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संत पापा फ्रांसिस संत पापा फ्रांसिस 

बाईबिल, मनुष्यों के लिए ईश्वर का मिलन स्थल

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभी लोगों का अभिवादन करते हुए पवित्र बाईबिल के माध्यम प्रार्थना पर प्रकाश डाला।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवार, 27 जनवरी 2021 (रेई)- संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभी लोगों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

आज मैं प्रार्थना के संदर्भ में उस विषय पर चिंतन करना चाहूँगा जिसकी शुरूआत हम धर्मग्रंथ के पदों से कर सकते हैं। धर्मग्रंथ के वचन इसलिए नहीं लिखे गये हैं कि वे अपने में सीमित रहें वरन् वे प्रार्थना करने वालों के हृदयों का स्पर्श करते हुए उन्हें पुष्पित करें। ईश्वर के वचन हमारे हृदय की गहराई में उतरते हैं। कलीसियाई धर्मशिक्षा इसके बारे में कहती है, “प्रार्थना धर्मग्रंथ के पठन-पाठन से होना चाहिए, जिससे ईश्वर और मानव के बीच एक वार्ता स्थापित हो”।

ईश वचन हम प्रत्येक के लिए 

सदियों पहले धर्मग्रंथ में ईश्वर के लिखित वचन हमारे लिए भी लिखे गये हैं। यह अनुभव सभी विश्वासियों के लिए होता है, धर्मग्रंथ के पद जिसे हमने पहले भी कई बार सुना है, आश्चर्यजनक रुप में हमें किसी एक दिन प्रभावित करते हैं, और वे हमें अपने दैनिक जीवन की परिस्थिति में आलोक से भर देते हैं। लेकिन यह हमसे इस बात की मांग करती है कि हम ईश वचन की उपस्थिति में अपने उस दिन को सतर्कता में व्यतीत करें। ईश्वर हर दिन हमारे जीवन से होकर गुजरते और हृदय रुपी भूमि में एक बीज बोते हैं। हम नहीं जानते कि वे आज हमारे जीवन को एक बंजर, कंटीली या अच्छी भूमि की तरह पाते हैं जो उस बीज को बढ़ने देता है (मार.4.3-9)। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम धर्मग्रंथ के वचनों को अपने हृदय के खुलेपन, अपनी प्रार्थना द्वारा ईश्वर के सजीव वचन बनाते हैं। संत पापा ने संत अगुस्तीन के कथनों की याद दिलाते हुए कहा, “मुझे डर लगता है कि कब ईश्वर मेरे निकट से होकर गुजर जाये।” वे ऐसा कहते हैं क्योंकि वे उनकी आवाज को सुनने से चूक जाते हैं।  

धर्मग्रंथ पवित्र आत्मा से प्रेरित 

संत पापा ने कहा कि प्रार्थना के द्वारा शब्द एक नये रुप में शरीरधारण करता है। हम सभी उस ईश्वर के संदूक हैं जहाँ ईश्वर का वचन निवास करता और सुरक्षित रहता है जिससे हम दुनिया के लिए अपने को प्रस्तुत कर सकें। हमें धर्मग्रंथ को इसी रुप में देखने की जरुरत है। विश्वासी पवित्र धर्मग्रंथ की ओर अपने दर्शनशास्त्रीय और नौतिक विचार के स्पष्टीकारण हेतु नहीं आते वरन वे उसमें ईश्वर से मिलने की चाह रखते हैं क्योंकि वे जानते हैं धर्मग्रंथ पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखा गया है। हमें उसी आत्मा को स्वागत करने और उसे समझने की जरुरत है जिससे हमारा मेल ईश्वर से हो सकें।

संत पापा ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे बहुत बार इस बात से चिंता होती है कि बहुत से ख्रीस्तीय धर्मग्रथ के पदों को तोते की तरह उच्चरित करते हैं। लेकिन क्या वे उन पदों में ईश्वर से अपने मेल का अनुभव करते हैं। यह हमारे लिए याददाश्त की समस्या नहीं वरन हृदय में याद की समस्या है जिसे हम ईश्वर से मिलन हेतु खोलते हैं। वचन के द्वारा हमारा मेल ईश्वर से होता है।

संत पापा ने कहा कि हम धर्मग्रंथ का पठन-पाठन इसलिए करते हैं क्योंकि वे “हमारा स्पर्श” करते हैं। अपने को धर्मग्रंथ के पदों के अनुरूप पाना या देखना हमारे लिए एक तरह की कृपा होती है। धर्मग्रंथ किसी एक सामान्य मानव समुदाय के लिए नहीं वरन हम सभी नर और नारियों के लिए लिखा गया है जो हांड़ और मांस के हैं। ईश्वर के वचनों को खुले हृदय से सुनना हमें पवित्र आत्मा से पोषित करता है, जिसके फलस्वरुप चीजें वैसे ही नहीं रहतीं जैसे वे पहले थीं।

“लेक्सियो दिभिना”

धर्मग्रंथ के अनुसार प्रार्थना करना और उनके अनुरुप अपने अनुभवों के संदर्भ में हम ख्रीस्तीय रीति में एक समृद्धि को पाते हैं, विशेष रुप से “लेक्सियो दिभिना” के अनुरूप प्रार्थना करना जिसकी शुरूआत मठवासी जीवन में हुई। आज प्रार्थना करने का यह स्वरूप ख्रीस्तियों के बीच और पल्लियों में निरंतर उपयोग में लाया जाता है। यह सर्वप्रथम धर्मग्रंथ के पदों को ध्यानपूर्वक पढ़ना है, अपने में अनुशासन के साथ, जिससे हम उसमें निहित अर्थों को जान और समझ सकें। एक बार जब हम धर्मग्रंथ से वार्ता में प्रवेश करते तो यह हमें चिंतन और प्रार्थना हेतु अग्रसर करता है। पदों पर निष्ठापूर्ण ढ़ंग से बने रहते हुए मैं अपने में यह पूछता हूँ कि यह “मुझे क्या कहता” है। यह बहुत संवेदनशील भाग है यहां हम व्यक्तिगत रूप में इसे परिभाषित न करें बल्कि हम प्रचलनों के प्रकाश और रीतियों के परिपेक्ष में उसे देखें जो हम प्रत्येक को धर्मग्रंथ से संयुक्त करेगा। लेक्सियो दिभिना के अंतिम भाग में चिंतन करना है। वचनों और विचारों का मेल हमें प्रेम की ओर ले चलता है जैसे कि हम प्रेमियों को पाते हैं जो चुपचाप कभी-कभी केवल एक दूसरे को निहारते हैं। धर्मग्रंथ के पद हमारे लिए एक दर्पण की भांति होते हैं जिसमें हम अपने को देखते और चिंतन करते हैं।

प्रार्थना में ईश्वर के वचन हमारे जीवन में निवास करते और हम उन वचनों में। वचन हममें नेक विचार और कार्य करने की प्रेरणा जागृत करते हैं। वे हमें शक्ति और शांति प्रदान करते हैं यद्यपि वे हमें चुनौतियों से भर रहे होते हैं। हम उनके द्वारा शांति का अनुभव करते हैं। वहीं “विचित्र” और उलझे हुए दिनों में वे हमारे हृदयों को विश्वास और प्रेम से भर देते एवं हमें बुराई के आक्रमण से बचाते हैं।

इस भांति संत पापा ने स्वीकृति हेतु अनुरोध करते हुए कहा कि मुझे इस उक्ति का उपयोग करने दें कि ईश्वर का वचन उनमें शरीरधारण करता जो प्रार्थना में उन्हें स्वीकार करते हैं। कुछ प्राचीन लेखों के अनुसार ख्रीस्तीय, वचन से इस रुप में संयुक्त थे कि दुनिया के सारे बाईबलों को जला देने पर भी उसकी “आकृति” संतों के जीवन में अंकित थी।

ईश वचन शांति का स्रोत

संत पापा ने कहा कि ख्रीस्तीय जीवन अपने में आज्ञाकारिता और सृजनात्मकता का कार्य है। एक अच्छे ख्रीस्तीय को न केवल आज्ञाकारी बल्कि रचनात्मक होने की जरुरत है। आज्ञाकारी क्योंकि वह वचनों का श्रोता है और रचनात्मक क्योंकि पवित्र आत्मा हममें क्रियाशील होते एवं हमें सदैव आगे ले चलते हैं। येसु इस बात को अपने दृष्टांत के अंत में कहते हैं, “प्रत्येक शास्त्री जो स्वर्ग के राज्य के विषय में शिक्षा पा चुका है, उस गृहस्थ के सदृश है, जो अपने खजाने से नयी और पुरानी चीजों को निकालता है” (मत्ती.13.52)। पवित्र धर्मग्रंथ अपने में अनंत खजाने के समान है। ईश्वर हमें प्रार्थना के माध्यम से इस खजाने में से अधिक से अधिक चीजों को निकालने में मदद करें।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और हे पिता हमारे पिता प्रार्थना का पाठ करते हुए सभी को अपने प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

27 January 2021, 13:39