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देवदूत प्रार्थना में संत पापा फ्रांसिस देवदूत प्रार्थना में संत पापा फ्रांसिस  (AFP or licensors)

गरीब समाज के निर्माता, संत पापा

संत पापा फ्राँसिस ने अपने 05 जुलाई के रविवारीय देवदूत प्रार्थना में दीन-हीन और गरीबों को समाज के निर्माता निरूपित किया।

संत पापा फ्रांसिस ने 05 जुलाई को अपने रविवारीय देवदूत प्रर्थना के पूर्व संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को संबोधन करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

इस रविवार का सुसमाचार तीन भागों में विभक्त है, पहला येसु की प्रार्थना जहाँ वे अपने पिता के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट करते हैं क्योंकि उन्होंने ईश्वरीय राज्य के रहस्यों को गरीबों और साधारण लोगों के लिए प्रकट किया है, दूसरा वे पिता के संग अपनी घनिष्टता और अति विशेष संबंध को व्यक्त करते तो वहीं अंत में वे हम सभों को अपने पास आने का निमंत्रण देते हैं जिससे हम उनका अनुसरण करते हुए अपने लिए जीवन की शांति और सांत्वना प्राप्त कर सकें।

सच्चा ज्ञान हृदय से

संत पापा ने कहा कि सर्वप्रथम येसु अपने पिता की प्रशंसा करते हैं क्योंकि उन्होंने अपने राज्य के रहस्यों और उसकी सच्चाइयों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर रखा है। वे यह इसलिए कहते हैं क्योंकि ज्ञानियों और समझदारों का हृदय बहुत बार अपनी विद्वत्ता के कारण बंद हो जाता है। सच्चा ज्ञान हमारे लिए हृदय से भी आता है यह केवल ठोस विचारों को समझना नहीं है, वरन ज्ञान का प्रवेश हमारे हृदय से भी होता है। आप यदि अपने जीवन में बहुत सारी बातों को समझते हैं लेकिन आप का हृदय अपने में बंद है तो आप विवेकी नहीं हैं। येसु ख्रीस्त कहते हैं कि पिता अपने रहस्यों को “छोटे लोगों” के लिए प्रकट करते हैं जो विश्वास में अपने हृदय को वचनों से आने वाली मुक्ति हेतु खोलते हैं, वे जो जीवन में ईश्वर की जरुरत महसूस करते और सारी चीजों के लिए उन पर आशावान बने रहते हैं। यहाँ हम उस हृदय को देखते हैं जो अपने में खुला रहता और ईश्वर पर विश्वास करता है।

पिता संग पुत्र का संबंध, पुष्प की भांति

इसके बाद येसु कहते हैं कि उन्हें पिता से सब कुछ प्राप्त हुआ है और वे उन्हें “मेरे पिता” कह कर संबोधित करते हैं, यह हमारे लिए पिता का पुत्र के संग एक अति विशेष संबंध को प्रकट करता है। वास्तव में, हम पिता और पुत्र के मध्य एक सम्पूर्ण पारस्परिकता को देखते हैं दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह जानते और एक दूसरे के जीवन में निवास करते हैं। यह अति विशेष एकता मानो एक पुष्प की भांति है जो अपने में पल्लवित होती है। और इस परिदृश्य में येसु का निमंत्रण हमारे लिए आता है, “मेरे पास आओ...”(28)। वे हमें उन चीजों को प्रदान करना चाहते हैं जिन्हें उन्होंने पिता से प्राप्त किया है। वे हमें सच्चाई को प्रदान करना चाहते हैं यह हमारे लिए एक उपहार है जो हमें स्वतंत्र करती है यह हमारे लिए पवित्र आत्मा हैं, जो सत्य हैं।

पिता की चिंता में नगण्य सदैव

संत पापा ने कहा कि जिस भांति पिता ईश्वर की सोच में “छोटे लोग” हैं, वैसे ही येसु ख्रीस्त उन लोगों की फ्रिक करते हैं जो “थके-मांदे और बोझ से दबे हैं”। वे अपने को उन लोगों के बीच व्यवस्थित करते क्योंकि वे “अपने हृदय से नम्र और विनीत हैं” (29) वे अपने को इसी रुप में चित्रित करते हैं। इसे हम प्रथम और तीसरे धन्यवचन में पाते हैं, धन्य हैं वे जो दीन-हीन हैं, यह हमारे लिए येसु की दीनता और नम्रता है। येसु की यह दीनता और नम्रता हमें उन्हें किसी भी रूप में बुराई और अत्याचार का शिकार एक आदर्श स्वरुप प्रस्तुत नहीं करता है। लेकिन वे वह व्यक्ति है जो परिस्थिति के अनुरुप अपने “हृदय से” पिता के प्रेम में सम्पूर्ण पारदर्शिता का जीवन जीते हैं। वे “हृदय के दीन-हीनों” और सुसमाचार के अन्य “धन्यवचनों” के आदर्श हैं जो पिता की इच्छ पूरी करते और उनके राज्य का साक्ष्य देते हैं।

हमारी शांति और सुकून येसु में

इस भाँति येसु हमें कहते हैं कि यदि हम उनके पास आयें तो हमें उनमें शांति और सुकून प्राप्त होगा। जो शांति और सुकून हमें येसु ख्रीस्त में प्राप्त होता है वह केवल मनोवैज्ञानिक सांत्वना या बहुतायत में मिलने वाली शांति नहीं बल्कि गरीबों की खुशी है जो सुसमाचार का प्रचार करते हुए उन्हें नये मानव समाज का निर्माता बनाता है। येसु ख्रीस्त से मिलने वाली खुशी हमारे लिए अद्वतीय है। वे स्वयं हमारे लिए एक खुशी हैं। यह संदेश हम सभों के लिए है, उन सभों के लिए भी जो भले मनोभाव रखते हैं, जिसे येसु ख्रीस्त आज भी दुनिया में प्रसारित करते हैं जो लोगों को धनी और शक्तिशाली बनाता है। लेकिन हम कितनी बार अपने में यह सोचते हैं संत पापा फ्रांसिस ने कहा,“मैं उसके समान बनना चाहता हूँ, उसके समान बनना चाहती हूँ, जो धनी हैं, जिनके पास बहुत धन है, जिन्हें कुछ की कमी नहीं है...”। दुनिया उन लोगों का सम्मान करती है जो धनी और शक्तिशाली हैं चाहे उन्होंने किसी भी तरह से सम्पन्नता को प्राप्त क्यों न किया हो, इस तरह मानव गरिमा या व्यक्ति के सम्मान को कुचल दिया जाता है। हम इसे रोज दिन के जीवन में देखते हैं कितने ही गरीबों को पैरों तले कुचल दिया जाता है...। यह कलीसिया के लिए एक संदेश है जो करूणा के कार्यों को करने हेतु बुलाई जाती और गरीबों, दीन-हीन और नम्र लोगों के बीच सुसमाचार प्रचार करने को भेजी जाती है। येसु ख्रीस्त कलीसिया और हम लोगों से इसी बात की चाह रखते हैं।

माता मरियम जो सृष्टि में सबसे नम्र और दीन रहीं हमारे हृदय के लिए, ईश्वरीय ज्ञान की याचना करें, जो ज्ञान का हृदय बनें जिससे हम अपने जीवन में रहस्यों को पहचान सकें और उन्हें दूसरों के संग साझा कर सकें, जो घंमडियों से गुप्त रखा गया और नम्र लोगों के लिए प्रकट किया गया है।

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने सभों के संग मिलकर देवदूत प्रार्थना का पाठ किया और सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

06 July 2020, 13:44