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आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा आमदर्शन समारोह के दौरान संत पापा   (Vatican Media)

नम्रता एकता का स्रोत, संत पापा

संत पापा फ्रांसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह में नम्र होने का अर्थ समझाया।

दिलीप संजय एक्का-वाटिकन सिटी

वाटिकन रेडियो, गुरूवार, 19 फरवरी 2020 (रेई) संत पापा फ्रांसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को, संत पापा पौल षष्ठम् के सभागार में अपनी धर्मशिक्षा माला देने के पूर्व संबोधित करते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों सुप्रभात।

आज की धर्मशिक्षा माला में हम संत मत्ती के सुसमाचार अनुसार तीसरे धन्य वचन पर चिंतन करेंगे। “धन्य हैं वे जो नम्र हैं उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा”।

नम्रता का मापदण्ड

यहाँ “नम्र” शब्द का शब्दिक अर्थ कोमलता, मृदु, मीठा, हिंसा से मुक्ति है। नम्रता की अभिव्यक्ति अपने में कलह के समय होती है आप अपने में देख सकते हैं कि आप हिंसक परिस्थिति में किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं। शांतिमय परिस्थिति में कोई भी अपने में नम्र प्रतीत होता है लेकिन “तनाव भरे क्षण” में यदि जब किसी पर आक्रमण किया जाता, नाराजगी और उसकी टीका-टिप्पणी की जाती तो वह कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।

येसु की नम्रता दुःखभोग में सशक्त

संत पापा ने कहा कि संत पौलुस अपने एक पद में “येसु ख्रीस्त की नम्रता और मृदुता” की चर्चा करते हैं। (2 कुरि.10.1) वहीं संत पेत्रुस येसु के दुःखभोग में उनके मनोभावओं की याद करते हैं, “जब उन्हें गाली दी गयी, तो उन्होंने उत्तर में गाली नहीं दी और जब उन्हें सताया गया तो उन्होंने धमकी नहीं दी। उन्होंने अपने को उसपर छोड़ दिया, जो न्यायपूर्वक विचार करता है। (1 पेत्रु.2.23) येसु ख्रीस्त की नम्रता को हम उनके दुःखभोग में अधिक मजबूती में पाते हैं।

धर्मग्रंथ में “नम्र” शब्द हमारा ध्यान उनकी ओर करता है जिनकी अपनी जमीर, संपति नहीं है और इसीलिए तीसरा धन्य वचन हमारे लिए इस सच्चाई को व्यक्त करता है कि जो नम्र हैं “उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा”।  

वास्तव में, इस धन्य वचन को स्तोत्र 37 अपने में समाहित करता है जिसका श्रवण हमने धर्मशिक्षा के प्रारंभ में किया। इस स्तोत्र में भी हम नम्रता को भूमि के अधिकार से संबंधित पाते हैं। जब हम इन दो चीजों के बारे में सोचते हैं तो यह हमारे लिए असंगत प्रतीत होती हैं। किसी भूमि का स्वामित्व हमारे लिए असल में युद्ध के संदर्भ को लाता है, कोई हमेशा किसी एक क्षेत्र विशेष को अपने अधिकार में करने हेतु सदैव युद्ध करता है। युद्ध में सदा सबसे शक्तिशाली का वर्चस्व होता और वह दूसरों की भूमि पर विजयी होता है।

हमारी भूमि “स्वर्ग”

संत पापा ने कहा कि यदि हम नम्र क्रिया पर गौर करें तो हम उसे भूमि पर विजय होता हुआ नहीं पाते हैं। यहाँ हमें यह नहीं कहा गया है कि “धन्य हैं वे जो नम्र हैं क्योंकि वे प्रतिज्ञात देश पर विजय प्राप्त करेंगे”। लेकिन यह हमें कहता है कि उन्हें प्रतिज्ञात देश “प्राप्त” होगा। धर्मग्रंथ में क्रिया “प्राप्त” का अर्थ अपने में और भी विस्तृत है। ईश्वर की चुनी हुई प्रजा इस्रराएल की भूमि को प्रतिज्ञात देश कहती है जो उन्हें “विरासत में प्राप्त” हुई थी।

भूमि ईश्वर की ओर से लोगों के लिए एक प्रतिज्ञा औऱ एक उपहार स्वरुप दिया गया है और इसी कारण यह भूमि के रुप में एक क्षेत्र से बढ़कर है। संत पापा ने कहा यदि हम शब्दों का ताना-बाना बदले तो एक “भूमि” है जिसे हम स्वर्ग की संज्ञा देते हैं, उस नये स्वर्ग और नई पृथ्वी की ओर हम अपनी यात्रा कर रहे हैं। (इसा. 65.17, 66.22. 1 पेत्रु. 3. 13, प्रेरि. 21.1)

नम्र व्यक्ति कमजोर नहीं

अतः वह जो अपने में नम्र है उसे अति उत्कृष्ट भूमि “विरासत” में मिली है। वह अपने में डरपोक नहीं है, वह एक “कमजोर” व्यक्ति नहीं जो अपने विचारों में परिवर्तन द्वारा अपने को मुसीबतों से अलग रखता हो। ठीक इसके विपरीत, वह व्यक्ति विरासत में मिली चीज को खोना नहीं चाहता है। नम्र व्यक्ति ईश्वर का वह शिष्य है जो अपने में दूसरी धरती की रक्षा करना जानता है। वह अपनी शांति की सुरक्षा करता है। वह ईश्वर के संग अपने संबंध की रक्षा करता है। वह अपने जीवन में मिले उपहारों, ईश्वर के वरदानों, करूणा में धैर्य, भ्रातृत्व, विश्वास और आशा को सुरक्षित रखता है। नम्र व्यक्ति अपने में करूणावान, भ्रातृत्व में जीवनयापन करने वाले, विश्वासी औऱ आशावान लोग होते हैं।

क्रोध के परिणाम

संत पापा ने कहा कि यहाँ हमें क्रोध में किये जाने वाले पाप की चर्चा करनी चाहिए जिसके परिणाम से हम सभी वाकिफ हैं। हममें से कौन अपने में क्रोधित नहीं हुआ हैॽ हम सभी अपने में क्रोधित होते हैं। हम अपने आप से पूछें, क्रोध में हमने कितनी सारी चीजों का विनाश किया हैॽ हमने कितनी चीजों को खोया हैॽ हमारे एक क्षण का क्रोध कितनी सारी चीजों को नष्ट कर सकता है। हम अपने में क्रोधित होते और अपना आपा खो देते हैं हम अपने जीवन की मूल्यवान चीजों का ख्याल नहीं करते, हम अपने भाइयों से अपना संबंध तोड़ लेते हैं जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती है। क्रोध के कारण बहुत से सहोदर अपने में एक दूसरे से बातें नहीं करते, वे एक-दूसरे से दूर चले जाते हैं। यह नम्रता के ठीक विपरीत है। हमारी नम्रता हमें निकट लाती वहीं क्रोध हमें एक दूसरे से अलग कर देती है।

नम्रता विजय का अस्त्र

नम्रता से हम बहुत सारी चीजों में विजय प्राप्त करते हैं। यह दूसरों के हृदय पर विजयी प्राप्त कर सकती है, मित्रता और अन्य दूसरी चीजों को हमारे जीवन में सुरक्षित रखती है। लोगों अपने में क्रोधित होते लेकिन शांत हो जाते हैं, वे पुनर्विचार करते और अपनी राह में लौट आते हैं और इस तरह हम अपने में नम्रता का पुनर्निर्माण कर सकते हैं।

संत मत्ती के अनुसार नम्रता में “धरती” पर विजय उस भाई की मुक्ति है जिसके बारे वे लिखते हैं, “यदि वह तुम्हारी बात को मान जाता तो तुमने अपने भाई को बचा लिया”। (मत्ती18.15) दूसरों के हृदय से सुन्दर भूमि हमारे लिए और कोई नहीं है और अपने भाई से शांति स्थापित करने से बड़ा और कोई भू-भाग नहीं है। विरासत में मिली उसी भूमि को हम सभों को हासिल करना है।  

इतना कहने के बाद संत पापा फ्रांसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभों के संग हे पिता हमारे प्रार्थना का पाठ करते हुए सभों को अपने प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया। 

19 February 2020, 14:59