं।

लूर्द में माता मरियम के संदेश और उनके अर्थ

18 फरवरी को तीसरे दिव्यदर्शन के दौरान माता मरियम ने बेर्नादेत से पहली बार बातें की। उन्होंने कहा, "मुझे जो कहना है उसे नहीं लिखा जाना है।" इसका अर्थ है कि कुँवारी मरियम चाहती थीं कि उनकी बातों को हृदय में रखा जाए। प्रेम के संदेश को ग्रहण करने के लिए बेर्नादेत अपने हृदय की गहराई को खोलने के लिए बुलायी जा रही थी।

मरियम ने बेर्नादेत से दिव्यदर्शन में कहा कि "क्या तुम 15 दिनों तक यहाँ आ सकती हो?" बेर्नादेत कुँवारी मरियम के दूसरे वाक्य से अत्यन्त खुश थी। यह पहली बार था जब बेर्नादेत औपचारिक रूप से सम्बोधित की गयी थी। इस सम्बोधन द्वारा उसने सम्मानित और स्नेह किये जाने का एहसास किया था। ईश्वर की नजर में हम सभी सम्मानित हैं क्योंकि वे हम प्रत्येक को प्यार करते हैं।

धन्य कुँवारी मरियम का तीसरा वाक्य था, "मैं तुम्हें इस दुनिया में नहीं किन्तु दूसरी दुनिया में खुशी देने की प्रतिज्ञा करती हूँ।" जब येसु सुसमाचार के माध्यम से हमें स्वर्ग राज की खोज करने का निमंत्रण देते हैं तब वे हमें दूसरी दुनिया की खोज करने का निमंत्रण देते हैं। दूसरी दुनिया कहने का अर्थ है जहाँ ईश्वर उपस्थित होते हैं और जहाँ ईश्वर उपस्थित हैं वहाँ प्रेम है।  

अपनी गरीबी, बीमारी और अशिक्षा के बावजूद बेर्नादेत हमेशा खुश रहती थी। यही ईश्वर का राज्य है जो सच्चे प्रेम की दुनिया है। पहले सात दिव्यदर्शनों में बेर्नादेत के चेहरे पर हमेशा खुशी और प्रकाश दिखाई पड़ता था। आठवें और 12वें दिव्यदर्शनों के बीच सब कुछ बदल गया। बेर्नादेत का चेहरा रूखा, उदास और शोकित हो गया और उसने समझ से परे इशारे किये। वह अपने घुटनों के बल गोरोटो के पीछे गयी। गोरोटो के गंदे सतह को चूमा। कुछ कड़वे साग खाये। तीन बार जमीन को खोदा और कीचड़ युक्त पानी को पीने का प्रयास किया। उसने थोड़ा पानी पीया और थोड़ा फेंक दिया। अपने हाथों में कीचड़ लिया और उसे अपने चेहरे पर लगाया। उसके बाद भीड़ की ओर मुड़ी। लोगों ने चिल्लाया कि वह पागल हो गयी है। इन चार दर्शनों में बेर्नादेत में एक ही तरह के भाव प्रकट किये। इन सब का क्या अर्थ था किसी को समझ में नहीं आया।

ख्रीस्त के शरीर धारण, दुःखभोग एवं मृत्यु का संकेत  

बेर्नादेत के ये संकेत बाईबिल के संकेत थे। उन्होंने इन संकेतों के द्वारा ख्रीस्त के शरीर धारण, दुःखभोग एवं मृत्यु का संकेत दिया। घुटनों के बल ग्रोटो के पीछे जाने का अर्थ है ख्रीस्त का शरीरधारण। ईश्वर ने अपने को दीन बनाया और मानव का रूप धारण किया। कड़वा साग खाना, पुराने व्यवस्थान में यहूदियों की परम्परा की याद दिलाती है। मिट्टी को चेहरे पर लगाने की क्रिया को हम नबी इसायस के ग्रंथ में पाते हैं जिसमें उन्होंने ख्रीस्त के बारे कहा था कि वे एक सेवक के रूप में हमारे ही दुःखों को अपने ऊपर लेते हैं।  

नौवें दिव्यदर्शन में कुँवारी मरियम ने बेर्नादेत को भूमि को कुरेदे का संकेत करते हुए कहा, "झरने के पास जाओ, उसमें से पीओ और चेहरा धोओ।" इन क्रियाओं के द्वारा येसु के हृदय का रहस्य हमारे लिए प्रकट होता है, "एक सैनिक ने भाले से उनके बगल को छेदा और वहाँ से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।" घास और कीचड़ मनुष्यों के हृदय का प्रतीक है जो पाप से घायल है फिर भी हृदय की गहराई में, ईश्वरीय जीवन है जिसे झरना द्वारा दर्शाया गया है। बेर्नादेत ने पूछा गया कि क्या उस नारी ने कुछ कहा? तब उसने जवाब दिया, "जी हाँ, उसके कहा, पश्चाताप, पश्चाताप, पश्चाताप।" पापियों के लिए प्रार्थना करो। पश्चाताप का अर्थ हमें मन परिवर्तन के रूप में समझना चाहिए। कलीसिया के लिए मन-परिवर्तन का अर्थ है – अपने हृदय को ईश्वर की ओर और अपने भाई-बहनों की ओर लगाना है जैसा कि ख्रीस्त ने हमें सिखलाया है।    

13वें दिव्यदर्शन के दौरान मरियम ने बेर्नादेत से कहा, "जाओ और पुरोहितों को बतलाओं ताकि लोग प्रोसेशन करते हुए यहाँ आयें तथा एक प्रार्थनालय का निर्माण किया जाए।"

प्रोसेशन करते हुए आने का अर्थ है, इस जीवन में भाई बहनों की सहायता करना और उनका साथ देना। प्रार्थनालय का अर्थ है गिरजाघर। यहाँ एक प्रार्थनालय का निर्माण करने का अर्थ है –तीर्थयात्रियों को विश्राम प्रदान करने के लिए गिरजाघर का निर्माण करना।

25 मार्च 1858 को 16वें दिव्यदर्शन के दौरान, बेर्नादेत ने मरियम से पूछा कि उनका नाम क्या है तब उन्होंने जवाब दिया "मैं निष्कलंक गर्भागमन हूँ।" निष्कलंक गर्भागमन का अर्थ है कुँवारी मरियम का निष्पाप गर्भधारण करना। बेर्नादेत पल्ली पुरोहित के पास उनका नाम बतलाने जाती है जब पल्ली पुरोहित स्वीकार करता है कि वे ईश्वर की माता हैं जो गोरोटो में दर्शन देती है। बाद में टार्ब्स के धर्माध्यक्ष लौरेंस ने माता मरियम के दिव्यदर्शन की घोषणा की।

संदेश पर हस्ताक्षर तभी की गयी जब मरियम ने दिव्यदर्शन के तीन सप्ताह बाद अपना नाम प्रकट किया। 25 मार्च को स्वर्गदूत द्वारा मरियम को येसु के जन्म का संदेश दिये जाने का पर्व मनाया जाता है और मरियम ने इसी दिन येसु को अपने गर्भ में धारण किया था।

माता मरियम गोरोटो से हमें बतलाती हैं कि वे येसु की माता हैं। उनका पूरा अस्तित्व ईश्वर को अपने गर्भ में धारण करने और उनके लिए पूर्ण रूप से समर्पित होने में है। यही कारण है कि वे निष्कलंक हैं, ईश्वर उनमें पूरी तरह निवास करते हैं। अतः कलीसिया और प्रत्येक ख्रीस्तीय को चाहिए कि निष्कलंक बनने के लिए वह अपने आप में ईश्वर को निवास करने दे। हम पूरी तरह क्षमा किये जाएँ ताकि हम भी माता मरियम के समान उनके साक्षी बन सकें।

 

19 August 2019, 17:10