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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (AFP or licensors)

क्षमाशीलता व दयालुता, पीड़ा, युद्ध को दूर करने में सहायक, पोप

वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 13 सितम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर करुणावान राजा के दृष्टांत पर चिंतन किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 13 सितम्बर 2020 (रेई) – वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 13 सितम्बर को संत पापा फ्राँसिस ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

दृष्टांत जिसको हम आज के सुसमाचार पाठ में पढ़ते हैं, करुणावान राजा का है (मती. 18. 21-35) हम इस अर्जी को दो बार सुनते हैं ˸ "मुझे समय दीजिए और मैं आपको सब चुका दूँगा।" (26-29)

पहली बार इसका उच्चारण उस सेवक के द्वारा किया जाता है जो अपने स्वामी से लाखों रूपये का कर्जदार है। दूसरी बार दूसरा सेवक उस मालिक से गिड़गिड़ाता है जो स्वयं बहुत अधिक कर्ज में डूबा है। इस दूसरे सेवक का कर्ज बहुत कम था शायद सप्ताह भर के वेतन के समान ही था।  

करुणा द्वारा न्याय पर विजय

संत पापा ने कहा कि इस दृष्टांत का केंद्रविन्दु मुक्ति है जिसको स्वामी नौकर के प्रति भारी कर्ज माफ करने के द्वारा दिखलाते हैं। सुसमाचार लेखक जोर देता है कि स्वामी दयालु थे। वे अपने वचन को कभी नहीं भूलते, जैसा कि हम येसु में पाते हैं। येसु हमेशा तरस खाते थे। उस सेवक को स्वामी ने जाने दिया और उसके कर्ज माफ कर दिये। (27) यह एक भारी कर्ज था अतः बहुत अधिक माफ किया गया। किन्तु उस नौकर ने उसके तुरन्त बाद अपने साथी के प्रति क्रूरता दिखायी जो उससे थोड़े ही का कर्जदार था। उसने उसकी बात नहीं सुनी, उसपर हमला किया एवं जब तक उसने कर्ज अदा नहीं की उसे जेल में डालवा दिया।(30) स्वामी इन सारी बातों को सुनकर क्रूद्ध हो गये, उन्होंने दुष्ट सेवक को बुलाया और उसे दण्ड दिया। (32-34) "दुष्ट सेवक, तुम्हारे अनुनय विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कर्ज माफ कर दिया था, तो जिस प्रकार मैंने तुमपर दया की थी तो क्या उसी प्रकार तुम्हें अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?"

ईश्वरीय मनोभाव और मानवीय मनोभाव

संत पापा ने कहा, "दृष्टांत में हम दो अलग-अलग मनोभवों को पाते हैं ˸ ईश्वर का मनोभाव – जिसकी तुलना राजा से की गई है, जो बहुत अधिक क्षमा करते हैं क्योंकि ईश्वर हमेशा क्षमा करते हैं तथा दूसरा मनुष्य का मनोभाव। ईश्वरीय मनोभाव में न्याय में करुणा व्याप्त है जबकि मानवीय मनोभाव केवल न्याय तक सीमित है। येसु हमसे आग्रह करते हैं कि हम क्षमा की शक्ति के लिए साहसपूर्वक खुलें क्योंकि हम जानते हैं कि जीवन में सब कुछ का समाधान केवल न्याय से नहीं होता। इसके लिए करुणापूर्ण प्रेम की भी आवश्यकता होती है जो पेत्रुस के सवाल का, प्रभु द्वारा उत्तर का आधार है। पेत्रुस इस तरह सवाल करते हैं, "यदि मेरा भाई मेरे विरूद्ध अपराध करता जाए, तो कितनी बार उसे क्षमा कर दूँ? (21) और येसु ने उत्तर दिया, "मैं तुम से नहीं करता सात बार तक बल्कि सत्तर गुणा सात बार तक।" (पद.22)

क्षमाशीलता एवं करुणा

बाईबिल के इस प्रतीकात्मक भाषा में इसका अर्थ है कि हम हमेशा क्षमा करने के लिए बुलाये गये हैं। यदि क्षमाशीलता एवं करुणा हमारी जीवनशैली होती तो हम कितनी पीड़ा, दुःख और युद्ध से बच गये होते। कई टूटे परिवार नहीं जानते कि एक-दूसरे को किस तरह माफ करना है। कितने लोगों के मन में बदले की भावना होती है। यह आवश्यक है कि सभी मानवीय संबंधों में करुणामय प्रेम को लागू किया जाए ˸ पति पत्नी के बीच, माता-पिता एवं बच्चों के बीच, हमारे समुदायों में, कलीसिया, समाज और राजनीति में।   

मृत्यु को याद रखो, आज्ञाओं का पालन करो

संत पापा ने पहले पाठ पर प्रकाश डालते हुए कहा, "आज सुबह, जब मैं ख्रीस्तयाग अर्पित कर रहा था, मैं रूक गया, मैं प्रवक्ता ग्रंथ से लिए गये पहले पाठ के एक वाक्य से प्रभावित था। वाक्य इस प्रकार है, "मृत्यु को याद रखो और आज्ञाओं का पालन करो।" संत पापा ने कहा कि यह एक सुन्दर वाक्य है। मैं अंत के बारे सोचता हूँ। क्या आप चिंतन करते हैं कि आप शव पेटिका में होंगे...और वहाँ भी घृणा को अपने साथ रखेंगे? संत पापा ने कहा, "अपने अंत के बारे सोचें, घृणा करना छोड़ दें, कुढ़ना बंद करें। आइये, हम इस मर्मस्पर्शी वाक्य पर चिंतन करें, "मृत्यु को याद रखो और आज्ञाओं का पालन करो।"

क्षमा करना आसान नहीं है क्योंकि शांति के क्षण व्यक्ति कहता है, कि जी हाँ इसने मेरे साथ बहुत कुछ किया है किन्तु मैंने भी किया है। क्षमा पाने के लिए क्षमा देना अच्छा है किन्तु बाद में बदले की भावना फिर आती है। संत पापा ने कहा कि क्षमा देना मात्र क्षणभर के लिए नहीं है। यह जारी रहना चाहिए और बदले की भावना जब भी आती है क्षमा करते रहना है। हम अपनी मृत्यु की याद करें और घृणा करना छोड़ दें।

"हे हमारे पिता" प्रार्थना का अर्थ

आज का दृष्टांत हमें "हे हमारे पिता" की प्रार्थना जिसको हम करते हैं उसके अर्थ को पूर्ण रूप से समझने में मदद देता है। "हमारे अपराध क्षमा कर जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है" (मती.6,12) इस वाक्य में कड़ी सच्चाई है। हम ईश्वर से क्षमा पाने की उम्मीद नहीं कर सकते यदि हम अपने पड़ोसी को क्षमा नहीं देते हैं। यह एक शर्त है, अपनी मृत्यु के बारे सोचें, ईश्वर की क्षमाशीलता पर गौर करें और घृणा करना छोड़ दें। द्वेष को दूर करें जो परेशान करनेवाली मक्खी के समान है जो बार-बार आती है। यदि हम क्षमा देने और प्रेम करने की कोशिश नहीं करेगे तो हम भी क्षमा और प्यार नहीं किये जायेंगे। 

ईश्वर के प्रति ऋणी होने का एहसास

संत पापा ने माता मरियम से प्रार्थना करने का आह्वान करते हुए कहा, "आइये, हम अपने आपको ईश्वर की माता मरियम की ममतामय मध्यस्थता को समर्पित कर दें। वे हमें यह देखने में सहायता दें कि हम ईश्वर से कितने ऋणी हैं, हम उसे हमेशा याद रख सकें ताकि हमारा हृदय ईश्वर की दया और अच्छाई के लिए खुला रह सकें।"  

इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

14 September 2020, 13:25