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संत पापा फ्राँसिस धर्माध्यक्षों के साथ संत पापा फ्राँसिस धर्माध्यक्षों के साथ  (AFP or licensors)

कलीसिया में नाबालिगों के संरक्षण की पहल आज की नहीं

"कलीसिया में नाबालिगों की सुरक्षा" पर बैठक के पूर्व, हम पहले से ही पुरोहितों द्वारा बच्चों के यौन दुर्व्यवहार के खिलाफ लड़ाई में परमाध्यक्षों, धर्मध्यक्षीय सम्मेलनों और स्थानीय कलीसियाओं द्वारा उठाए गए मार्ग का पुनरावलोकन करें।

माग्रेट सुनीता मिंज-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 18 फरवरी 2019 (रेई) : "कलीसिया में नाबालिगों की सुरक्षा" पर विशेष बैठक,  21 से 24 फरवरी तक वाटिकन में होगी। हर देशों के काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों के अध्यक्ष और दुनिया भर में  धर्मसंघों के जम्मेदार अधिकारी इस बैठक में शिरकत करेंगे। यह अभूतपूर्व धर्मसभा की विशेषताओं के साथ कलीसिया के धर्माध्यक्षों की एक प्रेरितिक बैठक है, जो पुरोहितों द्वारा किए गए नाबालिगों के प्रति दुर्व्यवहारों के खिलाफ लड़ाई के ऐतिहासिक संदर्भ में संत पापा फ्राँसिस की प्राथमिकता का प्रतिनिधित्व करती है। बैठक का लक्ष्य, पीड़ितों की बात सुनना, जागरूकता बढ़ाना, ज्ञान बढ़ाना, नए नाम एवं प्रक्रियाएँ विकसित करना और अच्छी प्रथाओं को साझा करना है।

एक लंबी यात्रा का एक चरण

यह बैठक निश्चित रूप से कलीसिया में नाबालिगों की सुरक्षा पर परमधर्मपीठ के पहले चरण का प्रतिनिधित्व नहीं करती है और न ही इस दिशा में धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों का पहला कदम है। यह एक यात्रा का ऐतिहासिक चरण है जो काथलिक कलीसिया कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में तीस से अधिक वर्षों से और यूरोप में लगभग दस वर्षों से चला आ रही है। याजकों द्वारा बाल दुर्व्यवहार के मामलों पर धर्मवैधानिक नियमों का नवीनीकरण अठारह साल पहले से ही वाटिकन में शुरू हुआ। जबकि पिछले बीस वर्षों में परमाध्यक्षों ने इस दर्दनाक विषय पर अनगिनत टिप्पणियाँ, संदेश और दस्तावेज समर्पित किया है।  संत पापा द्वारा वांछित बैठक की पूर्व संध्या पर, कोई भी नाबालिगों की सुरक्षा के लिए कलीसिया की प्रतिबद्धता में "शून्य वर्ष" की बात नहीं कर सकता है।

पहली कार्यवाही : कनाडा, अमेरिका, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया

दुनिया के धर्माध्यक्षीय सम्मेलनों में यौन हिंसा से संबंधित निर्देश जारी करने वालों में कनाडा वह धर्माध्यक्षीय सम्मेलन है जिसने सन् 1987 में इस निर्देश को जारी किया। याजकों द्वारा नाबालिगों के यौन हिंसा की खबरों को बार-बार सामने लाने पर सार्वजनिक राय के बाद 1989 में,  कनेडियन कलीसिया में एक "अद होक" समिति का संगठन हुआ, जिसने 1992 में "पीड़ा से आशा तक" दस्तावेज प्रकाशित किया था जिसमें काथलिकों द्वारा धर्माध्यक्षों और याजकीय प्रशिक्षण के लिए जिम्मेदार पुरोहितों के पास भेजी गई 50 "सिफारिशें" शामिल थीं।

संयुक्त राज्य अमेरिका के धर्माध्यक्षीय सम्मेलन जून 1992 की आमसभा में पहली बार आधिकारिक रूप से पुरोहितों द्वारा नाबालिगों के खिलाफ यौन हिंसा पर विचार किया गया। इसके तहत "5 सिद्धांतों" का पालन किया गया। इनमें से, "यदि पुरोहित पर आरोप पर्याप्त सबूतों द्वारा समर्थित हैं तो दोषी ठहराये गये पुरोहित को प्रेरितिक कार्यों से निष्कासित किया जाता है और "पर्याप्त निर्णय और चिकित्सा हस्तक्षेप" का संदर्भ दिया जाता है। इसके अलावा, ‘बोस्टन ग्लोब’ द्वारा एक ऐतिहासिक जांच में निम्नलिखित वर्षों में घटना के प्रसार और प्रबंधन की अपर्याप्तता की  घोषणा के बावजूद अमेरिकी कार्डिनल को अप्रैल 2002 में रोम बुलाने के लिए संत पापा जॉन पॉल द्वितीय को आलोचना का शिकार होना पड़ा था।

आयरलैंड में, 1994 में, कलीसिया ने पुरोहितों और धर्मसंघियों द्वारा बाल यौन उत्पीड़न पर आयरिश काथलिक धर्माध्यक्षों की सलाहकार समिति की स्थापना की, जिसने वर्ष 1995 दिसंबर में अपनी पहली "अंतिम रिपोर्ट" प्रकाशित की। दुनिया में पहले प्रोटोकॉल में से एक है कि ऑस्ट्रेलिया के धर्मप्रांतों में पुरोहितों द्वारा किए गए पीडोफिलिया के मामलों की कार्यवाही हेतु दिसंबर 1996 में, "टूवार्ड्स हीलिंग" दस्तावेज़ को सभी ऑस्ट्रेलियाई धर्मप्रांत के लिए स्वीकृत किया गया और मार्च 1997 में चालू किया गया।

नए वैधानिक नियम: दुरुपयोग ‘गंभीर अपराध’

21वीं सदी की शुरुआत के बाद से, परमधर्मपीठ, विशेष रूप से कार्डिनल रात्सिंगर (संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें) की कार्रवाई के लिए धन्यवाद, उन्होंने दुरुपयोग के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए कलीसिया के वैधानिक मानदंडों का गहन अध्ययन कर, दंड प्रक्रियाओं और दक्षताओं के नवीकरण पूरा किया। 2001 में, संत पापा जॉन पॉल द्वितीय के मोतू प्रोप्रियो ‘साक्रामेंटुम संतितातिस तूतेला में तथाकथित "सबसे गंभीर अपराधों" के बीच एक पुरोहित द्वारा नाबालिगों के यौन शोषण के अपराध को सम्मिलित करता है, जिसकी कार्यवाही विश्वास के सिद्धांत के धर्मसंघ के लिए आरक्षित है। 2010 में, संत पापा बेनेडिक्ट सोलहवें ने विश्वास सिद्धांत के धर्मसंघ के माध्यम से "सबसे गंभीर अपराधों पर नए नियम" प्रकाशित किये, जो "अतिरिक्त-न्यायिक डिक्री द्वारा" प्रक्रियाओं को गति प्रदान की और "चाइल्ड पोर्नोग्राफी" अपराध को सम्मिलित किया। उसी वर्ष जर्मनी में, जहां इस विषय पर पहला "दिशा निर्देश" 2002 में पहले ही प्रकाशित हो चुका था, बर्लिन में  येसु समाजियों के "कनिसियस" कॉलेज में इस मामले को लेकर बड़ा विस्फोट हुआ। जो धर्माध्यक्षीय सम्मेलन को अधिकारियों के साथ सहयोग बढ़ाने और खुद का नवीकरण करने के लिए उन्हें बाध्य किया।........ लगातार   

18 February 2019, 16:36