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संत पेत्रुस महागिरजाघर संत पेत्रुस महागिरजाघर  संपादकीय

ऐतिहासिक निर्णय, फरवरी के सम्मेलन का परिणाम

नाबालिगों के विरूद्ध यौन शोषण के मामलों में परमधर्मपीठ गोपनीयता को समाप्त करने के साथ ही, संत पापा फ्राँसिस ने पारदर्शिता के पथ को अपनाया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, मंगलवार, 17 दिसम्बर 2019 (रेई)˸ वाटिकन न्यूज के सम्पादक अंद्रेया तोरनिएली ने कहा है कि संत पापा फ्राँसिस द्वारा फरवरी 2019 में, नाबालिगों की सुरक्षा पर सम्मेलन ने फल लाया है। उन्होंने कहा कि वास्तव में, 17 दिसम्बर को एक महत्वपूर्ण निर्णय की घोषणा की गयी है। इसे ऐतिहासिक के रूप में परिभाषित करना खतरनाक नहीं होगा। यह निर्णय परमधर्मपीठीय गोपनीयता के संबंध में है। संत पापा ने एक अध्यादेश के माध्यम से, नाबालिगों के साथ यौन शोषण, यौन हिंसा एवं बच्चों के अश्लील तस्वीरों के मामलों में इसे समाप्त करने का निश्चय किया है।

इसका अर्थ है कि यौन शोषण के ऐसे मामलों से संबंधित वैध परीक्षणों में निर्मित किसी तरह की रिपोर्ट, गवाही एवं दस्तावेज, वाटिकन विभाग के अभिलेखागार में अथवा धर्मप्रांत के अभिलेखागार में पाये गये दस्तावेज, जो अब तक परमधर्मपीठ की गोपनीयता के अधीन थे, उन्हें उन देशों के वैध अधिकारियों को सौंप दिया जायेगा जिनकी मांग वहाँ की जायेगी। यह खुलापन, पारदर्शिता और नागरिक अधिकारियों के साथ सहयोग करने की इच्छा रखने का चिन्ह है।

वाटिकन विभागों के अभिलेखागार के संबंध में, अनुरोध को राज्यों के बीच संबंधों के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय प्रथागत रूगेटरी प्रक्रिया के माध्यम से भेजा जाना चाहिए। धर्मप्रांत के अभिलेखागार में दस्तावेजों की मांग करने की प्रक्रिया अलग है। संबंधित देश में सक्षम कानूनी अधिकारी सीधे धर्माध्यक्ष से अनुरोध कर सकते हैं। इसमें कलीसिया और राज्य के बीच समझौतों के लिए प्रदान की गई विशेष व्यवस्था अप्रभावित रहती है।

विगत मई में प्रकाशित मोतु प्रोप्रियो वोस एसतीस लुक्स मुंदी में संत पापा फ्राँसिस के निर्णय विस्तार रूप से स्पष्ट है।

बच्चों और युवाओं की भलाई, हमेशा किसी गोपनीय, यहां तक कि "परमधर्मपीठीय" गोपनीयता के किसी भी संरक्षण से पहले होनी चाहिए। अध्यादेश निश्चय ही पापस्वीकार संस्कार की गोपनीयता को प्रभावित नहीं करता, जो परमधर्मपीठीय गोपनीयता से पूरी तरह अलग है जिसमें दस्तावेजों एवं गवाहों को गुप्त रखा जाता है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इन मामलों में धर्मवैधानिक परीक्षणों में निर्मित दस्तावेज, सार्वजनिक स्थानों में रखे जाएँ अथवा सार्वजनिक प्रकटीकरण की चीज बनें। पीड़ितों और गवाहों की गोपनीयता का अधिकार हमेशा सुरक्षित होना चाहिए।

हालांकि, दस्तावेज़ीकरण को उन मामलों की जांच के उद्देश्य के लिए नागरिक प्राधिकरण के निपटान में रखा जाना चाहिए, जिनके लिए वैध कार्यवाही पहले ही शुरू हो चुकी है।

17 December 2019, 17:42