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ऊर में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं से मुलाकात करते संत पापा फ्राँसिस ऊर में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं से मुलाकात करते संत पापा फ्राँसिस  (ANSA)

अब्राहम से उत्पन्न धर्मों के अनुयायियों को शांति राह पर चलने हेतु पोप की अपील

संत पापा फ्राँसिस ने इराक में विश्वास के पिता अब्राहम के निवास स्थान ऊर में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं से मुलाकात की।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

ऊर, शनिवार, 6 मार्च 2021 (रेई)- संत पापा फ्राँसिस ने इराक में विश्वास के पिता अब्राहम के निवास स्थान ऊर में विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं से मुलाकात की।

संत पापा ने उन्हें सम्बोधित कर कहा, "प्यारे भाइयो एवं बहनो, यह आशीर्वाद प्राप्त जगह हमें अपने उद्गम के पास वापस लाता है, ईश्वर के कार्य स्रोत के पास, हमारे धर्मों के जन्म स्थान पर। यही वह स्थान है जहाँ हमारे पिता अब्राहम रहे, ऐसा लग रहा है कि हम घर लौट आये हैं। यहीं अब्राहम ने ईश्वर के बुलावे को सुना, यहीं से अपनी यात्रा शुरू की जिसने इतिहास को बदल दिया। हम उसी बुलाहट एवं उसी यात्रा के फल हैं। ईश्वर ने अब्राहम को अपनी नजर आकाश की ओर उठाने और तारों की गिनती करने को कहा। (उत्प.15.5) उन तारों में उन्होंने अपने वंशजों की प्रतिज्ञा, हम सभी को देखा। आज हम यहूदी, ख्रीस्तीय एवं मुस्लिम और हमारे दूसरे धर्मों के भाई बहनों के साथ हमारे पिता अब्राहम का सम्मान करते हैं उनकी तरह आकाश की ओर नजर डालते एवं पृथ्वी पर यात्रा करते हुए।"  

  

हम आकाश की ओर देखते हैं

हजारों साल बाद जब हम उसी आकाश को देखते हैं, तो वे ही तारे दिखाई पड़ते हैं। वे घोर अंधेरी रात में जगमगाते हैं क्योंकि वे एक साथ चमकते हैं। इस तरह आकाश एकता का संदेश देता है ˸ ऊपर से सर्वशक्तिमान हमें निमंत्रण देते हैं कि हम हमारे पड़ोसियों से कभी अलग न हों। ईश्वर की अन्यता हमें दूसरों की ओर, हमारे भाइयों एवं बहनों की ओर इंगित करती है। यदि हम भाईचारा की रक्षा करना चाहें तो हमें आकाश से नजर नहीं हटाना चाहिए। हम अब्राहम के वंशज और विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि, महसूस करते हैं कि सबसे बढ़कर हमारी भूमिका है, हमारे भाई बहनों की मदद करना कि वे अपनी नजरों एवं प्रार्थना को स्वर्ग की ओर उठा सकें। हमें इसकी जरूरत है क्योंकि हम आत्मनिर्भर नहीं है। हम सर्वशक्तिमान नहीं है हम इसे अपना नहीं बना सकते। यदि हम ईश्वर को दरकिनार करते हैं तो हम इस पृथ्वी की चीजों की पूजा करने लगेंगे। दुनियावी चीजें, जो कई लोगों को ईश्वर एवं पड़ोसियों से दूर ले जाती हैं ये पृथ्वी पर हमारी यात्रा के कारण नहीं हैं। हम आकाश की ओर नजर उठाते हैं ताकि हमारी महत्वाकांक्षा के गर्त से अपने आपको ऊपर उठा सकें। हम ईश्वर की सेवा करते हैं कि हम अपने अहम की गुलामी से मुक्त हो सकें क्योंकि ईश्वर हमें प्रेम करने को कहते हैं। यही सच्ची धार्मिकता है ˸ ईश्वर की पूजा करना एवं पड़ोसियों से प्रेम करना। आज के विश्व में जो अक्सर सर्वशक्तिमान को भूल जाता या विकृत चित्र प्रस्तुत करता है, विश्वासियों को निमंत्रित किया जाता है कि वे उनकी अच्छाई की गवाही दें, अपनी भाईचारा की भावना से उनके पितृत्व को प्रदर्शित करें।

ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप
ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप

सबसे बड़ी ईश निंदा

इस स्थान से, जहाँ विश्वास का जन्म हुआ, हमारे पिता अब्राहम की भूमि से, हम दावा करें कि ईश्वर करुणावान हैं और सबसे बड़ी ईश निंदा है अपने भाइयों एवं बहनों से घृणा कर उनके नाम को अपवित्र करना। शत्रुता, उग्रवाद और हिंसा धार्मिक हृदय से उत्पन्न नहीं होते, वे धर्म के विश्वासघाती हैं। हम विश्वासी चुप नहीं रह सकते जब आतंकवाद धर्म का दुरूपयोग कर रहे है, निश्चय ही, हम गलतफहमी को स्पष्ट रूप से दूर करने के लिए बुलाये गये हैं। आइये हम आकाश के प्रकाश को घृणा के बादल से धूमिल होने न दें। आतंकवाद, युद्ध और हिंसा के काले बादल इस देश के ऊपर जमा हो गये हैं। इन सभी जातीय एवं धार्मिक समुदायों ने कष्ट झेला है, खासकर, मैं यज़िदी समुदाय का जिक्र करना चाहूँगा जिसने कई लोगों की मौत पर शोक मनाया है और हजारों महिलाओं, पुरूषों और बच्चों के अपहरण, उन्हें बेचे जाने, शारीरिक प्रताड़ना और बलपूर्वक धर्मपरिवर्तन को देखा है। आज हम उन लोगों के लिए प्रार्थना करें जिन्होंने उन दुःखों को सहा है, अभी तक बिखरे हुए और अपहृत हैं ताकि वे जल्द ही घर लौट सकें। हम प्रार्थना करें कि अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म मानने की स्वतंत्रता को सभी ओर मान्यता एवं सम्मान दिया जाए, ये मौलिक अधिकार हैं क्योंकि वे हमें स्वर्ग जिसके लिए हमारी सृष्टि हुई है, उसपर चिंतन करने हेतु मुक्त करते हैं।

 आतंकवाद द्वार देश के उत्तरी भाग में हमला  

जब आतंकवाद ने प्यारे देश के उत्तरी भाग में हमला किया, इसका मकसद सिर्फ इसके भव्य धार्मिक विरासत को नष्ट करना था जिसमें गिरजाघर, मठ और विभिन्न समुदाय के पूजा स्थल शामिल हैं। उस अंधकार भरे समय में भी कुछ तारे चमक रहे थे। मैं मोसुल के युवा मुस्लिम स्वयंसेवकों की याद करता हूँ जिन्होंने गिरजाघरों एवं मठों की मरम्मत करने में मदद दी। घृणा के मलवे पर भाईचारा पूर्ण मित्रता का निर्माण किया और वे ख्रीस्तीय एवं मुस्लिम जो आज मस्जिदों एवं गिरजाघरों की बहाली एक साथ कर रहे हैं। प्रोफेसर अली थजील ने इस शहर में तीर्थयात्रियों के लौटने की बात कही। यह महत्वपूर्ण है कि पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा की जाए, क्योंकि यह स्वर्ग की इच्छुकता का पृथ्वी पर एक सबसे सुन्दर चिन्ह है। अतः पवित्र स्थलों के प्रति प्रेम और उनकी रक्षा अस्तित्वगत आवश्यकता है, हमारे पिता अब्राहम जिन्होंने  कई स्थलों पर आकाश की ओर प्रभु के लिए वेदी बनायी।  (उत्प 12:7.8; 13:18; 22:9)

महान कुलपति हमें अपने पवित्र स्थलों को सभी के लिए शांति और मुलाकात का मरूद्यान बनाने में मदद करें। ईश्वर के प्रति अपनी निष्ठा से अब्राहम सभी लोगों के लिए आशीर्वाद बन गये। आज यहाँ, उनके पदचिन्हों पर हमारी उपस्थिति, इराक, मध्यपूर्व एवं समस्त विश्व के लिए आशीर्वाद एवं आशा का चिन्ह बने। आकाश पृथ्वी के लिए थका नहीं है ˸ ईश्वर सभी लोगों को प्यार करते हैं, उनके सभी पुत्र और पुत्रियों को। हम आकाश की ओर निहारने से कभी न थकें, जिनको अपने समय में निहार कर पिता अब्राहम ने चिंतन किया था।

ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप
ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप

हम पृथ्वी पर यात्रा करें

अब्राहम के लिए आकाश की ओर देखना, एक व्याकुलता के बजाय, पृथ्वी पर यात्रा करने के लिए एक प्रोत्साहन था। उनका रास्ते पर चलना, अपने वंशजों के द्वारा हर युग और स्थान पर उन्हें आगे ले चलना है। सब कुछ की शुरूआत प्रभु द्वारा हुई जो उन्हें ऊर से आगे ले चले। (उत्प 15.7) उनकी यात्रा बाहर की ओर थी जिसमें बलिदान था। अब्राहम को अपनी भूमि अपना घर और परिवार छोड़ना था। फिर भी अपने परिवार को छोड़कर वे मानव परिवार के पिता बन गये। हमारे साथ कुछ इसी तरह होता है, हमारी यात्रा में हम अपने रिश्तों और असक्तियों को पीछे छोड़ने के लिए बुलाये जाते हैं ताकि हम अपने ही दलों में बंद रहकर, अपने को प्रभु के असीम प्रेम को ग्रहण करने एवं दूसरों को भाई एवं बहनों के रूप में देखने से वंचित न करें। हमें अपने आप से बहार निकलना है क्योंकि हमें एक-दूसरे की जरूरत है। महामारी ने हमें महसूस कराया है कि कोई भी अकेला बच नहीं सकता। (फ्रत्ल्ली तूत्ती 54) फिर भी दूसरों से पीछे हटने का प्रलोभन अनन्त है, हम जानते हैं कि हरेक व्यक्ति का "अपने आपके लिए" का विचार, 'सभी के लिए मुक्त' में परिवर्तित होगा, अन्यथा यह किसी भी महामारी से बदतर साबित होगा।(फ्रतेल्ली, 36)

तूफानों के बीच जिसको हम अभी अनुभव कर रहे हैं यह एकाकी हमें नहीं बचा सकता। न ही हथियारों की होड़ या दीवारों का निर्माण हमें बचा सकता है, यह सिर्फ अधिक दूर करेगा और आक्रमणकारी बनायेगा। न ही धन की पूजा बचायेगा, क्योंकि यह हमें अपने आप में बंद कर देता है तथा असमानता की खाई उत्पन्न करता है जो मानवता को निगल जाती है। न ही हम उपभोक्तावाद द्वारा बचाये जा सकते हैं जो मन को सुन्न और हृदय को मृत कर देता है।

शांति का रास्ता

हमारी यात्रा के लिए जो रास्ता आकाश इंगित करता है वह दूसरा है ˸ वह शांति का रास्ता है। वह मांग करता है, खासकर, तूफान के बीच कि हम मिलकर एक किनारे पंक्ति बनाये। यह शर्मनाक है कि जब हम सभी महामारी के संकट को झेल रहे हैं, विशेषकर, यहाँ, जहाँ संघर्ष ने बहुत अधिक पीड़ा लाई है, कोई भी सिर्फ अपनी चिंता करने में लग सकता है। बांटने और स्वीकार करने तथा न्याय जो कमजोर लोगों पर ध्यान देते हुए समानता और सभी का विकास सुनिश्चित करता, उनके बिना शांति नहीं आ सकती। जब तक लोग दूसरों की मदद के लिए अपना हाथ न बढ़ाये अमन चैन नहीं आ सकता। जब तक हम लोगों को हम के रूप में नहीं बल्कि दूसरों के रूप में देखेंगे, शांति नहीं होगी। जब तक हमारे गठबंधन दूसरों के खिलाफ हों, तब तक शांति स्थापित नहीं होगी, जबकि कुछ के गठबंधन दूसरों के लिए केवल विभाजन बढ़ाते हैं। शांति जीतने या हारने वालों की मांग नहीं करती बल्कि उन भाइयों एवं बहनों की मांग करती है जो अतीत के हर प्रकार की गलतफहमी एवं दर्द में, संघर्ष से एकता की ओर बढ़ते हैं। आइये, हम पूरे मध्यपूर्व में इसके लिए प्रार्थना करें। यहाँ मैं खासकर, पड़ोस के युद्धग्रस्त सीरिया की याद करता हूँ।     

हम कहाँ से शांति यात्रा की शुरूआत करें

कुलपति अब्राहम महान ईश्वर के एक नबी थे जो आज हमें एकता में एक साथ लाते हैं। प्राचीन भविष्यवाणी कहती है, “वे अपनी तलवार को पीट-पीटकर फाल और अपने भाले को हँसिया बनायेंगे” (इसा. 2.4)। यह भविष्यवाणी पूरी नहीं हुई है उसके विपरीत तलवार और भले मिसालें और बमों में परिणत हो गये हैं। हम कहाँ से शांति यात्रा की शुरूआत कर सकते हैं? अपने लिए यह निर्णय लेते हुए कि कोई भी हमारा शत्रु न हो। जो कोई साहस के साथ तारों की ओर देखते, ईश्वर में विश्वास करते, उसके लिए लड़ने हेतु कोई शत्रु नहीं होते। उसे केवल एक ही शत्रु का सामना करना होता है जो उसके द्वार के सामने खड़ा होकर अंदर प्रवेश करने हेतु उसे दस्तक देता है। वह शत्रु घृणा है। कुछ लोग हैं जो मित्रों की अपेक्षा अपने लिए शत्रुओं की चाह अधिक रखते हैं वहीं कई लोग हैं जो दूसरों की हानि पर अपने लिए लाभ कमाने की आशा करते हैं। वे जो प्रतिज्ञा के तारों की ओर निगाहें फेरते, वे जो ईश्वर की राहों पर चलते हैं, किसी के विरोधी नहीं हो सकते बल्कि वे सबों के लिए होते हैं। वे किसी तरह का दबाव, सतावट और शक्ति का दुरूपयोग नहीं करते, वे युद्ध की दशा में नहीं रह सकते हैं।

ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप
ऊर में धार्मिक नेताओं के साथ पोप

हमारा कर्तव्य

प्रिय मित्रो, क्या यह संभव है? कुलपति अब्राहम जो आशाओं के परे भी आशा में बने रहे (रोमि. 4.18) हमें इसके लिए प्रेरित करते हैं। अपने जीवन के पूरे इतिहास में हमने दुनियावी और सिर्फ अपने ही लक्ष्यों की प्राप्ति की चाह रखी है लेकिन ईश्वर की सहायता से हम अपने में बेहतरी हेतु परिवर्तन ला सकते हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है, आज मानवता में, खास कर हम सभी धर्मों के विश्वासियों में इस बात की मांग की जाती है कि हम घृणा का परित्याग कर अपने को शांति के साधन बनायें। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम देश के नेताओं से दृढ़तापूर्वक इस बात की आपील करें कि वे हथियारों में बढ़ोत्तरी के बदले सभी के लिए भोजन का वितरण करें। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम दोषारोपण की स्थिति में कैसे शांत बने रहते हैं जिससे दुनिया के प्रताड़ितों और परित्यक्तों की पुकार सुनाई दे सकेः जहाँ असंख्य लोगों के लिए भोजन का अभाव है, स्वास्थ्य, शिक्षा, अधिकारों और मानव सम्मान की कमी है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि क्या हम युद्धाभ्यास के दावपेंच को प्रकाशित करें जो धन के लुटेरों पर केन्द्रित है जो कुछेक लोगों को विलासिता की सुविधा प्रदान करता है या हमारे समान्य निवास स्थल को नष्ट होने से बचायें। यह हमारे ऊपर है कि हम दुनिया को इस बात की याद दिलाये कि मानव जीवन का मूल्य अपने में है न कि जीवन में चीजों को हासिल करने में। अजन्में, बुजुर्गों, अप्रवासियों तथा नर और नारियों का जीवन चाहें वे किसी भी रंग-रुप और किसी भी देश के क्यों न हों अपने में सदैव मूल्यवान हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम साहस में किस तरह अपनी आंखें ऊपर उठाते हुए तारों को देखते हैं जिसे कुलपति अब्राहम ने प्रतिज्ञा के तारों स्वरुप देखा।

अब्राहम की यात्रा शांति की आशीष

अब्राहम की यात्रा शांति की एक आशीष थी। यद्यपि यह अपने में सहज नहीं थी उन्हें अपने में संघर्षों और अपरिचित घटनाओं का सामना करना पड़ा। हमारी यात्रा भी अपने में ऊबड़-खाबड़ है लेकिन महान कुलपति की तरह हमें अपने में ठोस कदमों को लेने की आवश्यकता है, जिससे हम बाहर निकलते हुए दूसरों के चेहरों को देख सकें, अपनी यादों को बांट सकें, अवलोकन करते हुए मौन रह सकें, इतिहास और अनुभवों से रुबरु हो सकें। संत पापा ने दाऊद और हसन दो युवाओं, एक ख्रीस्तीय औऱ दूसरा मुस्लिम के साक्ष्यों से प्रभावित अपने मनोभावों को साझा करते हुए कहा कि कैसे अंतरों से भयभीत हुए बिना, वे दोनों एक साथ अध्ययन और कार्य करते हैं। वे एक-दूसरे से मिलकर अपने भविष्य का निर्माण करते हुए अपने को सहोदर की तरह पाते हैं। आगे बढ़ने हेतु हमें एक साथ मिलकर कुछ अच्छा और ठोस करने की जरुरत है। यह विशेषकर, युवाओं के लिए एक मार्ग हो जहाँ वे अपने सपनों को अतीत के युद्धों के कारण छोटा होता हुआ न देखें। उन्हें भ्रातृत्व का पाठ पढ़ाने, तारों की ओर देखने की शिक्षा देने की नितांत आवश्यकता है, यह एक सच्ची आपातकालीन स्थिति है यह भविष्य में शांति हेतु एक प्रभावकारी वैक्सीन का कार्य करेगा। संत पापा ने युवाओं से कहा युवाओं आप ही वर्तमान और भविष्य हैं।

केवल दूसरों के साथ हमारे अतीत के घावों की चंगाई

केवल दूसरों के साथ हमारे अतीत के घावों की चंगाई होती है। कितने ही लोग यहाँ दुनिया की उदासीनता और खामोशी के मध्य भी अपने को भ्रातृत्व की यात्रा करता हुआ पाते हैं। राफा ने हमें युद्ध के कारण अवर्णनीय दुःखों के बारे में बतलाया जिसके कारण बहुतों को अपने बच्चों के खातिर अपने देश और घरों से दूसरे स्थानों में पलायन करने हेतु बाध्य होना पड़ता। संत पापा ने राफा की सहशीलता और सुदृढ़ता हेतु उनका धन्यावाद अदा किया जिसने परेशानियों के बावजूद अपने जमीर में ड़टे रहने का प्रण किया। बहुतों को अपने घर छोड़ने हेतु बाध्य होना पड़ा, संत पापा ने कहा कि आप अपने घरों को लौटने का अवसर खोजें और अपने को अपने लोगों से संयुक्त करें।

अतिथ्य सत्कार के कारण, जो इस भूमि की एक खाशियत है, ईश्वर अब्राहम के यहाँ मेहमान बन कर आये और उसे एक पुत्र स्वरुप उपहार प्राप्त हुआ, उस स्थिति में भी जो आशा से परे जान पड़ता था (उत्पि.18.1-10)। विभिन्न धर्मों के भाइयो एवं बहनों, हम यहाँ अपने लिए एक निवास स्थल पाते हैं और यहाँ से हम एक साथ मिलकर ईश्वर के सपनों को पूरा करने हेतु निष्ठा में संलग्न होते हैं, जिससे मानव परिवार ईश्वर की संतानों के लिए एक आतिथ्य स्थल बने, जहाँ हम स्वर्ग की ओर अपनी निगाहें फेरते हुए, इस धरती पर शांति से अपनी यात्रा कर सकें।

      

    

      

 

06 March 2021, 15:48