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आमदर्शन समारोह आमदर्शन समारोह  (ANSA)

आमदर्शन- धर्मविधि और प्रार्थना, ईश्वर से मिलन

संत पापा फ्रांसिस ने अपने आमदर्शन समारोह में धर्मविधियों के दौरान ख्रीस्तीय प्रार्थना के महत्व पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

संत पापा फ्रांसिस ने 3 फरवरी को अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो सुप्रभात।

कलीसिया के इतिहास में हम बहुधा एक अंतरंग ख्रीस्तीय प्रचलन को पाते हैं जो आध्यात्मिकता के संदर्भ में जनसामान्य पूजनविधियों की महत्ता को पहचान प्रदान नहीं करती है। यह मान्यता इस बात को स्वीकार करती है कि धार्मिकता की शुद्धता वाह्य समारोहों में निहित नहीं है जो कई बार अपने में व्यर्थ या हानिकारक बोझ के समान लगते हैं। इस भांति हम देखते हैं कि हमारी धर्मविधि बहुत बार आलोचना का केन्द्र-विन्दु रही है।

वास्तव में, कलीसिया में हम आध्यात्मिकता के बहुत सारे निश्चित रुपों को पाते हैं जो धर्मविधि को पर्याप्त रुप में समाहित नहीं करती है। बहुत से विश्वासी विशेष रुप से रविवारीय यूखारिस्तीय धर्मविधि में सहभागिता के दौरान अपने विश्वास और आध्यात्मिक जीवन के संबंध में, विभिन्न तरह की भक्तियों से अपने को पोषित होता पाते हैं।

दिव्य उपासना की महत्ता

द्वितीय वाटिकन महासभा द्वारा गठित दिव्य उपासना और संस्कारों के अनुष्ठान को व्यवस्थित करने हेतु गठित परमधर्मपीठीय समिति (साक्रोसान्तुम कोन्सिलुम) इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण दिशा निर्देश प्रस्तुत करती है। यह ख्रीस्तियों के जीवन में दिव्य उपासना की महत्वपूर्णतः को बड़े पैमाने पर व्यवस्थित एवं पुनः स्थापित करती है। इस भांति वे अपने में चिंतन को एक विचार या एक मनोभावना मात्र नहीं बल्कि वास्तव में उसे जीवित व्यक्ति, येसु के जीवन और एक रहस्यात्मक ऐतिहासिक घटना के रुप में देखते हैं। ख्रीस्तियों की प्रार्थना मूर्त चिंतनों से परे, पवित्र धर्मग्रंथ, संस्कारों और धर्मविधियों से होकर गुजरती है। ख्रीस्तियों के जीवन में हम शारीरिक और भौतिक रुपों को अलग नहीं कर सकते हैं क्योंकि येसु ख्रीस्त में यह हमारे लिए मुक्ति का साधन बनती है। हम कह सकते हैं कि हम शरीर से प्रार्थना करते और प्रार्थना हमारे शरीर में प्रवेश करती है।

अतः ख्रीस्तीय आध्यात्मिकता में कोई भी ऐसी चीज नहीं जो पवित्र रहस्यों के अनुष्ठान से जुड़ी हुई न हो। काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा हमें कहती है, “येसु ख्रीस्त का प्रेरितिक कार्य और पवित्र आत्मा की उद्घोषणा हमारे लिए मुक्ति के रहस्यों को प्रस्तुत और व्यक्त करती है जो प्रार्थना से हृदय में जारी रहता है” (2655)। धर्मविधि इस भांति अपने में केवल स्वाभाविक प्रार्थना नहीं है बल्कि यह उससे भी बढ़कर एक वास्तविकता है- यह एक कार्य है जो ख्रीस्तीय अनुभवों को संगठित करता है जो प्रार्थना का रुप है।

धर्मविधिः घटना, मिलन और उपस्थिति

संत पापा ने कहा कि धर्मविधि एक घटना है, यह एक उपस्थिति है, एक मिलन है। येसु ख्रीस्त पवित्र आत्मा में अपने को हमारे लिए संस्कारों की निशानी में प्रस्तुत करते हैं- यही कारण है कि ख्रीस्तियों को दिव्य रहस्यों में सहभागी होने की आवश्यकता है। धर्मविधि के बिना ख्रीस्तयता अपने में येसु के बिना एक ख्रीस्तीयता होती है। यहाँ तक की केवल संस्कारों की उपस्थिति में भी जिसे कुछ ख्रीस्तीय कैदखानों में अनुष्ठान करते हैं या जो धर्म सतावट के समय में किया जाता था, हमारे लिए ख्रीस्त की उपस्थिति को दिखलाती हैं जो विश्वासियों को अपनी आशीष और कृपा से पोषित करते हैं।

धर्मविधि ईश्वरीय की निशानी

धर्मविधि, विशेष कर अपने उद्देश्य के आयाम पर, उत्साह से मनाये जाने की मांग करती है जिससे पूजन विधि के द्वारा मिलने वाली कृपा को सभी अपने में अनुभव कर सकें। कलीसिया की धर्मशिक्षा इसे अच्छी तरह व्यक्त करती है, “प्रार्थना धर्मविधि के दौरान और बाद में आंतरिकता को बढ़ाती और आत्मसात करती है।” बहुत से ख्रीस्तीय प्रार्थना धर्मविधि से उत्पन्न नहीं होते, लेकिन यदि वे सभी ख्रीस्तीय प्रार्थनाएं हैं तो अपने में धर्मविधि को, अर्थात् संस्कारों में येसु ख्रीस्त के जीवन पर चिंतन को वहन करते हैं। हर बार जब हम बपतिस्मा संस्कार का अनुष्ठान करते या यूखस्तीय बलिदान में रोटी तोड़ते और अंगूरी को पवित्र करते या पवित्र तेल से किसी रोगी के शरीर का विलेपन करते तो वहाँ हम येसु की उपस्थिति को पाते हैं। वे स्वयं वहाँ उपस्थित रहते और उन कार्यों को करते हैं जैसे कि उन्होंने बीमारों को चंगा किया या अंतिम व्यारी में संसार की मुक्ति हेतु अपने विधान की स्थापना की।

यूखरिस्त एक चढ़ावा है

ख्रीस्तीय प्रार्थना येसु ख्रीस्त के संस्कारीय उपस्थिति को हमारे लिए व्यक्त करता है। हमारे लिए जो वाह्य है वह हमारे शरीर का अंग बनता है- धर्मविधि में यह स्वाभाविक रुप में रोटी तोड़ने और खाने में व्यक्त होती है। यूखरिस्त को हम साधारण रुप में केवल “सुनते” नहीं है, यह एक सही अभिव्यक्ति नहीं है, “मैं मिस्सा सुनने जाता हूँ” मानो दर्शक की भांति हम चीजों को अपने बीच में देख रहे हों और हमारी कोई सहभागिता नहीं हो। यूखरिस्त बलिदान को हम सदैव अर्पित करते हैं यह केवल पुरोहित द्वारा नहीं होता वरन सभी विश्वासियों के द्वारा चढ़ाया जाता है जो उसमें भाग लेते और उसका अनुभव करते हैं। येसु ख्रीस्त इसके केन्द्रविन्दु हैं। हम सभी अपने उपहारों की विविधता और प्रेरिताई में उनके कार्य के सहभागी बनते हैं क्योंकि धर्मविधि के नायक वे हैं।

ईश्वरीय आराधना हेतु मानवीय बुलावा

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि जब प्रथम ख्रीस्तियों ने आराधना की शुरूआत की तो उन्होंने येसु के वचनों और कार्यों को अपने बीच में अनुभव किया। पवित्र आत्मा की शक्ति और ज्योति से उनका जीवन कृपामय हो गया जिसके द्वारा उन्होंने अपने जीवन को एक आध्यात्मिक उपहार स्वरुप ईश्वर को चढ़ाया। यह अनुभूति एक सच्ची “क्रांति” थी। संत पौलुस रोमियों के नाम अपने पत्र में लिखते हैं, “मैं ईश्वर के नाम पर अनुरोध करता हूँ कि आप मन तथा हृदय से उसकी उपासना करें और एक जीवन्त, पवित्र तथा सुग्राह्य बलि के रुप में अपने को ईश्वर के प्रति अर्पित करें”( रोमि.12.1) हमारा बुलावा ईश्वर की आराधना हेतु है लेकिन यह अपने में प्रार्थना के बिना विशेष कर धर्मविधि की प्रार्थना के बिना नहीं हो सकता है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

03 February 2021, 13:32