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संत पापाः संतगण हैं हमारे अनवरत सहायक

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में प्रार्थना और संत मंडली के संग हमारे संबंध पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी-गुरूवार, 07 अप्रैल 2021 (रेई) पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज मैं प्रार्थना और संतों के संग हमारे संबंध पर चिंतन करना चाहूँगा। वास्तव में, जब हम प्रार्थना करते हैं, तो हम इसे अकेले नहीं करते हैं, यहाँ तक कि प्रार्थना के विचार मात्र ही हमें निवेदनों की दरिया में डूबो देता है जहाँ हम अपने को हमारी मध्यस्थता करने वाले के बीच में पाते हैं।

इतिहास सदा हमारे साथ 

प्रार्थना के विभिन्न रुप जिसे हम धर्मग्रंथ बाईबल में पाते हैं- मुक्ति इतिहास की कहानियाँ, निर्वासन का दुःखद हाल, भावविहृल वापसी, सृष्टि में ईश्वर के आश्चर्यजनक कार्यों के लिए उनका धन्यवाद और स्तुति गान धर्मविधि के अंग हैं। हम इन सारी चीजों को पीढ़ी दर पीढ़ी साझा करते हैं जहाँ हम अपने जीवन के व्यक्तिगत अनुभवों को समाज और सारी मानवता के साथ बुना हुआ पाते हैं। कोई भी अपने इतिहास को, अपने लोगों के इतिहास को खुद से अलग नहीं कर सकता है, हम हमेशा इस विरासत को अपने दिनचर्यों और प्रार्थना में साथ ले कर चलते हैं। स्तुतिगान की प्रार्थना विशेषकर जो नम्र हृदयों की गहराई से निकलती है, मरियम के महिमागान की तरह होती है जिसे उन्होंने अपनी कुटुंबिनी एलिजबेद के समक्ष भजन स्वरूप गाया। यह उम्रदार उस सिमियोन के स्तुतिगान की तरह होते जिसे उन्होंने बालक येसु को अपनी बांहों में लेते हुए घोषित किया,“प्रभु, अब तू अपने वचन के अनुसार अपने दास को शांति के साथ विदा कर” (लूका.2.29)।

प्रार्थनाओं का प्रचार स्वतः  

प्रार्थनाएं जो अपने में अच्छी हैं सदैव “प्रसारित” होती है, वे सामाजिक संचार माध्यमों में डाले बिना ही निरंतर फैलती जाती हैं- अस्पतालों के कमरों से, खुशी के क्षणों से लेकर चुपचाप दुःख सहने की परिस्थितियाँ, एक व्यक्ति की पीड़ा सभों की पीड़ा और एक व्यक्ति की खुशी किसी दूसरे व्यक्ति के हृदय की खुशी बनी है। दर्द और खुशी, एक पूरी कहानी, कहानियां जो किसी के जीवन का इतिहास बनती है, इतिहास अपने शब्दों में ही ब्याँ होता है, लेकिन उनमें अनुभव एक ही होता है।

हमारे पुरखे हमारे निवेदक

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि प्रार्थना की उत्पत्ति हमेशा होती है, जहाँ हम अपने हाथों को जोड़ते और हृदयों को ईश्वर के लिए खोलते हैं। अपनी प्रार्थना में हम परिचित संतों और अपरिचित संतों के सहचर्य को पाते हैं जो भाई-बहनों के रूप में हमारे साथ, हमारे लिए निवेदन करते हैं जो हमसे पहले ईश्वरीय निवास के अंग बन गये हैं। कलीसिया में कोई शोक नहीं है जो अकेलेपने में उत्पन्न होता है, कोई आंसू नहीं जो विस्मृति में बहाई जाती है, क्योंकि हर कोई एक सामान्य अनुग्रह में सहभागी होते हैं। हम इसमें कोई संयोग नहीं पाते हैं कि प्राचीन कलीसिया में लोग घरों के बागानों में दफनाये जाते थे, मानों यह इस बात की अभिव्यक्ति हो कि हमसे पहले गुजर गये लोग परिवार के हर ख्रीस्तयाग में सहभागी हो रहे हों। हम अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और धर्म माता-पिता को अपने बीच में पाते हैं हमारे धर्मशिक्षक और शिक्षणगण हमारे साथ निवास करते हैं। हमें विश्वास दिया गया, उस विश्वास का प्रसार हुआ और उस विश्वास के कारण हम सभी प्रार्थना करते हैं।

संतों का संरक्षण हमारा साक्ष्य

संत पापा ने कहा कि संतगण हमारे साथ अब भी यहाँ हैं वे हमसे दूर नहीं हैं, कलीसिया में उनका सहचर्य सदैव “बदलों के साक्ष्यों” स्वरूप हमारे बीच रहता है (इब्रा.12.1)। वे हमारे लिए साक्ष्यों के रुप में हैं जिनकी आराधना हम नहीं करते बल्कि हम उन्हें सम्मान देते हैं जो हजारों रूप में हमें येसु ख्रीस्त के निकट लाते हैं, जो हमारे लिए ईश्वर और मनुष्य के बीच में एकमात्र मध्यस्थ हैं। एक “संत” हमें येसु की ओर नहीं ले चलता तो वह संत नहीं है, वह एक ख्रीस्तीय भी नहीं। संत हमें येसु की याद दिलाता है क्योंकि वह उनकी राहों में एक ख्रीस्तानुसार चलता है। संत हमें याद दिलाते हैं कि अपनी कमजोरी और पापों के बावजूद भी हमारी पवित्रता में निखर आ सकती है। संत पापा ने कहा कि सुसमाचार में हम स्वयं येसु को एक डाकू को प्रथम संत घोषित करते हुए पाते हैं। पवित्रता जीवन की राह है जहाँ हम येसु से मिलते हैं। यह सदैव एक साक्ष्य है, संत हमें साक्ष्य देता है, वह जो येसु से मिलकर उसके पीछे चलता है। हमारे लिए देर नहीं हुई है हम मनफिराव करते हुए ईश्वर की ओर अभिमुख हों जो भले और प्रेमपूर्ण हैं (स्त्रो.103.8)।

संतों के निवेदनः बड़ी सेवा

काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा हमें बतलाती है कि संतों ने ईश्वर पर मनन-ध्यान किया, उनकी स्तुति की और सदैव उनकी देख-रेख की जो दुनिया मे छोड़ दिये गये। उनके निवेदन हमारे लिए ईश्वर की योजना में सबसे बड़ी सेवा है। हम हमारे लिए और सारी दुनिया के लिए उनसे प्रार्थना करें (सीसीसी.2683)। हम येसु ख्रीस्त में अपने बीच से पहले गुजरे लोगों और हम जो सहयात्रीगण हैं, अपने बीच एक रहस्यात्मक एकता को पाते हैं- स्वर्ग से हमारे प्रियजन निरंतर हमारी चिंता करते हैं। वे हमारे लिए और हम उनके लिए प्रार्थना करते हैं।

संत पापा ने कहा कि हमारे बीच प्रार्थनामय एकता को हम इस पृथ्वी पर एक संबंध के रुप में अनुभव करते हैं। हम एक दूसरे के लिए निवेदन और प्रार्थना अर्पित करते हैं। किसी के लिए प्रार्थना करना ईश्वर को उसके बारे में बलताला है। यदि हम निरंतर ऐसा करते हैं तो हमारा हृदय बंद नहीं होता वरन वह हमारे भाई-बहनों के लिए खुला रहता है। दूसरों के लिए प्रार्थना करना प्रेम करने का प्रथम रूप है जो हमें ठोस रुप में उनके निकट लेकर आता है। संत पापा ने कहा कि लड़ाई की परिस्थिति में भी, उसके समाधान हेतु हमें उस व्यक्ति के लिए प्रार्थना करने की जरुरत हैं जिससे हमारा अनबन है। प्रार्थना में चीजें बदलती हैं। इसमें सर्वप्रथम मेरा हृदय परिवर्तन होता है मेरी मनोभावनाएँ बदलती हैं। ईश्वर हममें परिवर्तन लाते और हमारे बीच से युद्ध की स्थिति दूर करते हुए हमारा मेल करते हैं।

हमारी सलामत प्रार्थना का प्रतिफल

दुःखों का सामना करने की प्रथम कड़ी में हम अपने भाई-बहनों की याद करते, संतों की मध्यस्थता से निवेदन करते हैं। संत पापा ने कहा कि बपतिस्मा में मिला नाम हमारी सजावट हेतु नहीं है। यह सधारणत हमारे लिए कुंवारी या एक संत के नाम को निरूपित करता है जो हमारे लिए ईश्वर की कृपा प्राप्त करने में “सहायक” होता है। यदि हम जीवन में टूटने की स्थिति तक नहीं पहुंचें हैं, यदि हम अभी भी दृढ़ रहने में सक्षम हैं, यदि सब कुछ के बावजूद भरोसे के साथ आगे बढ़ते हैं, तो अपने गुणों के अधिक यह हमारे लिए शायद संतों की विचवई है जो स्वर्ग से हमारे लिए प्रार्थना करते हैं, वहीं कुछ हैं जो पृथ्वी पर सहयात्रियों की भांति हमारे साथ चलते हैं, जिन्होंने हमारी रक्षा की है और हमारे साथ चला है। क्योंकि हम सभी जानते हैं कि इस भूमि में पवित्र लोग, पवित्र नर और नारियाँ हैं जो पवित्रता में रहते हैं, वे इसे नहीं जानते हैं, न ही हम इसे जानते हैं, वे हमारे “दरवाजे के निकट” रहने वाले संतगण हैं, जो हमारे साथ रहते हैं, जो हमारे साथ काम करते और पवित्र जीवन जीते हैं।

संत पापा ने कहा कि धन्य है येसु ख्रीस्त, दुनिया के एकलौटे तारणहार, जो असंख्य संतों के सानिध्य में रहते, जो अपने जीवन और अपने कार्यों के द्वारा पृथ्वी को आबाद करते हैं, जिन्होंने अपने जीवन के द्वारा ईश्वर की प्रशंसा की है। संत बासिल इस तथ्य को सुदृढ़ करते हुए कहते हैं, “आत्मा वास्तव में संतों का निवास है क्योंकि वे स्वयं को ईश्वर के निवास स्थल स्वरूप प्रस्तुत करते हैं और उन्हें उनका मंदिर कहा जाता है।”

07 April 2021, 16:10