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मोसुल में मलवे के ढेर के सामने मुस्कुराती छोटी बच्ची सेना के जवान के साथ मोसुल में मलवे के ढेर के सामने मुस्कुराती छोटी बच्ची सेना के जवान के साथ  (Fotografico Vatican Media)

इराक की उम्मीद छोटी बच्ची की मुस्कान में

संत पापा फ्राँसिस ने युद्ध से क्षतिग्रस्त इराक की भूमि में एक नई ज्योति जलायी है और दुनिया को एक ऐसे देश की शांति एवं भाईचारे की प्यास को दिखायी है जो फिर शुरू करना चाहता है।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

इराक, मंगलवार, 16 मार्च 2021 (रेई)- "हमारे लिए यह एक बुरे सपने से उठने के समान था, हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि देश फिर से अपने पैरों पर सचमुच खड़ा हो सकता है।" यह साधारण वाक्य इराक के सभी लोगों की आशा को संक्षेप में बयां करता है जिन्होंने 5 से 8 मार्च तक, संत पापा फ्रांसिस का स्वागत किया। इस यात्रा की तस्वीर मोसुल में एक स्नैपशॉट में कैद हुई है जो तथाकथित इस्लामिक स्टेट की राजधानी थी जहाँ हज़ारों बुलेट के छेद से मलबे भरे हैं। जहाँ गिरजाघर, इमारतें, मस्जिद ध्वस्त और खंडहर हो चुके हैं, युद्ध की हिंसा एवं व्यक्ति के क्रोध को दिखाता है जिसने अपने भाई को रौंदा, क्षतिग्रस्त किया एवं मिटा दिया।

उस पृष्टभूमि पर जहाँ दहशत प्रबल होती दिखाई दे रही है, बच्चों ने जैतून की डालियाँ लिये गाते हुए संत पापा का स्वागत किया। दूसरे बच्चे वहाँ से कुछ दूरी पर धूल धूसरित सड़क पर खेल रहे थे। वहाँ साथियों के दल से अलग चार या पाँच साल की, गुलाबी रंग की ड्रेस पहनी एक छोटी बच्ची पीछे हटने लगी। अनजाने ही वह एक सैनिक के पाँव के पास आ पहुँची। उसने नजर उठाकर सैनिक को ऊपर से नीचे देखा।   

मोसुल में काथलिक बच्चे हाथ में झंडा लिए संत पापा फ्रांसिस का स्वागत करते हुए
मोसुल में काथलिक बच्चे हाथ में झंडा लिए संत पापा फ्रांसिस का स्वागत करते हुए

सिपाही - अपनी कमर पर विस्फोटक, हेलमेट, खुद को सूरज से बचाने के लिए चश्मा के साथ - अपनी गर्दन झुकाया और छोटी लड़की की नजर में नजर मिलाया, शरीर के बाकी हिस्सों की तरह बच्ची का चेहरा भी धूल से गंदा हो गया था। उनके पीछे मलवे के ढेर पड़े थे जो पहले मकान हुआ करते थे। काले चस्मे के बावजूद उनकी नजरें एक दूसरे से मिलती हैं। सैनिक बच्ची को अपने हाथों से पकड़कर ऊपर उठाता है। बच्ची खुशी से मुस्कुराती है इस पर सैनिक भी मुस्कुराता है। इस तस्वीर में हम पूरे इराक के वर्तमान एवं भविष्य को देख सकते हैं।

यह संत पापा फ्रांसिस के लिए एक यादगार यात्रा रही। वे पहले पोप रहे जिन्होंने अब्राहम की भूमि इराक की प्रेरितिक यात्रा की। उन्होंने ख्रीस्तीय समुदाय के विश्वास को सुदृढ़ किया एवं उन्हें प्रोत्साहन दिया जिन्होंने मुसलमानों एवं अल्पसंख्यकों जैसे यजिदियों के साथ अकथनीय दुःख झेला। यह एक ऐतिहासिक यात्रा थी, अबू धाबी में सुन्नियों के संबंध में किए गए प्रयासों के बाद, शियाओं के साथ खाई को पाटने का प्रयास था। यह उनके द्वारा स्वागत किये जाने के कारण भी ऐतिहासिक थी। किन्तु सबसे बढ़कर यह इसलिए ऐतिहासिक थी कि संत पापा ने आईएसआईएस द्वारा युद्ध, हिंसा और अत्याचार से ध्वस्त एवं अब कोविड-19 महामारी और गरीबी के संकटों से त्रस्त स्थान पर अच्छाई और मुक्ति का दीया जलाया।       

इराक की यात्रा करनेवालों के लिए सबसे अधिक प्रभावित करनेवाली बात थी सैन्यीकरण। हर जगह पुलिस युद्द सामग्रियों, बूलेटप्रूफ कपड़े, बारूद से भरे बेल्ट, हेलमेट और भारी हथियार के साथ हर जगह तैनात थी। बगदाद में, नासिर्या, उर, मोसुल, क़ारकोश, एरबिल, सभी जगह वाटिकन के पीले और सफेद झंडे दीवारों पर लगे हुए थे।

2020 में इराक में करीब 1400 आतंकी हमले हुए। वहाँ अभी रोजगार मिलना मुश्किल है और आर्थिक समस्या एक बड़ी चुनौती है किन्तु देश में केवल यही सच्चाई नहीं है। जो लोग दूसरों की मदद करते और बांटने तथा पुनःनिर्माण हेतु प्रतिबद्ध हैं उनके पास उन समस्याओं को देखते रहने का वक्त नहीं है।   

संत पापा की यात्रा ने देश में एक अलग प्रकाश बिखेरा है और दशकों में पहली बार, इराक स्वागत, समृद्धि और भविष्य की बात करने लगा है। ख्रीस्तियों और मुसलमानों ने संत पापा को न केवल अपना दुखड़ा सुनाया बल्कि अपने विश्वास, अपनी शक्ति, दृढ़ता, अपने पैरों पर खड़ी होनेवाली भूमि, प्राचीन सभ्यता का पलना तथा एक शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के स्थान के रूप में भी प्रस्तुत किया। वहां के प्रत्येक व्यक्ति ने एक बुद्धिजीवी व्यक्ति के "महान शब्दों" को सुना।  

ख्रीस्तियों ने अपने आपको संत पेत्रुस के उत्तराधिकारी के साथ प्रार्थना करते एवं पूरी दुनिया के लिए प्रकाश बनते हुए पाया। वे सच्चाई पर स्थापित, अकथनीय पीड़ा सहने वाले, घृणा से बाहर निकलने की कोशिश करनेवाले लोग हैं जो आतंक एवं चरमपंथ को स्वीकार नहीं करेंगे। काले एवं घातक रंगों के साथ आदी तस्वीरों में संत पापा ने एक नया रंग भरा।    

मोसुल में शांति के प्रतीक कबूतर उड़ाते संत पापा फ्राँसिस
मोसुल में शांति के प्रतीक कबूतर उड़ाते संत पापा फ्राँसिस

संत पापा फ्रांसिस ने इराक में शरीदों की याद की एवं हर प्रकार के चरमपंथ की निंदा की। उन्होंने ख्रीस्तीय समुदाय एवं उन सभी लोगों का आलिंगन किया जिन्होंने दुःख सहा है और अब भी सह रहे हैं। महामारी के बावजूद सभी परिवार घेरे के पीछे एकत्रित हुए ताकि वे शांति के सेवक को देख सकें, कम से कम एक झलक, जो दूर से आये थे। खलदेइयों के ऊर, जहाँ अंतरधार्मिक सभा का आयोजन किया गया था, मरूभूमि की हवा एक सुरक्षा जाल से होकर बह रही थी। यहीं परम्परा के अनुसार अब्राहम का घर था। संत पापा ने उसे पृथ्वी पर यात्रा करने, मुलाकात, वार्ता एवं शांति का रास्ता तैयार करनेवाला परिसर कहा।

सभा में उपस्थित लोगों ने उसे "असाधारण, अकल्पनीय मुलाकात" कहा एवं विभिन्न भाषाओं में ईश्वर को धन्यवाद दिया। ख्रीस्तीय बहुल प्रांत काराकोश में ख्रीस्तीय समुदाय के आनन्द एवं उत्साह को भूलाया नहीं जा सकता। संत पापा ने उनके घावों और विश्वास के साक्ष्यों को सुना जिन्होंने अपने बच्चों, पत्नी, भाई को आईएसआईएस द्वारा मार डाले जाते हुए देखा है। उन्होंने हत्यारों के लिए माफी की अपील की। युवा और बुजूर्ग सभी के चेहरे पर, आँसू बह गए जब पोप ने कहा, "आप अकेले नहीं हैं।"

इरबिल, कुर्दिस्तान के बड़े स्टेडियम में संत पापा ने इराक के लिए आशा की कामना की, जहां बहुत सारे इराकियों और सीरियाई लोगों को शरण मिली। देश के विभिन्न हिस्सों से 10,000 से अधिक लोगों ने संत पापा फ्रांसिस के साथ प्रार्थना की तथा अपने हृदय में नई आशा जगायी कि एक अलग इराक संभव है।  

17 March 2021, 15:41