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Pope Francis visits Iraq Pope Francis visits Iraq 

संत पापाः साक्ष्य द्वारा ईश्वरीय कार्यों के साधन बनें

संत पापा फ्रांसिस ने इराक की अपनी प्रेरितिक यात्रा के दूसरे दिन बगदाद के संत जोसेफ के खाल्देई महागिरजाघर में पवित्र मिस्सा बलिदान अर्पित किया। अपने मिस्सा प्रवचन में उन्होंने विवेक, साक्ष्य और प्रतिज्ञाओं पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

बगदाद, शनिवार, 06 मार्च 2021 (रई) संत पापा ने कहा कि विवेक इन प्रातों में अतीत की ऊपज है। सचमुच में विवेक की चाह ने नर और नारी को सदा ही आकर्षित किया है। यद्यपि बहुत बार वे जिनके पास अधिक साधन हैं अपने में अवसर उत्पन्न करते हुए अधिक ज्ञान हासिल करते हैं, वहीं साधनों की कमी में दूसरे अपने को दरनिकार पाते हैं। ऐसी असमानता का हाल के दिनों में इजाफा हुआ है जो अपने में अस्वीकारनीय है। प्रज्ञा ग्रंथ इस प्ररिपेक्ष्य को बदलते हुए हमें विस्मित करता है। “जो दीन-हीन है वह क्षमा और दया पात्र है, किन्तु शक्तिशाली की कड़ी परीक्षा ली जायेगी” (प्रज्ञा.6.6)। दुनिया की नजरों में जिनके पास कम है वे तुच्छ समझे जाते जबकि जिनके पास अधिक है वे सौभाग्यशाली। ईश्वर के विचार ऐसे नहीं हैं, शक्तिशालियों की कड़ी परीक्षा ली जायेगी जबकि नगण्य ईश्वरीय कृपादृष्टि के भागीदार होंगे। येसु जो प्रज्ञा के रुप हैं,  इस बात को सुसमाचार में पूरी तरह बदल देते हैं जिसे हम उनके प्रथम प्रवचन धन्यवचनों में पाते हैं। वे गरीबों, शोक करने वालों, सताये जाने वालों को धन्य कहते हैं। क्या कैसे संभंव हो सकता है? दुनिया के लिए धनी, शक्तिशाली और ख्याति प्राप्त व्यक्ति धन्य हैं। वे धनी हैं जिनके पास साधन है दुनिया उन्हें पहचान प्रदान करती है। लेकिन ईश्वर के साथ ऐसा नहीं है, ईश्वर की निगाहों में धनी नहीं वरन दीन-हीन महान हैं, जो अपने विचारों को दूसरों पर थोपते वे नहीं अपितु जो सभों के साथ नम्रता से पेश आते हैं, जिनकी भीड़ में वाहवाही होती वे नहीं वरन जो अपने भाई-बहनों पर दया दिखलाते वे बड़े हैं। इस परिस्थिति में हमें आश्चर्य होगा कि यदि मैं ईश्वर के कहें अनुसार जीवनयापन करूं तो मुझे क्या मिलेगा? क्या येसु का निमंत्रण हमारे लिए सार्थक है या व्यर्थ है? उनका निमंत्रण हमारे लिए व्यर्थ नहीं बल्कि प्रज्ञ है।

प्रेम कभी खत्म नहीं होता

येसु का निमंत्रण प्रेम के कारण प्रज्ञ है जो धन्यवचनों का केन्द्र-विन्दु है यद्यपि यह दुनिया की नजरों में कमजोर क्यों न दिखता हो, वास्तव में इसकी जीत सदा होती है। क्रूस में, यह पापों से अधिक शक्तिशाली है क्रब में यह मृत्यु को मिटा देता है। वहीं प्रेम परीक्षाओं की घड़ी में शहीदों को विजयी बनाता है कितने ही शहीदों ने विगत सदियों में इसका साक्ष्य दिया है। प्रेम हमारी शक्ति है, उन भाई-बहनों के लिए शक्ति का कारण जो येसु ख्रीस्त के नाम पर पूर्वाग्रहों, अपमान, दुर्व्यवहार औऱ सतावट के शिकार हुए। दुनिया में महिमा और शक्ति खत्म हो जायेंगी केवल प्रेम रह जायेगा जैसे कि संत पौलुस कहते हैं, “प्रेम कभी खत्म नहीं होता” (1 कुरू. 13.8)। धन्यवचनों के अनुसार जीवनयापन करना दुनिया की खत्म होने वाली चीजों को अनंत बनाना है, स्वर्ग को धरती पर लाना है।

धन्यवचनों का अभ्यास साक्ष्य द्वारा

लेकिन धन्यवचनों का अभ्यास कैसे किया जाये? वे हमें कोई विशेष चीजों को करने नहीं कहती हैं जो हमारी पहुँच से परे हों। वे हमसे रोजाना साक्ष्य की मांग करती हैं। धन्य हैं वे जो विनम्रता में जीवन व्यतीत करते हैं वे जहाँ कही भी हैं करूणा प्रदर्शित करते हैं। धन्य होने के लिए हमें कभी-कभार हीरो बनने की जरुरत नहीं वरन हमें रोजदिन साक्ष्य देना की आवश्यकता है। साक्ष्य के द्वारा हम येसु की प्रज्ञ को अपना बनाते हैं। ऐसे करने के द्वारा हम दुनिया को बदलते हैं, शक्ति और ताकत से नहीं अपितु धन्यवचनों को जीने के द्वारा। येसु ख्रीस्त ने ऐसा ही किया, उन्होंने अपने कथनानुरूप अपने जीवन को शुरू से अंत तक जीया। सारी चीजें येसु के प्रेम का साक्ष्य देने में निर्भर करती हैं जिसे संत पौलुस अद्वितीय रुप में आज के दूसरे पाठ में व्यक्त करते हैं।   

धैर्य प्रेम की अभिव्यक्ति

आज का पहला पाठ प्रेम को धैर्यवान कहता है। हमें इस विशेषण की आशा नहीं करते। प्रेम के अन्य दूसरे नाम अच्छाई, उदारता, नेक कार्य हो सकते हैं यद्यपि करूणा धैर्य से परे है। धर्मग्रंथ सर्वप्रथम हमारे लिए ईश्वर के धैर्य की चर्चा करता है। पूरे इतिहास में नर औऱ नारी को हम ईश्वर के प्रति निष्ठाहीन पाते हैं वे अपने उन्हीं पुराने पापों में गिर जाते हैं। ईश्वर विचलित होने और अपने को उनसे दूर करने के बदले मानव के प्रति निष्ठावान बने रहते हैं, वे उन्हें क्षमा करते और नये सिरे से शुरू करते हैं। प्रेम की नई शुरूआत हमारे लिए धैर्य के गुण को व्यक्त करता है क्योंकि प्रेम अपने में नहीं झुनझुलाता है वरन नये रुप में पुनः अपने को शुरू करता है। प्रेम थकता और निराश नहीं होता लेकिन सदैव आगे बढ़ता जाता है। वह हताश नहीं होता लेकिन सकारात्मक बने रहता है। बुराई के आगे वह अपने को समर्पित नहीं करता है।

प्रेम करने वाले बुरी परिस्थिति में अपने को बंद नहीं करते लेकिन बुराई का उत्तर अच्छाई से देते हैं उस बात की याद करते हुए कि क्रूस में विजय है। ईश्वर के साक्ष्य उसी प्रकार हैं वे घटनाओं, अनुभवों में निष्क्रिय या घातक नहीं बल्कि वे आशावान होते हैं क्योंकि वे प्रेम में जड़ित होते जो सभी चीजों को सहन करता, सभी बातों में विश्वास करता, सभी चीजों में आशा बनाये रखता और सभी बातों को अपने में वहन करता है।

बुरी परिस्थिति में दो परीक्षाएं

हम अपने में पूछ सकते हैं कि हम उन स्थिति में कैसे बर्ताव करते हैं जब चीजें ठीक नहीं हैंॽ विपरीत परिस्थिति में सदैव दो तरह की परीक्षाएं होती हैं। पहला भाग जाने का, जहाँ हम अपनी पीठ मोड़ लेते, अपने को सारी बातों से तटस्थ कर लेते हैं। दूसरा कि हम क्रोध में प्रतिक्रिया दिखाते हैं। गेतसेमानी में येसु के शिष्यों की प्रतिक्रिया ऐसी ही थी अपने आश्चर्य में बहुत कोई वहाँ से भाग गये और पेत्रुस ने अपनी तलवार निकल ली। फिर भी न तो भागने और न ही तलवार से कुछ प्राप्त हुआ। वहीं येसु ख्रीस्त इतिहास को बदल देते हैं। कैसेॽ अपने सधारण प्रेम की शक्ति, धैर्य पूर्ण साक्ष्य के द्वारा। हम सभी ऐसा ही करने हेतु बुलाये गये हैं और येसु इसी रुप में अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करते हैं।

प्रतिज्ञाएं- येसु की प्रज्ञ को हम उनके धन्यवचनों में सशक्त पाते हैं जो हमें साक्ष्य हेतु निमंत्रण देता और हमें उपहार रूपी दिव्य प्रतिज्ञाओं से भर देता है। हर धन्यवचन में हम तुरंत एक प्रतिज्ञा को पाते हैं जो उनका अभ्यास करते हैं वे स्वर्गराज्य के अधिकार होंगे, उन्हें सांत्वना मिलेगी, वे तृप्त किये जायेंगे, वे ईश्वर के दर्शन करेंगे... (मत्ती. 5.3-12)। ईश्वर की प्रतिज्ञा हमें सच्ची खुशी से भर देता और हमें कभी निराश नहीं करता है। लेकिन वे कैसे पूरे होते हैंॽ हमारी कमजोरियों के द्वारा। ईश्वर उन्हें धन्य घोषित करते हैं जो अपने हृदय की गहराई में दरिद्रता की अऩुभूतियों से होकर गुजरते हैं।  

ईश्वर कार्य के हमारी कमजोरियाँ में

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि यही वह मार्ग है और इसके सिवाय कोई दूसरा मार्ग नहीं है। हम अब्राहम के बारे में चिंतन करें। ईश्वर ने उन्हें असंख्य संतति की प्रतिज्ञा की लेकिन सारा और वह स्वयं संतानहीन अपनी उम्र को प्राप्त कर चुके थे। लेकिन उनके धैर्य और बुढ़ापे तक निष्ठा में बने रहने के कारण ईश्वर उन्हें आश्चर्यजनक रुप में एक पुत्र प्रदान करते हैं। हम मूसा की ओर भी देखें, ईश्वर ने प्रतिज्ञा की कि वे अपनी चुनी हुई प्रजा को गुलामी से मुक्त करेंगे और इसके लिए वे मूसा को फराऊन से बातें करने का निर्देश देते हैं। यद्यपि मूसा कहता है कि उसे बातें करना नहीं आता है लेकिन ईश्वर उनकी बातों के माध्यम अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हैं। हम माता मरियम की ओर देखें संहिता के अनुसार वह माता नहीं बन सकती थी लेकिन उसे मां बनने हेतु चुना गया। हम पेत्रुस की ओर देखें, उसने येसु को अस्वीकार किया लेकिन येसु उसकी को अपने लोगों को मजबूत करने हेतु बुलाते हैं। बहुत बार हम अपने जीवन में निसहाय और व्यर्थ होने का अनुभव करते हैं। ऐसी परिस्थिति में हम निरुत्साह न हों क्योंकि ईश्वर खास रुप से हमारी कमजोरियों के द्वारा ही अपने कार्यों को करना चाहते हैं।

ईश्वर ऐसा करना पसंद करते हैं और आज वे आठ बार इसे धन्य घोषित करते हुए हमें इस बात का एहसास दिलाते हैं कि उनके सानिध्य में हम सचमुच “धन्य” हैं। हमारे जीवन में निश्चित रूप से कठिनाइयाँ आयेंगी, हम असफल होंगे लेकिन हम यह न भूलें कि येसु में हम सभी धन्य हैं। दुनिया हमसे कुछ भी क्यों न ले जाये लेकिन उसकी तुलना हम ईश्वर के धैर्य और करूणामय प्रेम से नहीं कर सकते हैं। जब हम अपनी हाथों के देखते तो शायद वे हमें खाली दिखाई देते हों, शायद हम अपने जीवन से असंतुष्ट और हताश हो जाते हैं। यदि ऐसी बात है तो आप न डरें क्योंकि ईश्वर के धन्यवचन आप के लिए हैं। क्योंकि आप पीड़ित, न्याय के लिए भूखे और प्यासे हैं जो सताये जाते हैं। ईश्वर आप से यह प्रतिज्ञा करते हैं कि आप के नाम उनके हृदय में, स्वर्ग के राज्य में अंकित है।

आज मैं आप सभों से साथ और आप के लिए ईश्वर का धन्यवाद करता हूँ, क्योंकि यहाँ अतीत में प्रज्ञा की उत्पत्ति हुई, हमने बहुत से साक्ष्यों को देखा है जो समाचार नहीं बनें लेकिन वे ईश्वर की नजरों में मूल्यवान हैं। वे लोग जो अपने साक्ष्य के माध्यम, ईश्वर के धन्यवचनों को जीते, ईश्वर को अपनी शांतिमय प्रतिज्ञा पूरा करने में मदद करते हैं।  

 

06 March 2021, 16:11