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13 मई 1981 को संत पापा जॉन पौल द्वितीय पर हमला 13 मई 1981 को संत पापा जॉन पौल द्वितीय पर हमला  (ANSA)

13 मई 1981 ˸ उस भाग्यशाली दिन की याद

40 वर्षों पहले संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में संत पापा जॉन पौल द्वितीय पर घातक हमला किया गया था। यह एक यादगार दिन बन गया, जब प्रेम एवं प्रार्थना ने घृणा को जीत लिया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 11 मई 2021 (वीएनएस)- कुछ ऐसी तिथियाँ हैं जो न केवल इतिहास की किताबों से जुड़ी हैं बल्कि अमिट रूप से हमारे जीवन के इतिहास के पन्नों में अंकित हैं। इन घटनाओं की छाप इतनी पक्की है कि कई सालों के बाद भी हम पूरी तरह याद कर सकते हैं कि उस समय हम कहाँ थे और क्या कर रहे थे।

13 मई 1981 निश्चय ही इन तिथियों में से एक है। उस दिन एक असंभव, अकल्पनीय प्रतीत होनेवाली घटना, सच्ची साबित हुई थी : संत पापा जॉन पौल द्वितीय पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में हमला किया गया था। 40 वर्षों के बाद, बसंत के उस दोपहर की याद, आवाजें और शोरगुल अब भी सिहरन पैदा कर देती हैं। यह शाम के करीब 5.19 बजे का समय था, पोप जॉन पौल द्वितीय सामान्य रूप से बुधवारीय आमदर्शन समारोह के लिए विश्वासियों के बीच घूम रहे थे, उन्होंने एक बालिका को अपनी गोद में लिया, उसके बाद उसके माता-पिता को वापस किया। उसके कुछ ही मिनट बाद एक गोली चलने की आवाज आयी, फिर दूसरी गोली चली। पोप के पेट पर गोली लगी थी, वे खुली कार जिसपर वे सवार थे, मूर्छित होकर गिर पड़े। यह एक हृदय विदारक घड़ी थी। लोग बेचैन हो गये, शुरू में वे समझ नहीं पाये, विश्वास भी नहीं कर पा रहे थे कि यह वास्तव में घटित हुआ था।

अनेक तीर्थयात्री रो पड़े, कुछ घुटनी टेककर प्रार्थना करने लगे, जिस रोजरी को पोप की आशीष दिलाने लाये थे उसे हाथ में लेकर रोजरी विन्ती करने लगे। जो लोग याद करते हैं वे बतलाते हैं कि 64 साल पहले 13 मई को फातिमा की माता मरिया ने चरवाहे बच्चों को दर्शन दिया था, अतः लोगों ने सब कुछ को कुँवारी मरियम को सौंप दिया। वास्तव में, माता मरियम ने उनकी रक्षा की थी, उन्होंने बाद में पुष्टि दी कि उनके बचने का श्रेय माता मरियम को जाता है। एक हाथ उन्हें मारना चाहता था, वहीँ दूसरे अधिक शक्तिशाली हाथ ने गोली को विचलित कर दिया और उनके जीवन को बचा लिया।

शीघ्र ही, 13 मई की शाम को वाटिकन से शुरू हुई प्रार्थना पूरे विश्व में फैल गई। यह प्रार्थना लाखों लोगों के लिए एक स्वतः आंदोलन बन गयी जब उन्होंने जाना कि पोप जीवन और मौत से जूझ रहे हैं। इस समय फादर जॉर्ज मारियो बेरगोलियो, बोयनोस आयरेस में संत जोश के मास्सिमो कॉलेज के रेक्टर थे। वे भी घटना से हिल गये थे और उनके लिए प्रार्थना की। संत पापा फ्राँसिस 13 मई की याद को आज हमें बाटते हैं : वे उस समय अर्जेंटीना के प्रेरितिक राजदूतावास में थे और दोपहर के भोजन के पहले, राजदूत उर्बल्दो कलाब्रेसी एवं बेनेजुएला के फादर उगाल्दे भी वहाँ मौजूद थे। उसी समय प्रेरितिक राजदूतावास के सचिव क्लौदियो मरिया चेली उन्हें यह दुखद समाचार देने आये।

इस तरह विश्वासी लगातार प्रार्थना करते रहे जब तक कि पोप जॉन पौल द्वितीय खतरे से बाहर नहीं हो गये। इसे ऐसा भी कहा जा सकता है कि विश्वासी इस धरती पर उनके जीवन के अंत तक साथ देंगे, खासकर, पीड़ा, बीमारी की घड़ी में, 2005 के आखिरी दिनों तक। यह महत्वपूर्ण है, कि उस क्षण की भावनाओं के बावजूद वाटिकन रेडियो के कालक्रम से अभिलेखन करनेवाले बेनेदेत्तो नरदाची जो परम्परागत बुधवरीय आमदर्शन समारोह के बारे समेंटरी दे रहे थे अब एक ऐसी घटना के बारे बताने के लिए मजबूर थे जिसको वे कभी नहीं बोलना चाहते थे उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया। मारदाच्ची ने कहा, "पहली बार, वाटिकन में भी आतंकवाद की बात हो रही है। एक ऐसे शहर में आतंकवाद की बात हो रही है जहाँ से प्रेम के संदेश, सौहार्द के संदेश और शांति के संदेश प्रसारित किये जाते हैं।"

वास्तव में, उस आपराधिक कृत्य के द्वारा लाया गया घृणा का प्रभाव कुछ हद तक, एक प्रभावशाली सर्वनाशक था, फिर भी, प्यार और दया की शक्ति अधिक मजबूत हो गई जो एक प्रकाशमान और "रहस्यमय" तरीके से पोप जॉन पॉल द्वितीय  के जीवन एवं परमाध्यक्षीय काल का मार्गदर्शन की। इसे आश्चर्य के साथ चौथे दिन देखा गया, जब उन्होंने जेमेल्ली अस्पताल से स्वर्ग की रानी प्रार्थना करने के बाद, गोली चलाने वाले को माफ कर दिया। उन्होंने कहा, "भाई जिसने मुझपर गोली चलायी।" उन्होंने उन्हें "भाई" कहकर पुकारा। और यह आम भाईचारा - पृथ्वी पर होनेवाली हर चीज के बावजूद अमिट है, क्योंकि यह स्वर्ग में अंकित है। 27 दिसंबर, 1983 एक और तारीख है जिसे भूलना मुश्किल है। उस दिन संत पापा जॉन पौल द्वितीय रीबिबिया के जेल गये। उन्होंने ऐसा सार्वजनिक रूप में किया। इस प्रकार वे उस व्यक्ति के जीवन को बचाना चाहते थे जिसने उनकी जान लेने की कोशिश की। मुलाकात के बाद संत पापा ने कहा, "हम दो व्यक्तियों एवं दो भाइयों के रूप में मिले। क्योंकि हम सभी भाई हैं और हमारे जीवन की सभी घटनाएँ इस बात को पुष्ट करें कि हम भाई हैं क्योंकि ईश्वर हमारे पिता हैं।" आज संत पापा फ्राँसिस इसी भ्रातृत्व को दिखलाते हैं कि भावी मानवता के लिए सिर्फ एक रास्ता है।

संत पापा जॉन पौल द्वितीय पर हमला

 

12 May 2021, 15:08