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संत पापा फ्राँसिस संत पापा फ्राँसिस   (ANSA)

सच्चा ख्रीस्तीय हर दिन बुराई पर अच्छाई का चुनाव करता है, संत पाप

वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 27 सितम्बर को विश्वासियों के साथ संत पापा फ्राँसिस ने देवदूत प्रार्थना का पाठ किया। देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने सुसमाचार पाठ पर चिंतन किया जिसमें येसु दो पुत्रों का दृष्टांत सुनाते हैं।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 28 सितम्बर 2020 (रेई) – वाटिकन स्थित संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में रविवार 27 सितम्बर को बारिश के बावजूद विश्वासियों के साथ संत पापा फ्राँसिस ने देवदूत प्रार्थना का पाठ किया, देवदूत प्रार्थना के पूर्व उन्होंने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, अति प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

"मेरी भूमि में कहा जाता है कि 'एक खराब मौसम में अच्छा चेहरा।' इसी अच्छे चेहरे के साथ आप सभी से कहता हूँ, सुप्रभात।"

ईश्वर के राज्य पर उपदेश के साथ येसु ने एक ऐसी धार्मिकता का विरोध किया है जो मानव जीवन को शामिल नहीं करता, जो अच्छाई एवं बुराई के सामने अंतःकरण और इसकी जिम्मेदारी पर सवाल नहीं करता। वे इसे दो पुत्रों के दृष्टांत द्वारा दिखलाते हैं जिसको आज संत मती. के सुसमाचार पाठ में हमारे लिए प्रस्तुत किया गया है।(मती. 21:28-32) दाखबारी में काम करने के लिए पिता द्वारा निमंत्रण दिए जाने पर पहला बेटा जवाब देता है, जी नहीं मैं नहीं जाऊँगा लेकिन बाद में वह मनपरिवर्तन करता और जाता है। जबकि दूसरा बेटा तुरन्त जवाब देता है जी हाँ पिताजी मैं जाऊँगा किन्तु नहीं जाता है।

संत पापा ने कहा, "आज्ञापालन हाँ या न कहने में नहीं है बल्कि हमेशा काम करने में है, दाखबारी में काम करने में, ईश्वर के राज्य को लाने में, अच्छा काम करने में है।" इस साधारण उदाहरण के द्वारा येसु एक धर्म के बाह्य एवं आदतन अभ्यास की समझ से परे जाना चाहते हैं जो लोगों के जीवन एवं मनोभाव को प्रभावित नहीं करता, जो एक सतही धार्मिकता है और बुरे शब्दों में "धार्मिक अनुष्ठान" मात्र कहा जा सकता है।

चेहरे की धार्मिकता

"चेहरे" की इस धार्मिकता के प्रतिपादक, जिनसे येसु असहमत हैं वे उस समय के प्रधान याजक और जनता के नेता थे। (मती. 21,23) जो प्रभु की चेतावनी अनुसार, स्वर्ग राज्य में नाकेदारों और वैश्याओं से पीछे रहेंगे। (31) येसु उनसे कहते हैं : नाकेदार अर्थात् पापी और वैश्या स्वर्ग राज्य में पहले होंगे। यह इस बात की पुष्टि देता है कि जो गिरजा जाते हैं उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि जो लोग ईश्वर की आज्ञाओं का पालन नहीं करते और जो नैतिक जीवन नहीं जीते हैं वे हमसे अधिक बुरे हैं। संत पापा ने कहा, "नहीं, यह येसु की शिक्षा नहीं है। येसु नाकेदारों और वैश्याओं को जीवन के आदर्श भी नहीं बतलाते बल्कि "कृपा पात्र" मानते हैं।" संत पापा ने "कृपा" शब्द पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मन-परिवर्तन हमेशा कृपा से ही संभव होता है। कृपा जिसको ईश्वर उन सभी लोगों को प्रदान करते हैं जो अपने आपको खोलते एवं उनकी ओर फिरते हैं। निश्चय ही, ये लोग उनकी शिक्षा को सुनते, पश्चाताप करते और अपना जीवन बदल डालते हैं। उदाहरण के लिए हम मती के बारे सोचें। संत मती जो एक चुंगी जमा करनेवाला था, अपनी मातृभूमि से बेईमानी करनेवाला था।

ईश्वर धर्यवान हैं

सुसमाचार पाठ पर चिंतन करते हुए संत पापा ने कहा, "आज के सुसमाचार पाठ में, जो बेहतर छवि प्रस्तुत करता है वह पहला बेटा है इसलिए नहीं कि उसने "नहीं" कहा था, बल्कि इसलिए कि उसने "नहीं" कहने के बाद मनपरिवर्तन किया और "हाँ" कहा। ईश्वर हम सभी के प्रति धीरज रखते हैं। वे कभी नहीं थकते। हमारे नहीं कहने पर वे रूक नहीं जाते। वे हमें उनसे दूर हो जाने और गलती करने तक के लिए स्वतंत्र छोड़ देते हैं ताकि हम उनके अनोखे धैर्य को महसूस कर सकें, जान सकें कि वे किस तरह हमारा इंतजार करते हैं। वे सदा हमारी बगल में रहते हैं कि हमारी मदद करें किन्तु वे हमारी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं। और वे बड़ी उत्सुकता के साथ हमारे हाँ का इंतजार करते हैं जिससे कि वे हमारा स्वागत करें, अपनी पिता तुल्य बाहों में ले लें और हमें अपनी असीम करुणा से भर दें। ईश्वर पर विश्वास हमसे प्रतिदिन बुराई पर अच्छाई, झूठ पर सच्चाई, स्वार्थ पर पड़ोसी के प्रति प्रेम का चुनाव करने को नवीकृत करने की मांग करता है। जो लोग पाप करने के बाद उनके इस मांग की ओर फिरते हैं, वे स्वर्ग राज्य में प्रथम स्थान पर होंगे जहाँ 99 धर्मियों की अपेक्षा एक पापी के मन-फिराव पर अधिक खुशी मनायी जाती है।(लूक. 15,7)

मन-परिवर्तन की कृपा

संत पापा ने कहा, "लेकिन मन-परिवर्तन, हृदय परिवर्तन एक प्रक्रिया है, एक ऐसी प्रतिक्रिया जो हमें नैतिक अशुद्धियों से शुद्ध करता है और कई बार यह पाड़ादायक प्रक्रिया होती है क्योंकि पवित्रता का कोई ऐसा रास्ता ऐसा नहीं है जो त्याग और आध्यात्मिक संघर्ष के बिना हो। अच्छाई के लिए संघर्ष, प्रलोभन में नहीं पड़ने के लिए संघर्ष शांति और धन्यताओं के आनन्दमय जीवन तक पहुँचने के लिए हमारी ओर से जो कर सकते हैं उसको करने हेतु संघर्ष। आज का सुसमाचार पाठ ख्रीस्तीय जीवन जीने के तरीके पर सवाल करता है जो ख्वाबों और सुन्दर आकांक्षाओं की नहीं है बल्कि ठोस समर्पण पर टिकी है। ताकि हम अपने आप को ईश्वर की इच्छा के लिए खोल सकें और अपने भाई बहनों को प्यार कर सकें। परन्तु छोटा से छोटा ठोस समर्पण कृपा के बिना संभव नहीं होता। मन परिवर्तन एक कृपा है जिसके लिए हमें प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए, प्रभु मुझे बढ़ने के लिए कृपा दीजिए। मुझे एक अच्छा ख्रीस्तीय बनने की कृपा दीजिए।

अति पवित्र मरियम हमें पवित्र आत्मा के प्रति उदार बनने में मदद दे। वे ही हैं जो हमारे पत्थर के समान हृदय को पिघला देते और पश्चताप करने के लिए खोल देते हैं ताकि हम जीवन एवं मुक्ति प्राप्त कर सकें जिसकी प्रतिज्ञा येसु ने की है। इतना कहने के बाद संत पापा ने भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सभी को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

28 September 2020, 15:11