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इराक के मोसुल में संत पापा फांसिस इराक के मोसुल में संत पापा फांसिस  (Vatican Media)

आमदर्शन समारोह : भाईचारा इराक एवं विश्व के लिए एक चुनौती

आमदर्शन समारोह में बुधवार को संत पापा फ्राँसिस ने इराक की प्रेरितिक यात्रा पुनः अवलोकन किया तथा इस बात पर प्रकाश डाला कि अपनी यात्रा में उन्होंने इराकी लोगों में प्रायश्चित की भावना एवं ख्रीस्त के संदेश का स्वागत करने की खुशी को महसूस किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 10 मार्च 2021 (रेई)- संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभी का अभिवादन करते हुआ कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

कृतज्ञता

विगत कुछ दिनों पहले ईश्वर ने मुझे इराक की प्रेरितिक यात्रा करते हुए संत पापा योहन पौलुस द्वितीय की एक योजना को पूरा करने में मदद की। इसके पहले किसी संत पापा ने कुलपति अब्राहम के देश की यात्रा नहीं की थी। यह ईश्वर की योजना थी कि युद्धों और आंतकवाद के बाद, कोविड-19 की घोर महामारी के समय, आशा की एक निशानी के रूप में यह प्रेरितिक यात्रा सम्पन्न हो।

संत पापा ने कहा कि इस यात्रा के उपरांत मैं अपने हृदय को- ईश्वर के प्रति और उनके प्रति जिन्होंने इस तीर्थयात्रा को सफल बनाने में मदद की, कृतज्ञता के भाव से ओतप्रोत पाता हूँ। उन्होंने इराक के राष्ट्रपति और सरकार, देश के प्राधिधर्माध्यक्षों और धर्माध्यक्षों, देश के मंत्रियों और कलीसिया के विश्वासियों, धार्मिक संस्थानों के अधिकारियों, खासकर, ग्रैंड अयातुल्लाह अल-सिस्तानी के प्रति जिनके साथ नजाफ में उनकी एक चिरस्मरणीय वार्ता हुई, अभार व्यक्त किये।

अत्याचार के बावजूद आशा की कलीसिया

इस यात्रा में मैंने पश्चातापी मनोभाव का गहराई से अनुभव किया। मैं उन लोगों के करीब अपने को नहीं ले जा सका जो प्रताड़ना के शिकार हुए, उस शहादत कलीसियाई समुदाय के निकट जो वर्षों से अपने में भारी क्रूस को वहन करने का अनुभव करते हैं, उस भारी क्रूस की भांति जो काराकोश के प्रवेश द्वार पर अंकित है। इस बात की अनूभूति मुझे तब और अधिक से हुई जब मैंने हिंसा, प्रताड़ना और निर्वासन में बचे हुए लोगों से मुलाकात करते हुए उनके साक्ष्यों को सुना एवं विध्वंस के उनके घावों को देखा। इन सारी चीजों के मध्य मैंने अपने चारों ओर ख्रीस्त के संदेश के स्वागत में खुशी को देखा। संत पापा ने कहा कि मैंने आशा में शांति और भ्रातृत्व हेतु खुली एक क्षितिज का दीदार किया जो कि येसु ख्रीस्त के वचनों में संक्षेपित है, जो इस यात्रा के आदर्शवाक्य थे “हम सभी भाई-बहने हैं” (मत्ती.23.8)। मैंने इस आशा को गंणतत्र देश के राष्ट्रपति के संग वार्ता में अनुभव किया। इसकी अनुभूति मुझे लोगों के अभिवादनों और साक्ष्यों में, गीतों और लोगों के हावभाव में देखने को मिले। मैंने इसे युवाओं के चमकते मुखमण्डलों और बुजूर्गों की जीवंत आँखें में देखा। उन्होंने कहा कि लोग पांच घण्टें खड़े होकर संत पापा का इंतजार कर रहे थे, महिलाएं गोद पर बच्चों को पकड़ी प्रतीक्षा में थीं, उनके आंखों में आशा थी।

युद्ध से शांति नष्ट 

इराकवासियों को शांति में रहने का अधिकार है, उन्हें अपने आत्मसम्मान को पाने का अधिकार है। उनकी धार्मिक और संस्कृति जड़ें हजारों साल पीछे, मेसोपोटामिया सभ्यता के उद्गम स्थल में हैं। ऐतिहासिक रूप में बगदाद एक अति महत्वपूर्ण शहर है। शताब्दियों से वहां विश्व का सबसे समृद्ध पुस्तकालय था। लेकिन युद्ध ने उसका नमोनिशान मिटा दिया। युद्ध हमेशा रक्षस की तरह है जो समय के साथ बदलता और मानवता को निगल जाता है। संत पापा ने अपने हृदय की भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा कि मैं अपने में पूछता हूँ कि कौन हथियार बिक्री करता है? आज कौन आतंकवादियों को हथियार बेच कर रहा है जो विभिन्न स्थानों पर नरसंहार करते हैं, उदहारण के लिए हम अफ्रीका के बारे में सोचें। इसका मुझे कोई जबाव दे? उन्होंने कहा कि लेकिन युद्ध का प्रत्युत्तर युद्ध नहीं, हथियारों का जबाव हथियारों नहीं है। इसका उत्तर भ्रातृत्व है। यह केवल इराक की चुनौती नहीं है। यह पूरे विश्व की चुनौती है जहाँ हम बहुत से स्थानों में युद्ध को पाते हैं। क्या हम अपने बीच भ्रातृत्व की भावना उत्पन्न कर सकेंगे, जिससे विश्व बंधुत्व की संस्कृति उत्पन्न हो? या हम काईन के तर्क के अनुसार युद्ध को जारी रखेंगे?

हम सभी भाई-बहनें हैं

संत पापा फ्रांसिस की इराक यात्रा का वितांत जारी रखते हुए कहा कि हम ख्रीस्तीय और मुस्लिम प्रतिनिधियों की मुलाकात ऊर में हुई जहाँ कुलपति अब्राहम को चार हजार साल पहले ईश्वर का निमंत्रण मिला था। वे हमारे विश्वास के पिता हैं जिन्होंने ईश्वर की पुकार सुनी जिन्हें एक संतति की प्रतिज्ञा की गई। वे सब कुछ छोड़ कर निकल पड़ते हैं। ईश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं के प्रति ईमानदार बने रहते हैं वे शांति स्थापना हेतु हमें दिशा-निर्देश देते हैं। ईश्वर उनके साथ चलते हैं जो अपनी निगाहों को आकाश की ओर उठाते और आगे बढ़ते हैं। ऊर में चमकीले आसमान के नीचे जिसकी ओर अब्राहम ने अपनी निगाहें फेरी, उनकी संतानों के रुप में हमने अपने बीच में इस बात को पुनः ध्वनित होते पाया कि हम सभी आपस में भाई-बहनें हैं।

भ्रातृत्व का संदेश हमारे लिए बगदाद के सिरो-काथलिक महागिरजाघर में कलीसियाई मिलन स्वरुप आया जहाँ मिस्सा बलिदान के दौरान 48 लोगों के अलावे दो पुरोहित शहीद हुए थे। इराक की कलीसिया लोहू-गवाह कलीसिया है और कलीसिया की पत्थरों में शहीदों की खुशी को हमने अपने मिलन में गूंजित होते पाया।

भ्रातृत्व का संदेश

तिगरीस नदी के किनारे, मोसूल और काराकोश में, निनवे के प्राचीन खंडरों में हमने भ्रातृत्व से संदेश को अर्पित किया। आईएसआईएस की कार्यवाही ने हजारों-हजार की संख्या में वहां के निवासियों को विस्थापित किया है जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं, खासकर, ख्रीस्तीय यजिदी समुदाय के लोग। उस शहर की पुरानी पहचान नष्ट हो गई है जिन्हें पुनस्थापित किया जा रहा है। मुस्लिम समुदाय के लोग ख्रीस्तियों को वापस लौटने का निमंत्रण दे रहे हैं और गिरजाघरों और मस्जिदों को नवीकृत किया जा रहा है। संत पापा ने कहा कि हम उन भाई-बहनों के लिए प्रार्थना करें कि वे अपने जीवन की शुरूआत पुनः करने की शक्ति प्राप्त कर सकें। इराकवासियों के बारे में सोचते हुए जो अपने देश से पलायन कर चुके हैं मैं उनसे कहना चाहूँगा कि आप अब्राहम की तरह अपना सब कुछ छोड़ चुके हैं उनकी तरह ही अपने विश्वास और आशा में आप बने रहें। आप जहाँ कहीं भी हों और जैसे भी हों मित्रता और भ्रातृत्व के शिल्पकार बनें।

अब्राहम की आशा 

संत पापा ने कहा कि भ्रातृत्व के संदेश हमारे लिए दो यूखारिस्तीय बलिदान में आये जिसे हमने बगदाद में खलदेई रीति और इरबिल में अर्पित किया। अब्राहम की आशा हम उनके पूर्वजों के लिए ख्रीस्तयाग के रहस्य में पूरी हुई जहाँ पिता ने अपने प्रेम के कारण अपने एकलौटे पुत्र को भी हमारे लिए बलि अर्पित कर दिया, जिससे सभी को मुक्ति मिल सकें। पुत्र अपनी मुत्य और पुनरूत्थान के द्वारा हमारे लिए प्रतिज्ञा देश में प्रवेश करने हेतु मार्ग खोलते हैं, जहाँ हम नये जीवन को प्राप्त करते जहाँ हमारी आंसूओं को पोंछा जाता, हमारे घावों की चंगाई होती और भाई-बहनों के रुप में हमारा मिलन होता है।

खजूर पेड़ से शिक्षा

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि हम एक साथ मिलकर इस ऐतिहासिक यात्रा हेतु ईश्वर का धन्यवाद करें और मध्यपूर्वी देशों के लिए प्रार्थना करना जारी रखें। इराक में विध्वंसात्मक हथियारों की गरज के बावजूद वहाँ के खजूर पेड़ जो देश के लिए आशा की निशानी है सदैव बढ़ते और फल देते हैं। भ्रातृत्व की भावना के साथ भी ऐसा ही होता है, इसमें हम शोरगुल को नहीं पाते लेकिन यह हमें विकसित करता और फलदायक बनता है। ईश्वर जो शांति के स्रोत हैं, इराक को, मध्यपूर्वी क्षेत्र को और सारी दुनिया के भविष्य को भ्रातृत्वमय बनायें।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने इराक की अपनी प्रेरितिक यात्रा का वृतांत समाप्त किया और “हे पिता हमारे पिता” प्रार्थना का पाठ करते हुए सबों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

10 March 2021, 13:57