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2020.12.30 Udienza Generale 2020.12.30 Udienza Generale  (Vatican Media)

सदैव कृतज्ञ रहें, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने बुधवारीय अपने आमदर्शन समारोह की धर्मशिक्षा में सदा धन्यवादी बने रहने का आहृवान किया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, बुधवारीय, 30 दिसम्बर 2020 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के दौरान कृतज्ञता के भाव पर अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व वाटिकन प्रेरितिक निवास की पुस्तकालय से सभों का अभिवादन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज मैं कृतज्ञता की प्रार्थना पर अपना ध्यान क्रेन्दित करना चाहूंगा। इसे मैंने सुसमाचार लेखक संत लूका के सुसमाचार से लिया है। येसु राह में आगे बढ़ रहे थे कि दस कोढ़ी उसके पास आये और ऊंचे स्वर में बोले, “ईसा, गुरूवर, हम पर दया कीजिए” (17.13)। हम जानते हैं कि कोढ़ग्रस्त व्यक्ति अपने में न केवल शारीरिक बल्कि सामाजिक और धार्मिक रुप में बहिष्कार के कारण दुःख से पीड़ित थे। येसु उनसे भेंट करने में पीछे नहीं हटते हैं। कई बार वे समाज में निर्धारित बंधनों और नियमों के परे जाते और बीमार व्यक्तियों का स्पर्श करते हुए, गले लगाते हुए उन्हें चंगाई प्रदान करते हैं। इस परिस्थिति में हम उन्हें उनका स्पर्श करते हुए नहीं पाते हैं। दूर से ही येसु उन्हें अपने को पुरोहितों के सामने प्रस्तुत करने का निमंत्रण देते हैं क्योंकि नियमानुसार उन्हें ही चंगाइयों को सत्यापित करने का अधिकार था (14)। येसु ने इसके अलावे उन्हें कुछ नहीं कहा। उन्होंने उनकी प्रार्थना, उनकी करूणामय पुकार सुनी और उन्हें तुरंत याजकों के पास भेजा।

दस कोढ़ियों ने उन पर विश्वास किया। वे शीघ्र ही चल पड़े, और जब वे रास्ते में ही थे वे सभी, दस के दस चंगे हो गये। याजकगण उन्हें देखकर उनकी चंगाई को सत्यापित करते हुए जनसामान्य जीवन में पुनः शामिल कर सकते थे। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात को हम घटित होता देखते हैं, उस समुह से केवल एक ही, याजकों के पास जाने के पूर्व येसु के पास लौट कर आता, उनका धन्यवाद करता और मिली कृपा के लिए ईश्वर की स्तुति और प्रशंसा करता है। येसु इस बात की ओर इंगित कराते हैं कि वह एक समारी था, यहूदियों के समय में एक तरह का “अविश्वासी”। येसु कहते हैं, “क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करेॽ” (17.18)।

मानवीय मनोभाव                

संत पापा ने कहा कि यह वृतांत यदि कहा जाये, तो विश्व को दो भागों में विभाजित करता है, एक जो ईश्वर का धन्यवाद करते और दूसरे जो उन्हें कृतज्ञता के भाव अर्पित नहीं करते हैं। एक हैं जो सभी चीजों को इस भांति लेते हैं मानो वह उनका अधिकार है, वहीं दूसरे अपने जीवन की सारी बातों को ईश्वर के एक उपहार, कृपाओं की भांति स्वागत करते हैं। काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा कहती है, “हर घटना और जरुरत कृतज्ञता के भाव अर्पित करने के पल हो सकते हैं” (2638)। कृतज्ञता की प्रार्थना सदैव इस बात से शुरू होती है कि हम अपने में यह अनुभव करते हैं कि ईश्वर की कृपा हमें आगे ले चलती है। इसके पहले की हम सोच-विचार करना सीखें ईश्वर ने हमारे बारे में सोचा है, हमारे प्रेम करना सीखने से पहले ही ईश्वर ने हम सभों को प्रेम किया है, हमारे हृदयों में हमारी एक इच्छा की उत्पत्ति से पहले ही ईश्वर ने हमारी चाह रखी है। यदि हम जीवन को इस नजरिये से देखते हैं तो “कृतज्ञता के भाव” हमारे जीवन का सार बन जाता है। कितनी बार हम अपने जीवन में धन्यवाद कहना भूल जाते हैं।

यूखारिस्त कृतज्ञता का बलिदान

संत पापा ने कहा कि हम ख्रीस्तियों के लिए कृतज्ञता को एक अति महत्वपूर्ण संस्कार, यूखारिस्त की संज्ञा दी गई है। वास्तव में, इब्रानी भाषा में विशेष रुप से इसका अर्थ धन्यवाद देना है। ख्रीस्तीय और सभी विश्वासीगण अपने जीवन के उपहार हेतु ईश्वर को धन्य कहते हैं। जीना अपने में इस अर्थात को प्रकट करता है कि हमें दिया गया है। हम सभी जन्में हैं क्योंकि किसे ने हमें जीवन देने की चाह रखी। यह हमारी लम्बी ऋणों में पहली है जिसे हमने जीवित रहते हुए प्राप्त किया है। हमारे जीवन में कृतज्ञता रुपी ऋणों की एक लम्बी फेहरिस्त है। जीवन हमारा एक से अधिक लोगों की परिशुद्ध कृपादृष्टि से भरा है। बहुधा वे हमारे लिए हमारे शिक्षकगण, धर्मशिक्षा देने वाले, वे जिन्होंने जरुरत से ज्याद हमारी देख-भाल करते हुए विभिन्न तरह की भूमिकाओं को निभाया है। वे सभी हमें धन्यवादी होने के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ तक की मित्रता हमारे लिए एक उपहार है जिसके लिए हमें सदैव कृतज्ञता के भाव प्रकट करने की जरुरत है।

कृतज्ञता प्रेमबोध करता है

संत पापा फ्रांसिस ने कहा कि यह कृतज्ञता जिसे हम निरंतर व्यक्त करते हैं, हम ख्रीस्तीय के द्वारा दूसरों के साथ साझा करने में, यह येसु ख्रीस्त से हमारा मेल करता और विकसित होता है। सुसमाचार हमें इस बात का साक्ष्य देता है कि येसु का लोगों के बीच से होकर गुजरना उनमें ईश्वर के प्रति कृतज्ञता के भाव उत्पन्न करते थे। सुसमाचार के वृंतात में हम प्रार्थनामय जीवन व्यतीत करने वाले बहुत से लोगों की चर्चा पाते हैं जो मुक्तिदाता के आने पर अपने को ईश्वरीय कृपा से ओत-प्रोत पाया। हम भी उसी बृहृद आनंद में सहभागी होने हेतु बुलाये जाते हैं। दस कोढ़ियों का दृष्टांत भी हमारे लिए इसी मनोभाव को व्यक्त करता है। स्वास्थ्य लाभ उन्हें स्वभाविक रुप में खुशी से भर देता है क्योंकि समुदाय से अलग रहने की उनकी अवधि समाप्त होती है। लेकिन उनमें सिर्फ एक ही अपने में अत्यधिक खुशी का एहसास करता है जो येसु से मिलन में व्यक्त होता है। कृतज्ञता का सार यही है कि यह हमें प्रेम किये जाने की निश्चितता का बोध करता है, जो अपने में विशाल है। वह न केवल बुराई से स्वतंत्र होता लेकिन अपने में इस बात का एहसास करता है कि वह प्रेम किया जाता है। प्रेम की यही शक्ति है जिसके द्वारा दुनिया संचालित होती है। दंते इस प्रेम का जिक्र करते हुए कहते हैं, “प्रेम सूर्य और अन्य तारों को भी संचालित करता है” (Paradise, XXXIII, 145)। संत पापा ने कहा कि हम बंजारों की तरह उद्देश्यहीन यहाँ-वहाँ नहीं भटकते अपितु हमारा एक घर है, हम येसु ख्रीस्त में निवास करते हैं और उस “निवास” से हम सारी दुनिया पर चिंतन करते हैं जो हमें अनंत मनोरम लगती है। हम प्रेम की संतान हैं, हम प्रेम के भाई-बहनें, नर-नारियाँ हैं।

खुशी के वाहक बनें

इसलिए, भाइयो एवं बहनों, उन्होंने कहा, हम येसु ख्रीस्त से मिलन में मिलनेवाले प्रेम में जीवन जीने की चाह रखें। हम अपने में खुशी उत्पादन करें। वहीं शैतान किसी भी परीक्षा में फुसलाने के बाद, सदैव हमें दुःख और अकेला छोड़ देता है। यदि हम येसु ख्रीस्त में हैं तो हम अपने में कोई पाप और बुराई नहीं पायेंगे जो हममें निरंतर बने रहने वाली खुशी को अवरुध करेगा, जहाँ हम अपने जीवन की राह में बहुत सारे मित्रों को पाते हैं।

निरंतर कृतज्ञता

इससे भी बढ़कर, हम धन्यवाद देना न भूलें, यदि हम कृतज्ञता के भाव धारण करते हैं तो विश्व हमारे लिए अपने आप बेहतर बनेगा, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो वह हमारे लिए आशा को संचारित करने में प्रर्याप्त होगा। दुनिया को आशा की जरूरत है और कृतज्ञता के भाव में हम आशा को प्रसारित करते हैं। सभी चीजों अपने में संयुक्त और संलग्न हैं और यह हर किसी को अपनी ओर से प्रयास करना है चाहे हम कहीं भी हो। खुशी का मार्ग जिसे संत पौलुस हमारे लिए अपने एक पत्र में जिक्र करते हुए कहते हैं, “निरंतर प्रार्थना करते रहें, सब बातों के लिए ईश्वर का धन्यवाद करें, क्योंकि ईसा मसीह के अनुसार आप लोगों के लिए ईश्वर की इच्छा यही है। आत्मा की प्रेरणा का दमन नहीं करें” (1थेसल. 5.17-19)। हम आत्मा की प्रेरणा का दमन न करें क्योंकि यही जीवन की सुन्दरता है। हमारे अंदर व्याप्त आत्मा हममें कृतज्ञता के भाव उत्पन्न करता है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों के अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।  

30 December 2020, 13:57