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भारत के आदिवासी नृत्य करते हुए भारत के आदिवासी नृत्य करते हुए  (ANSA)

भारतीय आदिवासियों द्वारा शोषण का विरोध करने की मांग

भारत के आदिवासियों ने बढ़ते उत्पीड़न के बीच अपनी पहचान और संस्कृति की रक्षा करने के लिए कहा है।

माग्रेट सुनीता मिंज - वाटिकन सिटी 

नई दिल्ली, सोमवार, 13 अगस्त 2018 (उकान) : विश्व आदिवासी दिवस को चिह्नित करने के लिए इकट्ठे हुए लगभग 2,000 लोगों को भारत में चुनौतियों का मुकाबला करने हेतु अपनी पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए कहा गया।

9 अगस्त को नई दिल्ली में सभा को संबोधित करने वाले नेताओं ने 2014 में संघीय स्तर पर और कई राज्यों में हिंदू भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सत्ता में आने के बाद आदिवासी लोगों पर बढ़े शोषण के आंकड़ों और घटनाओं को प्रस्तुत किया।

आदिवासियों पर अत्याचार

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता जेसुइट फादर विन्सेंट एकका ने प्रतिभागियों से कहा, "आदिवासियों पर अत्याचार होना यह नई बात नहीं है लेकिन अब आदिवासियों को राष्ट्र विरोधी के रूप में देखा जा रहा है और सरकार उन्हें हमेशा परेशान करेगी।" उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने आदिवासी लोगों के कुछ क्षेत्रों में आत्म-प्रशासन करने की शक्ति प्रदान की है, लेकिन स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी इसका पालन नहीं कर रहे हैं।

फादर एक्का जेसुइट धर्मसंघ द्वारा संचालित भारतीय सामाजिक संस्थान में आदिवासी अध्ययन विभाग के प्रमुख हैं, जिन्होंने अंतररार्ष्ट्रीय दिवस को चिह्नित करने के लिए भारत भर में आदिवासियों और नेताओं की बैठक का आयोजन किया था।  बैठक का विषय था,"आदिवासियों का प्रवास और आंदोलन।"

बैठक में आदिवासी नेताओं ने याद किया कि सरकार ने विकास के नाम पर आदिवासियों की भूमि को लेने और जंगलों को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए और बहुराष्ट्रीय कंपनियों और खनिकों के लिए कार्य करने हेतु रास्ता साफ कर दिया। इसकी वजह से कई आदिवासियों को शहरों में स्थानांतरित होने को मजबूर होना पड़ा।

आदिवासियों का प्रवासन

ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के प्रोफेसर लखीराम मुर्मू ने कहा, "प्रवासन के मुख्य कारण खनन, बिजली परियोजनाएं और उद्योग हैं।" 2011 की जनगणना दिखाती है कि भारत में आंतरिक प्रवासियों की कुल संख्या 139 मिलियन थी।

एक आदिवासी वरिष्ठ सर्जन डा. मुर्मू ने कहा कि "जब हम प्रवासन के बारे में बात करते हैं, तो यह ज्यादातर हमारे लोग हैं जो इससे प्रभावित होते हैं और हमें जीविकोपार्जन के नये साधनों की शुरुआत करके इसका समाधान करना पड़ेगा।"

आदिवासी युवा नेता गणेश माझी ने कहा कि सरकार "उन्हें कम कीमत पर सब्सिडी वाले अनाज देकर गांवों को खेती से दूर ले जाने का षड्यंत्र चला रही है। जब वे खेत में काम नहीं करेंगे तो जमीन बंजर बन जाएगी और उन्हें अंत में जमीन से हाथ धोना पड़ सकता है।"

शहरों में आदिवासियों की पहचान और संस्कृति खतरे में

भूमि वैज्ञानिक और सरकारी अधिकारी अशोक बख़ला ने कहा कि आदिवासी प्रवासियों को ज्यादातर शहरों में आदिवासियों के रूप में मान्यता नहीं दी जाती है, लेकिन उन्हें एक सामान्य श्रेणी में दर्ज किया जाता है। "इसका मतलब है कि हम अपनी पहचान और संस्कृति खो देते हैं।" बख़ला ने कहा कि यह जनगणना के आंकड़ों में आदिवासी आबादी को प्रभावित करेगा और सरकारी नौकरियों के आरक्षण के लिए भी इसका बुरा असर हो सकता है।

भारत में करीब 104 मिलियन आदिवासी लोग हैं जो आबादी का 8 प्रतिशत हैं। हालांकि, भारत के 27 मिलियन ख्रीस्तियों का 30 प्रतिशत आदिवासी समुदायों से आते हैं, खासकर उत्तरी और पूर्वी राज्यों में।

ख्रीस्तीय मिशनरी आदिवासियों के लिए आधुनिक शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन कुछ कट्टरपंथी हिंदू समूह ख्रीस्तियों की सेवा को ख्रीस्तीय धर्म परिवर्तित करने का एक साधन होने का आरोप लगाते हैं। इस आरोप को ख्रीस्तीय नेताओं ने लगातार इनकार किया है।

13 August 2018, 15:17