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इटली में दिव्यांग लोग इटली में दिव्यांग लोग  (ANSA)

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस: दुर्बलता हर किसी के जीवन का भाग है

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के उपलक्ष्य में प्रकाशित एक संदेश में संत पापा फ्राँसिस ने सभी दिव्यांग लोगों के प्रति अपना सामीप्य व्यक्त किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 3 दिसम्बर 2020 (रेई)- 3 दिसम्बर को प्रकाशित संदेश में संत पापा ने लिखा, "इस साल अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के अवसर पर, मैं उन सभी लोगों के प्रति अपना सामीप्य व्यक्त करना हूँ जो महामारी की इस परिस्थिति में अधिक कठिनाई महसूस कर रहे हैं। अशांत सागर के बीच हम सभी एक ही नाव पर सवार हैं जो सभी को भयभीत कर रहा है, फिर भी, इस एक ही नाव में, कुछ लोग अधिक परेशानी झेल रहे हैं और वे लोग हैं, दिव्यांग।

अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस की विषयवस्तु है, "बेहतर का पुनःनिर्माण : एक विकलांगता समावेश की ओर, कोविड-19 के बाद सुलभ और स्थायी विश्व।"

संत पापा ने संदेश में सुसमाचार से लिए गये बालू और चट्टान पर निर्मित घरों के दृष्टांत पर प्रकाश डाला।     

फेंकने की संस्कृति का भय   

संत पापा ने कहा कि घर जिसको वर्षा, नदी और आंधी का खतरा होता है उसकी तुलना हमारे समय के फंकने की संस्कृति से की जा सकती है।  

इस संस्कृति के अनुसार, मानव परिवार के कुछ हिस्सों में ऐसा लगता है कि चिंता मुक्त जीवन जीने के लिए सहज ही त्याग दिया जाना चाहिए। अतः लोगों को देखभाल एवं सम्मान दिये जाने के सर्वोपरि मूल्य के रूप में नहीं देखा जाता है, खासकर जब वे गरीब अथवा विकलांग होते हैं।  

इस संस्कृति का प्रभाव विशेषकर, विकलांग जैसे कमजोर लोगों पर पड़ता है। पिछले 50 सालों में नागरिक और कलीसियाई दोनों स्तरों पर उनके लिए विशेष कदम उठाये गये हैं। हरेक व्यक्ति की प्रतिष्ठा के प्रति जागरूकता बढ़ी है यही कारण है कि शारीरिक रूप से कठिनाई महसूस करनेवालों को भी शामिल करने की कोशिश की गई है। फिर भी सांस्कृतिक स्तर पर बहुत कुछ करना बाकी है क्योंकि हम अब भी उनके प्रति तिरस्कार की भावना रखते हैं।  

अतः संत पापा ने कहा कि इस अवसर पर यह महत्वपूर्ण है कि जीवन की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए जो हरेक व्यक्ति एवं कार्य की प्रतिष्ठा सुनिश्चित करती, विशेषकर, हर उम्र के विकलांग लोगों की रक्षा हेतु।  

समावेश की चट्टान

वर्तमान की इस महामारी ने असमानताओं एवं विभिन्नताओं को बढ़ाया है। वायरस जो किसी व्यक्ति को अलग नहीं करता, उसने बड़े स्तर पर अपना विनाशकारी, असमानता एवं भेदभाव का रास्ता पाया है। जो उसे अधिक गंभीर बना दिया है।  

यही कारण है कि समावेश पहला पत्थर होना चाहिए जिसपर मकान का निर्माण हो। समावेश ही वह पत्थर होना चाहिए जिसपर नागरिक संस्थाओं के कार्यक्रमों एवं प्रयासों को यह सुनिश्चित करने के लिए स्थापित किया जाए कि कोई भी पीछे न छूटे, खासकर जो कठिनाई में हैं। संबंध कितना मजबूत है इसका अंदाजा इससे लगया जा सकता है कि कमजोर लोगों को कितना ध्यान दिया जाता है।  

संत पापा ने कलीसियाई संस्थाओं को सम्बोधित करते हुए कहा है कि विश्वास को सौंपने के लिए उपयुक्त और सुलभ साधन उपलब्ध कराना आवश्यक है। उन्होंने उम्मीद जतायी कि ये चीजें उन लोगों को प्राप्त हो सकेंगे जिन्हें इनकी जरूरत है। संत पापा ने सभी पुरोहितों, गुरूकुल छात्रों, धर्मसमाजियों, प्रचारकों एवं प्रेरिताई में सहयोग देनेवाले लोगों को, दिव्यांग और समावेशी प्रेरितिक साधनों पर लगातार प्रशिक्षण देने के प्रयासों को प्रोत्साहन दिया। पल्ली समुदाय में दिव्यांग लोगों के प्रति स्वीकार्य मनोभाव को बढ़ावा दिया। उन्होंने विकलांगों के लिए "उनके" शब्द का प्रयोग नहीं करने बल्कि "हमारे" शब्द का प्रयोग करने की सलाह दी।  

सक्रिय सहभागिता की चट्टान

हमारे समाज को बेहतर बनाने के लिए कमजोर लोगों को शामिल करने में उनकी सक्रिय सहभागिता को बढ़ावा देना भी जुड़ा है।

संत पापा ने दिव्यांग लोगों की आध्यात्मिक चिंता करते हुए कहा, "सबसे पहले, मैं कलीसिया के दूसरे सदस्यों की तरह विकलांग लोगों के संस्कार ग्रहण करने के अधिकार का जोरदार पुष्टि देता हूँ। पल्लियों में सभी धर्मविधि समारोह उनके लिए भी उपलब्ध हों ताकि अपने भाई बहनों के साथ वे भी अपने विश्वास को गहरा कर सकें, मना सकें और जी सकें। विशेष ध्यान उन दिव्यांगों पर दिया जाना चाहिए जिन्होंने अब तक ख्रीस्तीय धर्मशिक्षा प्राप्त नहीं की है। उन्हें संस्कार ग्रहण करने हेतु धर्मशिक्षा देकर तैयार किया जाना चाहिए। कोई भी व्यक्ति संस्कारों की कृपा से वंचित न रहे।  

संत पापा ने कहा कि बपतिमा के द्वारा हरेक ख्रीस्तीय मिशनरी शिष्य बनता है। विकलांग लोग भी समाज और कलीसिया में हमारे प्रेरितिक मिशन में सक्रिय सहभागी बनना चाहते हैं न कि केवल ग्रहण करना। कई दिव्यांग महसूस करते हैं कि उनकी कोई सहभागिता नहीं है। अतः हमारी चिंता न केवल उनकी देखभाल होनी चाहिए बल्कि समाज और कलीसिया में उनकी सक्रिय सहभागिता को सुनिश्चित भी किया जाना चहिए।   

दिव्यांग अपनी क्षमता के अनुसार प्रचारक बन सकते हैं तथा समुदाय को अपना सहयोग दे सकते हैं। जिसके लिए उन्हें उचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे विस्तृत ज्ञान प्राप्त कर सकें।

संत पापा ने अपने संदेश में उन लोगों की भी याद की जो दिव्यांग लोगों की चुपचाप मदद करते हैं तथा उन्हें प्रोत्साहन दिया कि "हमारी आम अभिलाषा बेहतर का पुनःनिर्माण हो, सामाजिक एवं कलीसियाई दलों के बीच नये तरह के सहयोगों को बढ़ावा दिया जा सके, इस प्रकार हर तूफान का सामना करने के लिए तैयार एक ठोस "घर" का निर्माण होगा जो विकलांग लोगों का स्वागत करने में सक्षम होगा, क्योंकि यह समावेश और सक्रिय भागीदारी की चट्टान पर बनाया गया है।"  

03 December 2020, 15:27