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संत पापा फ्रांसिस संत पापा फ्रांसिस  (ANSA)

संत पापाः प्रार्थना तृत्वमय ईश्वर से मिलन

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में प्रार्थना को तृत्वमय ईश्वर से मिलन कहा।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो सुप्रभात।

वाटिकन सिटी, बुधवार, 03 मार्च 2021 (रेई) प्रार्थना पर अपनी धर्मशिक्षा माला की यात्रा में हम आज और आने वाला सप्ताह इस बात पर गौर करेंगे की प्रार्थना येसु में, हमें कैसे तृत्वमय ईश्वर, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा ईश्वर हेतु खोलता है, जो प्रेम के अथाह सागर हैं। ये येसु ख्रीस्त हैं जो हमारे लिए स्वर्ग को खोलते और ईश्वर के संग एक संबंध स्थापित करने में हमारी मदद करते हैं। सुसमाचार लेखक प्रेरित योहन अपने सुसमाचार की प्रस्तावना के अंत में इस बात पर बल देते हैं, “किसी ने ईश्वर को नहीं देखा है, पिता की गोद में रहने वाले एकलौते, पुत्र ने उसे प्रकट किया है” (यो.1.18)। हम वास्तव में नहीं जानते कि प्रार्थना कैसी करनी चाहिए, कौन से शब्द, अनुभव और भाषा हमारे द्वारा ईश्वर के लिए उचित होंगे। इस याचना में हम शिष्यों को अपने गुरू से प्रार्थना करने हेतु सीखलाने की बात सुनते हैं, जिसे हमने कई बार धर्मशिक्षा के दौरान दुहराया है, जिसमें हम मानवीय लड़खड़ाहट, निरंतर प्रयास, बहुत बार असफलता को पाते हैं जहाँ हम सृष्टिकर्ता से निवेदन करते हैं,“प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखलाईये” (लूका. 11.1)।

ईश्वर हाथ देखते हैं

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि सभी प्रार्थना अपने में एक समान नहीं है और न ही सभी अपने में सहज है। सुसमाचार स्वयं उन प्रार्थनाओं के नकारात्मक प्रतिफल का साक्ष्य देता है जो अस्वीकार कर दिये जाते हैं। शायद कभी-कभी ईश्वर हमारी प्रार्थना से संतुष्ट नहीं होते और हमें उसका एहसास भी नहीं होता है। ईश्वर प्रार्थना करने वालों की हाथों को देखते हैं, वे उन्हें साफ करना चाहते हैं केवल धोते हुए नहीं अपितु वे चाहते हैं कि हम अपने को बुरे कार्यों से बचाये रखें। आस्सीसी के संत फ्रांसिस प्रार्थना करते हुए कहते हैं, “कोई भी मनुष्य तेरे नाम को घोषित करने के योग्य नहीं है”( सूर्य के गीत)।

शतपति, हमारी प्रार्थना के व्यक्तकर्ता

संत पापा कहते हैं कि लेकिन हमारी प्रार्थना की दरिद्रता रोमी शतपति के होठों से अभिव्यक्त होती है जो अपने बीमार सेवक की चंगाई हेतु येसु से निवेदन करता है (मत्ती.8.5-13)। वह अपने को एकदम अयोग्य समझता है, वह यहूदी नहीं अपितु एक सैन्य अधिकारी था। लेकिन उसे अपने सेवा की चिंता होती है वह कहता है,“प्रभु मैं इस योग्य नहीं हूँ कि आप मेरे घर आयें लेकिन केवल एक ही शब्द कह दीजिए और मेरा सेवक चंगा हो जायेगा”(8)। इस प्रार्थना को हम अपने प्रतिदिन के यूख्ररिस्तीय धर्मविधि में दुहराते हैं। ईश्वर के साथ वार्ता करना एक कृपा है हम इसके योग्य नहीं हैं, हमें इसका कोई अधिकार नहीं है, हम अपने हर शब्द और विचार में “लगड़ा” जाते हैं...। लेकिन येसु ख्रीस्त एक द्वार हैं जो अपने को खोलते हैं।

धर्मग्रंथ में वार्ताओं का रुप

मानवता जाति को ईश्वर क्यों प्रेम करते हैं इसका कोई विशेष कारण नहीं है, इसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती है... यहाँ तक की बहुत से पौराणिक कथाएं इसकी संभावनाओं पर चिंतन नहीं करते हैं कि क्यों ईश्वर मानव जाति की चिंता करते हैं। इसके विपरीत हम मानव को बेफ्रिक और परेशान करने वालों के रुप में पाते हैं जो पूरी तरह चिंताहीन है। हम अपने लोगों के बीच ईश्वर की निकटता के बारे में सोचें जो विधि-विवरण ग्रंथ में व्यक्त किया गया है,“कौन ईश्वर अपने लोगों के करीब हैं, जितना मैं तुम्हारे करीब हूँ।” ईश्वर की यह निकटता हमारे लिए रहस्योउद्भेदन है। कुछ दर्शनशस्त्री कहते हैं कि ईश्वर केवल अपने बारे में सोच सकते हैं। केवल हम मानव ईश्वर को विश्वास दिलाने की कोशिश करते और उनकी निगाहों में अच्छा होने का प्रयास करते हैं। अतः “धर्म” का कार्य, बलिदान की यात्रा और चढ़ावे के थाल की बारंबारता द्वारा चुपचाप और उदासीन रहने वाले ईश्वर को रिझाने का प्रयास है। यहाँ हम वार्ता को नहीं पाते हैं। केवल येसु में, केवल रहस्य के उद्भेदन में ईश्वर को हम मूसा और येसु में अभिव्यक्त पाते हैं। हम धर्मग्रंथ बाईबल में ईश्वर को मानव के साथ वार्ता करते हुए पाते हैं।  

ईश्वर का स्वभाव

संत पापा ने कहा कि ईश्वर मानवता से प्रेम करते हैं। हमें उनपर विश्वास करने का साहस नहीं होता यदि हमने येसु को नहीं जाना होता। येसु का ज्ञान हमें इस रहस्य को प्रकट करता है। हम इसे उस बदनाम दृष्टांत के रुप में पाते हैं जो करूणामय पिता का जिक्र करता या उस चरवाहे में जो अपनी खोई हुई भेड़ की खोज में जाता है (लूका. 15)। हम इन कहानियों को नहीं जान पाते और न ही उन्हें समझ पाते यदि हमारी मुलाकात येसु से नहीं हुई होती। वह किस तरह का ईश्वर है जो अपने लोगों के लिए मर जाता हैॽ वह किस तरह का ईश्वर है जो अपने लोगों से सदा धैर्य में बने रहते हुए, प्रेम की मांग किये बिना प्रेम करता हैॽ वह कैसा ईश्वर है जो पुत्र की कृतघ्नता स्वीकारता जो अपनी संपत्ति का हिस्सा मांग घर से दूर चला जाता औऱ अपनी सारी संपत्ति फिजूल खर्ची में उड़ा देता है (लूका. 15.12-13)ॽ

ईश्वर के गुण

यह येसु हैं जो हमारे लिए पिता के हृदय को व्यक्त करते हैं। अपने जीवन के द्वारा वे हमें ईश्वर पिता के बारे बललाते हैं। उनके समान कोई भी दूसरा पिता नहीं है। एक पितृत्व जिसमें हम निकटता, करूणा और कोमलता को पाते हैं। संत पापा ने कहा कि हम इन तीन शब्दों, निकटता, करूणा और कोमलता को न भूलें। इसके द्वारा पिता अपने पितृत्व को हमारे संग साझा करते हैं। दूर से हमारे लिए तृत्वमय प्रेम को अनुभव करना कठिन है जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा ईश्वर में हमारे लिए प्रकट होता है। पूर्वी रीति में यह हमारे लिए एक रहस्यमय चित्रण में व्यक्त किया जाता है जहाँ हम आनंद में विश्व की उत्पत्ति को पाते हैं।

उससे भी बढ़कर यह हमारे विश्वास के परे है कि उस दिव्य प्रेम का प्रचार मानव के बीच भी होता है- हम उस प्रेम को इस धरती में प्राप्त करते हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है। काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा इसके बारे में कहती है,“येसु की दिव्य मानवता अतः पवित्र आत्मा की शिक्षा में है जो हमें पिता से प्रार्थना करना सीखलाते हैं (2664)। यह हमारे लिए विश्वास का वरदान है। येसु की मानवता से उत्तम अपने लिए हम और किसी आशा को नहीं पा सकते हैं- जहाँ ईश्वर अपने को येसु में हमारे निकट लाते हैं- वे अपने को तृत्वमय ईश्वर स्वरुप व्यक्त करते हैं। हम पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा ईश्वर के द्वार को अपने लिए बृहृद रुप में खुला पाते हैं।

03 March 2021, 14:59