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बुधवारीय आमदर्शन में संत पापा बुधवारीय आमदर्शन में संत पापा   (Vatican Media)

दीन-हीनता हमारी पूर्ण स्वतंत्रता, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में संत मत्ती रचित सुसमाचार के आधार पर प्रथम धन्य वचन का मर्म समझाया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन रेडियो, गुरूवार, 05 फरवरी 2020 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को, संत पापा पौल षष्ठम के सभागार में अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज हम संत मत्ती के सुसमाचार अनुसार आठ धन्य वचनों की कड़ी में प्रथम धन्य वचन चिंतन करेंगे। येसु ख्रीस्त अपनी खुशी के मर्म, मार्ग को एक विरोधाभास रुप में घोषित करते हैं। “धन्य हैं वे जो अपने को दीन-हीन समझते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है” (5.3)। संत पापा ने कहा कि यह एक आश्चर्यजनक मार्ग और परमानंद की एक विचित्र विषयवस्तु है।

दरिद्र होने का अर्थ

हमें अपने में पूछने की जरुरत है- यहाँ “दरिद्र” होने का अर्थ क्या हैॽ यदि संत मत्ती द्वारा उपयोग किये गये इस शब्द को हम साधारण रुप में लें तो इसका तत्पर्य आर्थिक स्थिति को व्यक्त करता है अर्थात वे लोग जो अपने में निर्धन हैं या जिनके पास जीविका के साधन नहीं हैं और जिन्हें दूसरों के सहायता की जरूरत है।

लेकिन संत मत्ती का सुसमाचार, संत लूकस के सुसमाचार से भिन्न दरिद्रता को “दीन-हीन” के रुप में व्यक्त करता है। इसका अर्थ क्या हैॽ धर्मग्रंथ बाईबल के अनुसार दीन-हीन को हम एक मनोभाव के रुप में पाते हैं जो ईश्वरीय आत्मा के रुप में व्यक्त किया गया है। ईश्वर अपनी इस आत्मा के द्वारा आदम में जीवन का संचार करते हैं। यह हमारा आतंरिक आयाम है जिसे हम आध्यात्मिकता की संज्ञा दे सकते हैं, जो हमारे मानव होने के सार को व्यक्त करता है। इस भांति “दीन-हीन” होने का तत्पर्य उन लोगों से है जो अपने हृदय की गहराई में अपने को गरीब, दरिद्र समझते हैं। येसु ख्रीस्त ऐसे लोगों को धन्य कहते हैं क्योंकि स्वर्ग का राज्य ऐसे लोगों के लिए ही है।

हमारे अकेलेपन और नखुशी के कारण

संत पापा ने कहा कि कितनी बार हम ठीक इसके विपरीत बातों को सुनते हैं। हमारे जीवन में कुछ होने की जरुरत है... हमें कुछ बनने की आवश्यकता है... हमें अपने लिए एक मुकाम हासिल करने की जरुरत है... और यही से हमारे लिए अकेलेपन और नखुशी की शुरूआत होती है। जब हम अपने में “कुछ बनने” की चाह रखते तो हममें, प्रतियोगिता की भावना शुरू हो जाती और हम अपने अहम में ग्रसित जीवनयापन करने लगते हैं। इस तरह यदि मैं अपनी गरीबी को स्वीकार नहीं करता तो वे सारी बातें जो मेरी भंगुरता को प्रकट करती हैं, मैं उनसे घृणा करने लगता हूँ। क्योंकि मेरी यह भंगुरता मुझे एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने में बाधक बनती है चाहे वह मेरे धनी होने- धन-दौलत के संबंध में, मेरी प्रसिद्धि और सारी चीजों के बारे ही क्यों न हो। संत पापा ने कहा कि हममें से प्रत्येक जन चाहे हम अपने जीवन में कितना भी कठिन प्रयास क्यों न करें, हम वास्ताविक रुप में सदा अपने में अपूर्ण और भेद्य ही रहते हैं। हमारे जीवन में कोई भी ऐसी चीज नहीं जो हमारे इस भेद्यपन को ढ़ंक सके। हममें से हर कोई अपने में सहज ही टूटने वाले होते हैं। हमें इस तथ्य को देखने की जरूरत है कि हमारे जीवन में वह कौन-सा भाग है। यदि हम अपने कमजोरियों को अस्वीकार करते तो हमारा जीवन कितना खराब व्यतीत होता है। हम अपने कोमजरियों को पचा नहीं पाते हैं। वे हमारे साथ रहती हैं। वे लोग जो अपने में घमंडी हैं दूसरों से सहायता की मांग नहीं करते क्योंकि वे अपने को, अपने में परिपूर्ण साबित करने की कोशिश करते हैं। कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्हें सहायता की जरुरत है लेकिन उनका घमंड उन्हें मदद मांगने से बाधित करता है। संत पापा ने कहा कि अपनी गलतियों को स्वीकारना और उसके लिए क्षमा मांगना हमारे लिए कितना कठिन लगता है। जब विवाहित दंपति मुझसे अपने जीवन को अच्छी तरह जीने की सलाह मांगते तो मैं उन्हें इन तीन चमात्कारिक बातों के बारे में कहता हूँ, “कृपया, धन्यवाद और माफी”। ये तीन बातें हमारे दीन-हीन होने के कारण उत्पन्न होते हैं। आप इन्हें दूसरों पर न थोपें वरन् इसे स्वतः होने दें। परिवार में, दंपतियों में वार्ता की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इन तीन बातों में “तीसरा”, अपनी गलती के लिए क्षमा मांगना, सबसे कठिन लाता है जैसे कि बहुत सारे दंपतियों ने मुझे इसके बारे में कहा है। अपने घमंड के कारण हम ऐसा नहीं कर पाते हैं। वही ईश्वर हमें क्षमा करने से कभी नहीं थकते लेकिन हम अपने में क्षमा मांगने हेतु थक जाते हैं। (देवदूत प्रार्थना, 17 मार्च, 2013)। क्षमा की याचना करने हेतु थक जाना यह अपने में खराब बीमारी है...।

हम माफी क्यों नहीं मांगतेॽ

संत पापा ने क्षमा मांगने पर होने वाली कठिनाई के संबंध में कहा, “क्योंकि हमें क्षमा मांगने में तकलीफ की अनुभूति होती हैंॽ” क्योंकि यह हमें अपमानित करता है हमारे दिखावे भरे रुप को हानि पहुँचाता है। अपनी कमोजरियों को छिपाना अपने में थकान और तकलीफदायी होती है। येसु हमें कहते हैं कि अपने में दीन-हीन होना कृपा की अवस्था है वे इसके लिए हमें मार्ग दिखलाते हैं। वे हमें दीन-हीन होने का अधिकार प्रदान करते हैं जो हमें ईश्वर के राज्य की ओर ले चलता है।  

लेकिन एक बात यहाँ हमारे लिए महत्वपूर्ण है- हम दीन-हीन बनने हेतु अपने में परिवर्तन न लायें क्योंकि हम पहले से ही दीन-हीन हैं। हम अपने में गरीब हैं, हम अपने में दरिद्र हैं, हमें ईश्वर की कृपा की जरुरत है, हमारी मानवीय स्थिति ऐसी ही है।

सच्चा धन आध्यात्मिक शक्ति

स्वर्ग का राज्य उनका है जो अपने में दीन-हीन हैं। वहीं बहुत से लोग हैं जिनका राज्य इस दुनिया का है, उनके पास धन-संपति, ऐशो आराम की चीजें हैं। लेकिन ये सारी चीजों खत्म हो जायेंगी। मानव की शक्ति यहां तक की शक्तिशाली सम्रराज्य अपने में लुप्त हो गये। संत पापा ने कहा कि हम अपने रोज दिन के दूरदर्शन में देखते और समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि वह शक्तिशाली राष्ट्र, सरकार अपने में गिर गयी। वह कल था आज नहीं है। इस दुनिया की समृद्धि और धन-दौलत खत्म हो जाती हैं। हमने एक शव यात्रा के दौरान ट्रक को नहीं देखा है, किसी ने कुछ नहीं लाया है। दुनिया की दौलत यहीं रह जाती हैं। दुनिया में जिनके पास धन-दौलत और आराम की चीजें हैं हम जानते हैं कि उनका अंत कैसे हो जाता है। वे जो सही धन से प्रेम करना जानते हैं केवल वही रह जाता है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक शक्ति है। यह हमारे लिए ईश्वर की शक्ति है।

हमारा जीवन येसु की शक्ति

येसु ख्रीस्त ने किन बातों में अपनी शक्ति दिखलाईॽ वह हमें कौन-सी चीज प्रदान करते हैं जिसे दुनियावी राजा नहीं दे सकते हैं। वे हमें जीवन देते हैं। यह हमारे लिए सच्ची शक्ति है जिसमें हम भ्रातृत्व, करुणा, प्रेम और नम्रता की शक्ति को पाते हैं। येसु ने इन बातों में अपनी शक्ति दिखलाई है।

संत पापा ने कहा कि जो नम्रता, सेवा, भ्रातृत्व में जीवनयापना करता है वह स्वतंत्र है, यही हमारे लिए सच्ची स्वतंत्रता है। सेवा की इस स्वतंत्रता में हम दरिद्रता को धन्य वचन के रुप में पाते हैं।

हमें इस दुनिया में दीन-हीनता को स्वीकार करने की जरुरत है जो हमें ठोस रुप से प्रेम के योग्य बनाता और स्वतंत्र करता है। हमें अपने हृदय से स्वतंत्र होने की जरूरत है जिसकी जड़ें हमारी दरिद्रता से जुड़ी हुई हैं। 

05 February 2020, 15:47