माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी
न्यूयॉर्क, शनिवार 6 अप्रैल 2019 (वाटिकन न्यूज) : परमधर्मपीठ उन नीतियों का आग्रह कर रही है जो वास्तविक समानता, बंधुत्व और शांति की दुनिया का निर्माण करने के लिए जीवन, परिवार और समाज के भौतिक और नैतिक विकास को लाभ पहुंचाती हैं।
संयुक्त राष्ट्र में परमधर्मपीठ के स्थायी पर्यवेक्षक महाधर्माध्यक्ष बेर्नार्दितो औज़ा ने कहा, “सरकारों और समाज को उन सामाजिक नीतियों को बढ़ावा देना चाहिए जो परिवार को पर्याप्त संसाधन और समर्थन के कुशल साधन प्रदान कर सके। परिवार में बच्चों की सही परवरिश और बुजुर्गों की देखभाल हो। बुजुर्गों को परिवारों से दूर न करने के लिए सहायता करना चाहिए।
महाधर्माध्यक्ष बेर्नार्दितो जनसंख्या और विकास (आईसीपीडी) पर 1994 में काहिरा में हुए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के बाद से हुई प्रगति का मूल्यांकन करते हुए बैठक में बोल रहे थे। सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने 2030 तक हासिल करने का प्रण किया है।
जनसंख्या और विकास
वाटिकन राजनयिक ने बताया कि पहली बार जनसंख्या और विकास के बीच आइसीपीडी द्वारा संपर्क स्थापित किया गया था। सम्मेलन ने जनसंख्या नीतियों के कार्यान्वयन में सभी प्रकार के ज़बरदस्ती को खारिज कर दिया। विवाह पर आधारित परिवार को व्यापक समर्थन और संरक्षण के हकदार, समाज की मौलिक इकाई के रूप में मान्यता दी गई थी। महिलाओं की स्थिति में सुधार से उनके स्वास्थ्य के संबंध में और विकास में उनकी पूर्ण और समान भागीदारी के लिए एक मजबूत प्रेरणा मिली। प्रवास की बढ़ती संख्या को विकास के प्रभाव के साथ जोड़ा गया।
मानव जीवन
मानव जीवन को आगे बढ़ाने और पोषण के बारे में महाधर्माध्यक्ष औजा ने कहा कि प्रजनन स्वास्थ्य को गर्भपात के अधिकार के रूप में सुझाव देना स्पष्ट रूप से आईसीपीडी की भाषा का उल्लंघन करता है, नैतिक और कानूनी मानकों की अवहेलना करता है तथा माताओं और बच्चों, विशेष रूप से अजन्मे शिशु की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने के प्रयासों को विभाजित करता है।
महाधर्माध्यक्ष औजा ने कहा कि जीवन को आगे बढ़ाने और पोषण के बारे में किया गया सवाल परिवार की भलाई को ध्यान में रखे बिना नहीं किया जा सकता, जिसे मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा "समाज की प्राकृतिक और मौलिक इकाई" के रूप में परिभाषित करती है।
पर्यावरण
महाधर्माध्यक्ष औजा ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि को अक्सर पर्यावरणीय समस्याओं के लिए गलत तरीके से दोषी ठहराया जाता है। बल्कि, विश्व में बढ़ती असमानताएं, प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर शोषण और प्राकृतिक पर्यावरण को खतरे में डालने वाले उद्योगों में प्रतिबंध या सुरक्षा उपायों की अनुपस्थिति इसके कारण हैं।
इस तरह की असमानताओं के सामने, महाधर्माध्यक्ष औज़ा ने एक समाधान के रूप में संत पापा फ्राँसिस के "पर्यावरणीय परिवर्तन" को प्रस्तुत की, जो कि एक सरल जीवन शैली को अपनाने और दुनिया के संसाधनों के खपत में जिम्मेदार बदलाव लाने हेतु जागरूक होने की मांग करती है।