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संतो स्तीरितो में ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा फ्राँसिस संतो स्तीरितो में ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा फ्राँसिस 

हम एक ऐसे विश्व का निर्माण करें जिसमें कोई पीछे न रहे, पोप

संत पापा फ्राँसिस ने 19 अप्रैल को दिव्य करुणा रविवार के उपलक्ष्य में रोम के संतो स्पीरितो (पवित्र आत्मा) गिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित किया।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 20 अप्रैल 20 (रेई) – उन्होंने उपदेश में कहा, "पिछले रविवार हमने प्रभु का पुनरूत्थान मनाया था, आज हम शिष्यों का पुनरूत्थान देख रहे हैं। एक सप्ताह बीत चुका है, जिसमें शिष्यों ने पुनर्जीवित ख्रीस्त को देखने के बावजूद बंद दरवाजों के पीछे समय व्यतीत किया।(यो. 20:26)

शिष्यों का पुनरूत्थान

पुनरूत्थान में अब तक केवल थॉमस विश्वास नहीं किया था, जो अनुपस्थित था। इस निडर अविश्वासी के सामने येसु ने क्या किया? वे लौटे, उन्होंने शिष्यों के बीच में वही स्थान लिया और वही अभिवादन दुहराया। "तुम्हें शांति मिले ।"(यो. 20,19-26) शिष्यों का पुनरूत्थान यहीँ से शुरू हुआ, इस विश्वास योग्य और धैर्यपूर्ण दया से, कि ईश्वर हमारा हाथ पकड़ने से कभी नहीं थकते, हम अपने पतन से उठ सकते हैं। वे चाहते हैं कि हम उन्हें एक स्वामी के रूप में नहीं जिनसे हमें अपना हिसाब ठीक करना हो, बल्कि एक पिता की तरह देखें जो हमेशा हमें उठाते हैं।

शुरूआत

जीवन में हम उस बच्चे की तरह टटोलते हुए चलते और गिरते हैं जो चलना सीखता है, वह कुछ कदम बढ़ता और गिर जाता है, बार-बार गिरता और हर बार पिता उसे उठाते हैं। जो हाथ हमें हमेशा उठाता है वही करुणा है। ईश्वर जानते हैं कि बिना दया के हम जमीन पर ही पड़े रह जायेंगे, जबकि चलने के लिए हमें अपने पैरों पर पुनः खड़े होने की जरूरत है। हम आपत्ति कर सकते हैं किन्तु गिरना नहीं छोड़ते। प्रभु इसे जानते हैं और वे हमेशा उठाने के लिए तैयार रहते हैं। वे नहीं चाहते कि हम लगातार अपने पतन की याद करें, बल्कि उन्हें देखें जो बच्चों के गिरने पर उठाना चाहते एवं उनकी दयनीय स्थिति पर करुणा के साथ स्नेह की नजर डालते हैं।

संत पापा ने संतो स्परीतो गिरजाघर की विशेषता की याद दिलाते हुए कहा कि आज यह गिरजाघर जो रोम में करुणा का पवित्र तीर्थस्थल बन गया है, 20 साल पहले रविवार के दिन, संत पापा जॉन पौल द्वितीय ने इसे दिव्य करुणा को समर्पित किया था। हम दृढ़ता के साथ इस संदेश को ग्रहण करते हैं। 

येसु ने संत फौस्तीना से कहा था, "मैं प्रेम और करुणा हूँ ऐसा कोई भी कष्ट नहीं है जो मेरी दया से बड़ा हो। एक बार संत ने अपने सम्पूर्ण जीवन को समर्पित करने पर संतुष्ट होकर येसु से कहा था कि उसने अपने पास जो था वह सब कुछ समर्पित कर दिया है।"(डायरी, सितम्बर 14, 1937) किन्तु येसु ने उत्तर दिया, "तुमने मुझे उस चीज को नहीं दिया है जो वास्तव में तुम्हारा है।" पवित्र धर्मबहन ने अपने लिए क्या रखा था? येसु ने प्यार से कहा, "बेटी, तुम मुझे अपना कष्ट दे दो।" (10 अक्टूबर 1937) हम भी अपने आपसे पूछें, "क्या मैंने अपना कष्ट प्रभु को अर्पित कर दिया है? क्या मैंने अपनी कमजोरियों को उन्हें दिखाया है ताकि वे मुझे उठायें?" अथवा क्या मेरे अंदर अब भी कुछ बाकी है?  एक पाप, अतीत की एक ग्लानि, एक घाव, किसी के प्रति असन्तोष, किसी व्यक्ति के प्रति विचार, जो मेरे अंदर है, प्रभु हमारी प्रतीक्षा करते हैं कि हम उनके पास अपना कष्ट लायें जिससे कि हम उनकी दया प्राप्त करें।

थॉमस का पुनरूत्थान

हम शिष्यों की ओर लौटें। उन्होंने दुःखभोग के समय प्रभु को छोड़ दिया था और उसके लिए आत्मग्लानि महसूस कर रहे थे किन्तु येसु ने उनसे मुलाकात की और कोई लम्बा उपदेश नहीं दिया। वे जो अंदर से घायल थे उन्हें अपना घाव दिखलाया। थॉमस ने उसका स्पर्श किया और उस प्रेम को महसूस किया कि येसु ने उसके लिए कितना अधिक दुःख उठाया, जबकि उसने उन्हें छोड़ दिया। उन घावों में उसने अपने हाथों से ईश्वर के कोमल सामीप्य का स्पर्श किया। थॉमस जो देर से पहुँचा था जब उसने करुणा को ग्रहण किया, वह दूसरे शिष्यों से आगे निकल गया। उसने न केवल पुनरूत्थान में विश्वास किया किन्तु ईश्वर के असीम प्रेम में भी और वह अपने विश्वास को अधिक सादगी एवं सुन्दर रूप में व्यक्त किया, "मेरे प्रभु और मेरे ईश्वर।" (पद. 28)

नाजुक किन्तु बहुमूल्य

संत पापा ने कहा कि यही शिष्यों का पुनरूत्थान है यह तब पूर्ण हुआ जब उनके कमजोर एवं घायल मानवता में येसु ने प्रवेश किया। इस प्रकार वहाँ हर प्रकार के भ्रम दूर हो गये। ईश्वर, उनके ईश्वर बन गये। उन्होंने अपने आपको स्वीकार करना एवं अपने जीवन से प्रेम करना शुरू किया।

संत पापा ने विश्वासियों को सम्बोधित कर कहा, "हम जिस कठिनाई की घड़ी से होकर गुजर रहे हैं हम भी थॉमस के समान अपने भय एवं संदेह के साथ अपने आपको कमजोर पाते हैं। हमें प्रभु की आवश्यकता है जो हमारी दुर्बलता के परे, एक अदम्य सुन्दरता देखते हैं। उनके साथ हम अपनी दुर्बलता में भी अपना मूल्य पहचानते हैं। हम समझते हैं कि हम कीमती हीरे के समान हैं, नाजुक किन्तु बहुमूल्य। यदि हम उनके सामने हीरे की तरह पारदर्शी होंगे, तब उनका प्रकाश, करुणा की उनकी रोशनी हमपर चमकेगी और हमारे द्वारा दुनिया रोशन होगी। यही कारण है कि संत पेत्रुस अपने पत्र में बतलाते हैं, आप लोगों के लिए बड़े आनन्द का विषय है, हालाँकि, अभी थोड़े समय के लिए, आपको अनेक तरह के कष्ट सहने पड़ रहे हैं।" (1 पेत्रुस 1,6)

कोविड-19 से भी बड़ा खतरा

दिव्य करूणा के इस पर्व के दिन, सबसे बाद में आने वाले शिष्य की ओर से सबसे सुन्दर घोषणा आती है। केवल थॉमस अनुपस्थित था किन्तु प्रभु ने उसके लिए इंतजार किया। करुणा उन लोगों को नहीं छोड़ती जो पीछे छूट जाते हैं। अब, जबकि हम महामारी से धीमी और थका देने वाली सुधार के बारे में सोच रहे हैं, यह खतरा अपने आप ही खत्म हो जाता है कि हम पीछे छूटे लोगों को भूल जायें। खतरा यह है कि हम उससे भी अधिक बुरी महामारी में फंसे हैं वह महामारी है, उदासीन स्वार्थ। यह हमें तब बदल देता है जब हम सोचते हैं कि जीवन में सुधार तब होगा, जब यह मेरे लिए अच्छा होगा। हम यहां से शुरू करते और लोगों का चुनाव करते हैं, गरीबों का बहिष्कार करते और विकास की वेदी पर पीछे छूटे लोगों को छोड़ देते हैं। हालांकि, यह महामारी हमें याद दिलाती है कि इससे पीड़ित लोगों में कोई अंतर एवं सीमा नहीं है। हम सभी कमजोर हैं, सभी एक समान हैं, सभी मूल्यवान हैं। जो हो रहा है उसने हमें हिला कर रख दिया है।

वर्तमान परिस्थिति

यह समय है असामनता को दूर करने का, अन्याय जो समस्त मानवता के स्वस्थ को नजरअंदाज करता, उसे चंगा करने का। हम आरम्भिक ख्रीस्तीय समुदाय से सीख ले सकते हैं जिसका वर्णन प्रेरित-चरित करता है। उन्होंने करुणा प्राप्त की थी और करूणा को जीया। "सब विश्वासी एक हृदय थे। उनके पास जो कुछ था, उसमें सबों का साझा था। वे अपनी चल अचल सम्पति बेच देते थे और उसकी कीमत हर एक की जरूरत के अनुसार सबों में बांट देते थे। "(प्रे.च 2: 44-45) यह विचारधारा नहीं, ख्रीस्तीयता है।

संत पापा ने वर्तमान परिस्थिति पर गौर करते हुए कहा, "उस समुदाय में येसु के पुनरूत्थान के बाद सिर्फ एक जन पीछे था और दूसरों ने उसकी प्रतीक्षा की। आज स्थिति उल्टा है, मानव परिवार का एक छोटा भाग आगे बढ़ गया है जबकि बड़ा भाग पीछे छूट गया है। लोग कह सकते हैं कि ये जटिल समस्या है। यह मेरा काम नहीं है कि मैं जरूरतमंद लोगों की देखभाल करुँ, यह दूसरों का काम है। संत फौस्तीना ने येसु से मुलाकात करने के बाद लिखा। "एक आत्मा जो पीड़ित है उसमें हम क्रूसित येसु को देखते हैं, परजीवी अथवा भार को नहीं...(प्रभु) आप हमें करुणा का अभ्यास करने का अवसर प्रदान करते हैं जबकि हम न्याय करते हैं।” (डायरी, 6 सितम्बर 1937)

हमारा भविष्य

एक दिन वह स्वयं येसु से शिकायत करती है कि दयालु होने में व्यक्ति को अनुभवहीन समझा जाता है। उसने कहा, "प्रभु, वे हमेशा मेरी अच्छाई को बिगाड़ते हैं," तब येसु ने जवाब दिया, "मेरी बेटी, चिंता मत करो, घबराओ नहीं, हमेशा सभी के प्रति दयालु बने रहो।” (24 दिसम्बर 1937). संत पापा ने कहा कि आइये हम भी केवल अपनी चिंता न करें। कठिनाई की इस घड़ी को भविष्य की तैयारी के लिए अवसर के रूप में देखें, एक ऐसा भविष्य जिसमें कोई बहिष्कृत न हो, क्योंकि सभी को स्वीकार करने के दर्शन के बिना, किसी के लिए भविष्य नहीं होगा।

आज येसु का सरल और निरस्त्रीकृत प्रेम शिष्यों के हृदय को पुनः जागृत करता है। प्रेरित थॉमस के समान हम भी करुणा को स्वीकार करें, जो संसार की मुक्ति है। हम उन लोगों के प्रति दया दिखायें जो सबसे कमजोर हैं क्योंकि इसी के द्वारा हम एक नई दुनिया का निर्माण कर सकते हैं।

दिव्य करुणा रविवार को संतो स्पीरितो गिरजाघर में ख्रीस्तयाग

           

20 April 2020, 14:32