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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस  

देवदूत प्रार्थना : आगमन का तीसरा रविवार, संत पापा का संदेश

रविवार 13 दिसम्बर को देवदूत प्रार्थना के पूर्व दिये गये अपने संदेश में संत पापा ने संत योहन बपतिस्ता के बारे कहा कि वे अपने समय के नेता थे जिन्होंने मसीह की प्रतीक्षा की एवं उनके आगमन पर खुशी मनाया। लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं किया बल्कि सच्चे प्रकाश के रूप में प्रभु की ओर प्रेरित किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, रविवार, 13 दिसम्बर 2020 (वाटिकन रेडियो)- आगमन काल के तीसरे रविवार 13 दिसम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में उपस्थित विश्वासियों के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना का पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।"

ख्रीस्तीय आनन्द 

खुशी मनाने का निमंत्रण आगमन काल की विशेषता है: येसु के आगमन की प्रतीक्षा, आनन्द से की गई प्रतीक्षा है। यह उसी तरह है जिस तरह हम किसी अत्यन्त प्रिय व्यक्ति के आने का इंतजार करते हैं, उदाहरण के लिए, कोई घनिष्ट मित्र या रिश्तेदार जिससे हमारी मुलाकात लम्बे समय से नहीं हुई है...हम बड़ी उत्सुकता से उनकी बाट जोहते हैं। इस तरह की खुशी, खासकर आज तीसरे रविवार को होती है जिसमें संत पौलुस आह्वान करते हैं, "प्रभु में हर समय प्रसन्न रहें।" (फिली. 4:4) प्रसन्नचित होना! संत पापा ने कहा कि यह ख्रीस्तीय आनन्द है, पर इस आनन्द का कारण क्या है? क्योंकि "प्रभु निकट हैं।" (फिली. 4:5) प्रभु जितना नजदीक होते हैं हम उतना ही अधिक आनन्द महसूस करते हैं; वे जितना दूर होते हैं हम उतने ही उदास हो जाते हैं। ख्रीस्तियों की यही नीति है। एक बार एक दर्शनशास्त्री ने कुछ इसी तरह कहा था : "मैं नहीं समझता कि लोग कैसे आज विश्वास करते हैं, क्योंकि जो कहता है कि मैं विश्वास करता हूँ, उसका चेहरा दफन क्रिया में भाग लेनेवालों के समान उदास होता है। वे येसु ख्रीस्त के पुनरूत्थान के आनन्द का साक्ष्य नहीं देते हैं।" कई ख्रीस्तीय उसी तरह के चेहरे अर्थात् उदासी भरे चेहरे में रहते हैं... संत पापा ने कहा, "ख्रीस्त जी उठे हैं! ख्रीस्त हमें प्यार करते हैं! और आपको खुशी नहीं हो रही है? हम कुछ देर इस पर चिंतन करें और कहें : "मैं खुश हूँ क्योंकि प्रभु मेरे करीब हैं, क्योंकि प्रभु मुझे प्यार करते हैं क्योंकि प्रभु ने मुझे बचाया है।"

योहन बपतिस्ता येसु के पहले साक्षी

संत योहन रचित सुसमाचार से लिया गया आज का पाठ हमारे लिए बाईबिल के उन व्यक्तियों को प्रस्तुत करता है- जिन्होंने माता मरियम एवं योसेफ के साथ प्रतीक्षा की था – सबसे बढ़कर, मसीह के आगमन की प्रतीक्षा का अनुभव किया था तथा उनके आने की खुशी को महसूस किया था। हम निश्चय ही योहन बपतिस्ता की बात कर रहे हैं। (यो.1:6-8,19-28) सुसमाचार लेखक उनका परिचय इस प्रकार देते हैं, "ईश्वर का भेजा हुआ योहन नामक मनुष्य प्रकट हुआ। वह एक साक्षी के रूप में आया, जिससे वह ज्योति के विषय में साक्ष्य दे।" (6-7) योहन बपतिस्ता येसु के पहले साक्षी हैं जिन्होंने वचन से एवं अपने जीवन से भी उनका साक्ष्य दिया। सभी सुसमाचार लेखक मानते हैं कि उन्होंने अपने मिशन में येसु को मसीह के रूप में प्रकट किया, नबियों के द्वारा की गई ईश्वर की प्रतिज्ञा के संदेशवाहक के रूप में उन्हें प्रकट किया। योहन अपने समय में एक नेता थे। उनकी कीर्ति पूरे यहूदिया और गलीलिया तक फैल गई थी। किन्तु वे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने के प्रलोभन में जरा भी नहीं पड़े। वे हमेशा उन्हीं की ओर उन्मुखी रहे जो आनेवाले थे। उन्होंने कहा, "मैं उनके जूते का फीता खोलने योग्य भी नहीं हूँ।" (27) इस प्रकार उन्होंने हमेशा ईश्वर की ओर इशारा किया। उसी तरह माता मरियम भी प्रभु की ओर इशारा करती हैं, "वे जैसा कहें वैसा ही करना"। हमेशा प्रभु को ही केंद्र में रखती हैं। संत भी प्रभु को ही प्रकट करते हैं और जो प्रभु को प्रकट नहीं करता वह संत नहीं है।

  ख्रीस्तीय आनन्द की पहली शर्त

यहाँ ख्रीस्तीय आनन्द की पहली शर्त है : अपने आपको केंद्र में नहीं रखना बल्कि येसु को केंद्र में रखना। यह अलगाव की भावना नहीं है क्योंकि येसु प्रभावी तरीके से केंद्र में हैं, वे प्रकाश हैं जो इस दुनिया में आये तथा हरेक व्यक्ति के जीवन को पूर्ण अर्थ प्रदान करते हैं। यह प्रेम की वही गतिशीलता है जो हमें अपने आप से बाहर निकलने हेतु प्रेरित करता है। यह अपने आपको खोना नहीं है बल्कि देने एवं दूसरों की अच्छाई की खोज करने के द्वारा प्राप्त करना है।

योहन बपतिस्ता ने येसु का साक्ष्य देने के लिए लम्बी यात्रा तय की। आनन्द का रास्ता सैर के समान नहीं होता। यह हमेशा प्रसन्नचित रहने के लिए काम कराता है। योहन ने जवानी में ही सब कुछ छोड़ दिया था ताकि वह ईश्वर को पहले स्थान पर रख सके, अपने पूरे हृदय एवं पूरी शक्ति से उनके वचनों को सुन सके। वह निर्जन प्रदेश में चला गया था, जरूरत से अधिक सभी चीजों को अपने से अलग कर दिया था ताकि पवित्र आत्मा से संचालित होने के लिए अपने आपको स्वतंत्र कर सके। निश्चय ही, उनके जीवन की कुछ अलग खासियत थी, उनके समान दूसरे लोग नहीं कर सकते और जो सबके लिए उचित भी नहीं है किन्तु उनका साक्ष्य हम सभी के लिए उदाहरण है जो अपने जीवन के अर्थ की खोज करते एवं सच्चा आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं।

योहन बपतिस्ता ख्रीस्त का प्रचार करनेवालों के आदर्श

योहन बपतिस्ता कलीसिया में उन लोगों के लिए आदर्श हैं जो दूसरों के लिए ख्रीस्त का प्रचार करने हेतु बुलाये गये हैं। वे तभी ऐसा कर सकते हैं जब वे अपने आप से एवं सांसारिकता से अनासक्त हों, लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं करते बल्कि येसु की ओर प्रेरित करते हैं। आनन्द का अर्थ है, येसु की ओर अभिमुख होना एवं आनन्द हमारे विश्वास की कसौटी है। अंधेरे पलों में भी प्रभु को जानने का वह आंतरिक आनन्द हमारे अंदर होता है कि प्रभु हमारे साथ हैं, प्रभु जी उठे हैं। प्रभु ही हमारे जीवन के केंद्र हैं और इसी में हमारी खुशी है।

माता मरियम से सीख

संत पापा ने विश्वासियों से कहा, "आज हम विचार करें : मैं किस तरह व्यवहार करता हूँ? क्या मैं खुशहाल व्यक्ति हूँ जो ख्रीस्तीय होने के आनन्द को बांटना जानता हूँ अथवा हमेशा उदास रहता हूँ दफन क्रिया में भाग लेनेवालों के समान? यदि मुझमें अपने विश्वास की खुशी नहीं है तब मैं साक्ष्य नहीं दे पाऊँगा और दूसरे कहेंगे: क्या विश्वास इतना उदासी भरा होता है, अच्छा है कि हम विश्वास नहीं करते हैं।"

माता मरियम का उदाहरण देते हुए संत पापा ने कहा, "हम देखते हैं कि कुँवारी मरियम में सब कुछ पूरा हुआ : उन्होंने मौन रहकर ईश्वर के मुक्तिदायी वचन का इंतजार किया, उसे सुना, स्वीकार किया और अपने गर्भ में धारण किया। उनके माध्यम से ईश्वर हमारे नजदीक आये। यही कारण है कि कलीसिया मरियम को "आनन्द का मूल" पुकारती है।"

13 December 2020, 15:40