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सिनॉड के उद्घाटन का ख्रीस्तयाग सिनॉड के उद्घाटन का ख्रीस्तयाग   (AFP or licensors)

सिनॉड का उद्घाटन, आत्मा की नवीनता के प्रति निष्ठा का आह्वान

संत पापा फ्राँसिस ने रविवार 6 अक्टूबर को संत पेत्रुस महागिरजाघर में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए, पान-अमाजोन पर धर्माध्यक्षीय धर्मसभा का उद्घाटन किया। ख्रीस्तयाग में धर्माध्यक्षों के साथ-साथ सिनॉड में भाग लेने वाले सभी प्रतिभागी उपस्थित थे।

उषा मनोरमा तिरकी-वाटिकन सिटी

वाटिकन सिटी, सोमवार, 7 अक्टूबर 2019 (रेई)˸ संत पापा ने प्रवचन में कहा, "प्रेरित संत पौलुस, कलीसिया के इतिहास में सबसे महान मिशनरी, हमें इस सिनॉड में एक साथ यात्रा करने में सहायता दे। तिमथी को सम्बोधित उनके शब्द, ईश प्रजा की सेवा में गड़ेरिये के रूप में हमें सम्बोधित प्रतीत हो रहे हैं।"   

तिमथी को संत पौलुस का सम्बोधन 

संत पौलुस सबसे पहले तिमथी से कहते हैं, "मैं तुम से अनुरोध करता हूँ कि तुम ईश्वरीय वरदान की वह ज्वाला प्रज्वलित बनाये रखो, जो मेरे हाथों के आरोपण से तुम में विद्यमान है।" (2 तिम. 1:6) संत पापा ने कहा कि हम धर्माध्यक्ष हैं क्योंकि हमने ईश्वर से कृपादान प्राप्त किया है। हमने किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किया है। हमें कोई पेशा का अनुबंध नहीं दिया गया है। बल्कि हमारे सिर पर हाथ रखे गये थे ताकि हम पिता के सामने हाथ उठाकर निवेदन कर सकें।

हाथ

हमें यह प्राप्त हुआ है ताकि हमारे भाई-बहनों की सहायता हेतु इसे बढ़ा सकें। हमने कृपादान प्राप्त किया है ताकि हम भी दूसरों के लिए कृपादान बन सकें। कृपादान खरीदे नहीं जाते, न ही बेचे जा सकते हैं। वे ग्रहण किये और प्रदान किये जाते हैं। यदि हम उन्हें अपने पास रख लेते हैं, यदि हम कृपादान को नहीं बल्कि अपने आपको केंद्र बनाते हैं तब हम चरवाहे नहीं वरन् नौकरशाही बन जाते हैं। जब हम कृपादान को नौकरी बना लेते और उसकी आनुग्रहिकता (मुफ्तदान) नष्ट हो जाती है तब हम स्वयं की सेवा करने और कलीसिया का प्रयोग करने लगते हैं।

मुफ्त दान

हमने जो कृपादान प्राप्त किया है उसके द्वारा हमारा जीवन सेवा की ओर अभिमुख किया गया है। जब सुसमाचार पाठ अयोग्य सेवक के बारे बतलाता है तब यह हमें इसी की याद दिलाती है। (लूक.17:10) इस अभिव्यक्ति का अर्थ "घाटेवाला सेवक" भी हो सकता है।

सेवा

दूसरे शब्दों में, हम अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए सेवा नहीं करते बल्कि इसलिए क्योंकि हम मुफ्त में ग्रहण करते और मुफ्त में ही वापस करना चाहते हैं। (मती.10˸8) हमारा पूरा आनन्द सेवा करने में है क्योंकि सबसे पहले हम ईश्वर के द्वारा सेवा किये गये हैं जो हम सभी के लिए सेवक बन गये। संत पापा ने कहा, "प्रिय भाइयो एवं बहनों, आइये हम महसूस करें कि हम सेवा करने के लिए बुलाये गये हैं। हम ईश्वर की कृपा को केंद्र में रखें।"

निष्ठा

मिशन हेतु हमारी बुलाहट के प्रति निष्ठावान होने के लिए संत पौलुस स्मरण दिलाते हैं कि हमारे उपहार को पुनः प्रज्वलित किया जाना है। वे आग जलाने की छवि का प्रयोग करते हैं। हमने जो कृपादान प्राप्त किया है वह है आग, जो ईश्वर एवं भाई-बहनों के प्रेम से धधक रहा है। आग अपने आप नहीं जलती, इसके लिए ईंधन की आवश्यकता होती है अन्यथा यह बुझ जायगी और बस राख रह जायेगी। यदि सब कुछ यथावत जारी रहता है, यदि हम अपने जीवन को संतुष्टि के साथ व्यतीत करते हैं तब कृपादान समाप्त हो जाती है और केवल भय की राख एवं अपनी प्रतिष्ठा को बचाने की चिंता बची रह जाती है। फिर भी, कलीसिया किसी भी तरह से उन लोगों के प्रेरितिक कार्य को केवल एक ‘सामान्य रख-रखाव’ के कार्य तक सीमित नहीं कर सकती जो ख्रीस्त के सुसमाचार को जान चुके हैं।

समुदाय की परिपक्वता

मिशनरी पहुँच कलीसियाई समुदाय की परिपक्वता का एक स्पष्ट चिन्ह है। येसु एक सुहावनी शाम की शीतल हवा लाने के लिए नहीं आये बल्कि वे धरती पर आग लेकर आये। आग जो दानदाता पवित्र आत्मा के वरदान को प्रज्वलित करता है। संत पौलुस कहते हैं, "जो निधि तुम्हें सौंपी गयी, उसे हम में निवास करने वाले पवित्र आत्मा की सहायता से सुरक्षित रखो।" (2 तिम. 1:14) और फिर कहते हैं, "ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया है।" (पद. 7) संत पौलुस भीरूता के स्थान पर प्रज्ञा को रखते हैं। आत्मा की प्रज्ञा क्या है? जैसा कि धर्मशिक्षा हमें सिखलाती है प्रज्ञा को भीरूता अथवा डर से नहीं मिलाना चाहिए बल्कि यह एक सदगुण है जो व्यावहारिक कारण बताता है ताकि हम हर परिस्थिति में सच्ची अच्छाई की परख कर सकें तथा उसे प्राप्त करने के उपयुक्त साधन का चुनाव कर सकें। (कलीसिया की धर्मशिक्षा. 1806)

विवेक

विवेक का अर्थ असमंजस में पड़ना नहीं है और न ही रक्षात्मक मनोभाव है। यह एक चरवाहे का गुण है जो प्रज्ञा के साथ सेवा करने के लिए, निर्णय ले सकता है और पवित्र आत्मा की नवीनता को ग्रहण कर सकता है। पवित्र आत्मा की अग्नि द्वारा हमारे कृपादानों को पुनः प्रज्वलित करना, कुछ किये बिना चीजों को अपने आप जाने देने के विपरीत है। पवित्र आत्मा की नवीनता के प्रति निष्ठा एक कृपा है जिसको हमें प्रार्थना में मांगना है। संत पापा ने प्रार्थना की कि पवित्र आत्मा जो सभी चीजों को नवीन बना देता है हमें अपना विवेक प्रदान करें। वह हमारे सिनॉड को प्रेरित करें कि अमाजोन की कलीसिया के रास्ते पर नवीनता आ सके और वहाँ मिशन की आग जलती रहे।

प्रेम की आग

जैसा कि हम जलती झाड़ी की कहानी में देखते हैं, ईश्वर की आग जलती है किन्तु यह भस्म नहीं करती (निर्ग.3˸2) यह प्रेम की अग्नि है जो प्रकाशित करती, ऊष्मा प्रदान करती एवं जीवन देती है। यह सब कुछ को जला कर भस्म नहीं करती।

संत पापा ने सुसमाचार को थोपे जाने का विरोध करते हुए कहा, "जब मनुष्यों और उनकी संस्कृति को बिना प्रेम और सम्मान के नष्ट किया जाता है, तब यह ईश्वर की आग नहीं है बल्कि दुनिया की आग है। फिर भी, कई बार ईश्वर की कृपा को, ग्रहण करने में मदद किये जाने के बदले उसे थोपा जाता है, सुसमाचार प्रचार करने के बदले औपनिवेशीकरण करने की कोशिश की जाती है। प्रभु हमें नये प्रकार के औपनिवेशीकरण के प्रलोभन से बचाये। अपने लाभ के लिए लगायी गयी आग नष्ट करती है जैसा कि हाल ही में अमाजोन में हुआ। यह सुसमाचार की आग नहीं थी। ईश्वर की आग ऊष्मा प्रदान करने वाली है जो लोगों को आकर्षित करती और उन्हें एकता के सूत्र में बांधती है। यह लाभ प्राप्त करने के द्वारा नहीं किन्तु बांटने के द्वारा पोषित होती है। दूसरी ओर, जो आग नष्ट करती है वह तभी जलती है जब अपने ही विचारों को बढ़ावा दिया जाता, अपने दल का निर्माण किया जाता और सब कुछ को एक समान बनाने के प्रयास में विविधताओं को समाप्त कर दिया जाता है।

पवित्र आत्मा के प्रति निष्ठावान 

कृपादान को पुनः प्रज्वलित करने के लिए हम पवित्र आत्मा के साहसी विवेक का स्वागत करें ताकि हम उनकी नवीनता के प्रति निष्ठावान बन सकें। संत पौलुस हमें अंतिम आह्वान देते हैं, "तुम न तो हमारे प्रभु का साक्ष्य देने में लज्जा अनुभव करो और न मुझ से, जो उनके लिए बन्दी हूँ, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर भरोसा रख कर तुम मेरे साथ सुसमाचार के लिए कष्ट सहते रहो।" (2 तिम.1˸8) संत पौलुस तिमोथी को सुसमाचार का साक्ष्य देने के लिए कहते हैं, सुसमाचार के लिए दुःख सहने दूसरे शब्दों में, सुसमाचार को जीने के लिए कहते हैं। सुसमाचार की घोषणा कलीसिया के जीवन की मुख्य कसौटी है। संत पौलुस पुनः लिखते हैं, "मैं प्रभु को अर्पित किया जा रहा हूँ। मेरे चले जाने का समय आ गया है।" (पद. 4:6)

सुसमाचार प्रचार करने का अर्थ

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार का प्रचार करने का अर्थ है एक चढ़ावा के रूप में जीना, अंत तक साक्ष्य देना, सभी लोगों के लिए सब कुछ बन जाना, (1 कोर 9:22) शहीद होने तक प्रेम करना। प्रेरित इसे स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं कि सुसमाचार की सेवा दुनिया की ताकतों से नहीं किन्तु ईश्वर के सामर्थ्य से ही की जा सकती है। सुसमाचार का प्रचार विनम्र प्रेम में बने रहते हुए इस विश्वास में जीना है कि जीवन को प्राप्त करने का सच्चा रास्ता, इस प्रेम में अपने को अमर करना है।

क्रूसित येसु 

संत पापा ने कहा, "प्रिय भाइयो एवं बहनो, हम एक साथ क्रूसित येसु को देखें, उनके हृदय को जो हमारी मुक्ति के लिए छेदा गया। आइये, हम वहीं से शुरू करें जो हमारी कृपा के स्रोत हैं जिन्होंने हमें जन्म दिया है। उसी हृदय द्वारा हमें आत्मा प्रदान किया गया है जो नवीकृत करता है जिसको हमपर उंडेला गया है। (यो. 19:30) आइये हम सभी महसूस करें कि हम जीवन देने के लिए बुलाये गये हैं। अमाजोन में हमारे बहुत सारे भाई-बहन भारी क्रूस उठा रहे हैं और सुसमाचार द्वारा मुक्तिदायी सांत्वना का इंतजार कर रहे हैं। वे कलीसिया के दुलार प्रेम का इंतजार कर रहे हैं। उनके लिए और उनके साथ आइये, हम भी यात्रा में भाग लें।"

07 October 2019, 15:08